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वास्तु मंडल पूजन मंत्र pdf

वास्तु मंडल चक्र   वास्तु मंडल पूजन मंत्र  घर और यज्ञ के लिये वास्तुमंडल अलग -अलग होता है। यह घर में बनाया जाने वाला ८१ पदों का वास्तुचक्र है। नीचे पूजन के मंत्र दिये गए हैं और क्रम का अंक वास्तुमंडल चक्र में अंकित है। १. शिखि : ॐ नमः शम्भवाय च मयेभवाय च नमः शङ्कराय…

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सप्त घृत मातृका पूजन विधि । सम्पूर्ण वसोर्धारा पूजन ।

सप्त घृत मातृका पूजन विधि । सम्पूर्ण वसोर्धारा पूजन : मिथिला में षोडश मातृका पूजनोपरांत श्री पूजन करके ही वसोर्धारा की परिपाटी है। अलग से सप्तघृतमातृका पूजन की अनिवार्यता नहीं देखी जाती है । परन्तु अनुष्ठान-यज्ञों में अब देखे जाते हैं, फिर भी कर्मकांड संबधी मुख्य पुस्तकों में वृद्धिश्राद्ध प्रसङ्ग पर सप्तघृत मातृका पूजन प्राप्त नहीं होता । 

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संपूर्ण कलश स्थापना विधि और मंत्र

कलश स्थापना विधि और मंत्र : कलश स्थापना से पूर्व वेदी या कुंकुम आदि से भूमि पर अष्टदल बनाकर उसपर धान्यपुञ्ज या चावल पुञ्ज बना ले।

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संकल्प विधि – संकल्प मंत्र संस्कृत

संकल्प विधि – संकल्प मंत्र संस्कृत : संकल्प का अर्थ होता है किसी कार्य की उद्घोषणा करना। कोई काम जो कि करने वाले हैं उसकी उद्घोषणा करना जिसमें कार्य-अनुष्ठान, उद्देश्य, क्रियाविधि, काल (समय) आदि का स्पष्ट उल्लेख किया गया हो। संकल्प का अर्थ दृढ प्रतिज्ञा भी होता है जिसका तात्पर्य किसी भी स्थिति में उस कार्य को पूर्ण करना होता है। 

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गौरी गणेश पूजन मंत्र – 1st puja

गौरी गणेश पूजन मंत्र :  गणेशाम्बिका पूजा हेतु किसी पात्र में चावल भर कर उसपर कुंकुमादि से अष्टदल या स्वास्तिक बना लें। दो सुपारी में मौली लपेट कर उस पात्र में रख दें एक पात्र आगे में रख लें जिसमें जल-पंचामृत अर्पित करना है और आगे की विधि से पूजा करें :-

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स्वस्तिवाचन मंत्र

स्वस्तिवाचन मंत्र : पूजा-अनुष्ठानकिसी भी धार्मिक अनुष्ठान में पवित्रीकरणादि के पश्चात प्रथमतः स्वस्तिवाचन किया जाता है।  भद्रसूक्त का पाठ करना स्वस्तिवाचन कहलाता है । भद्रसूक्त उन मंत्रों का समूह है जिसमें हम कल्याणकामना करते हैं । हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर ईष्ट का ध्यान करते हुए स्वस्तिवाचन करना चाहिए :-

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पञ्चदेवता व विष्णु पूजा विधि

पञ्चदेवता व विष्णु पूजा विधि : नित्यकर्म में पंचदेवता पूजन भी आता है और यदि मिथिला की बात करें तो यहां पंचदेवता नहीं षड्देवता पूजन का विधान है और यही कारण है कि मिथिला में तंत्र से पंचदेवता पूजन करके विष्णु की पूजा भी की जाती है। विष्णु की पूजा को मिलाकर देखें तो षड्देवता पूजन सिद्ध हो जाता है। कुछ लोगों को यह भ्रम रहता है कि पंचदेवता पूजन में भी विष्णु की पूजा की गयी और पुनरावृत्ति भी की गयी। किन्तु वास्तविकता यह नहीं है, वास्तव में मिथिला षड्देवता पूजन की परम्परा का पालन करता है।

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दिग्बंधन विधि या दिग्-रक्षण

दिग्बंधन विधि या दिग्रक्षण : बांये हाथ में पिली सरसों, तिल, दूर्वा आदि लेकर दांये हाथ से ढंककर रक्षोघ्नसूक्त का पाठ करना चाहिए। तत्पश्चात दशों दिशाओं में छिड़काव करना चाहिए। कर्म भंग न हो और असुरादिकों को भाग न मिले इसलिए रक्षाविधान एक विशेष प्रक्रिया है और सजगतापूर्वक इस क्रिया को वैदिक विधि से सम्पादित करने की आवश्यकता होती है।

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पूजा क्या है

पूजा क्या है पूजा क्या है ?       पूजा का शाब्दिक अर्थ ‘सम्मान देना/आदर-सत्कार करना’ बताया गया है। कर्मकाण्ड में पूजा एक प्रक्रिया है जो जीव और ईश्वर के मध्य घटित होता है। इसमें मनुष्य पत्र-पुष्प-फलादि ईश्वर को प्रतिमा या आवाहित स्थान पर समर्पित करता है और जब ये प्रक्रिया मन ही मन होती है…

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