सवर्णों का वैधानिक उत्पीड़न और कालनेमि रूपी शासन का षड्यंत्र। शास्त्रों के दर्पण में वर्तमान राजनैतिक विभीषिका का विस्तृत विवरण।
सम्मोहक राष्ट्रवाद का मायाजाल वर्तमान भारतीय राजनीति के रंगमंच पर ‘विकासपुरुष’ द्वारा एक ऐसा मायाजाल निर्मित किया गया है, जिसने कोटि-कोटि सनातनी हिन्दुओं, विशेषकर राष्ट्रवादी वर्ग की आँखों पर सम्मोहक पट्टी बांध दी है। ‘सबका साथ-सबका विकास’ और ‘अमृत काल’ जैसे नारों के शोर में उस वैधानिक खड्ग की ध्वनि अनसुनी कर दी गई है, जो सवर्ण समाज की मेधा और मर्यादा के कंठ पर निरंतर चल रही है। यह आलेख इसी पट्टी को उतारने का एक विनम्र किन्तु कठोर प्रयास है।
विकास की वेदी पर अस्तित्व की आहुति: क्या २०४७ का भारत केवल एक जलता हुआ खंडहर होगा?
“जिस दिन मेधा का तिरष्कार किया गया और धर्म पर वैधानिक प्रहार हुआ, उसी दिन राष्ट्र का पतन सुनिश्चित हो गया। २०४७ का विकसित भारत सवर्णों की कब्र पर खड़ा एक क्रूर मजाक होगा।”
सुरक्षा बनाम विकास का द्वंद्व इतिहास का यह शाश्वत सत्य है कि सुरक्षा के अभाव में विकास केवल आक्रांताओं के उपभोग की वस्तु बनकर रह जाता है। जिस प्रकार एक दुर्बल दुर्ग के भीतर स्वर्ण जड़ित अट्टालिकाएँ किसी काम की नहीं होतीं, उसी प्रकार सवर्ण समाज के अस्तित्व को शून्य करके २०४७ का ‘विकसित भारत’ केवल एक जलता हुआ खंडहर सिद्ध होगा। हम विकास की उस वेदी की चर्चा कर रहे हैं, जहाँ सवर्णों की आहुति दी जा रही है।
कालनेमि का छद्मवेष त्रेतायुग में हनुमान जी को भ्रमित करने हेतु कालनेमि ने जिस प्रकार साधु का वेष धरा था, वर्तमान सत्ता तंत्र भी उसी छद्मवेष में सवर्णों को सम्मोहित कर रहा है। मंदिरों का जीर्णोद्धार और तीर्थों का पर्यटन में रूपांतरण करके विकास का पाठ पढ़ाना वस्तुतः उस वास्तविकता को छिपाने का प्रयास है, जहाँ सवर्णों को अपने ही देश में वैधानिक रूप से अछूत और अपराधी बनाने की पटकथा शनैः शनैः लिखी जा रही है और ‘हायर एजुकेशन रेगुलेशन २०२६’ के माध्यम से इसका भेद खुल चुका है।
१. राष्ट्रवाद की पट्टी और विकास का सम्मोहन
आधुनिक राजनीति ने ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को इतना विकृत कर दिया है कि अब यह केवल सत्ता-प्रेम का पर्यायवाची बनकर रह गया है। लोगों को विकास का ऐसा चश्मा पहनाया गया है कि उन्हें अपनी गर्दन पर लटकती ‘SC/ST Act’ और ‘यूजीसी २०२६’ की तलवार दिखाई नहीं दे रही। शासन ने चतुरतापूर्वक सवर्णों को यह विश्वास दिलाया कि यदि वह मंदिर बनवा रहे हैं, तो वे सनातनी हैं। किन्तु शास्त्र क्या कहते हैं?

“न्यायोपार्जितवित्तेन कर्तव्यं धर्मरक्षणम्।” (अर्थात: न्यायपूर्वक अर्जित धन और नीति से ही धर्म की रक्षा संभव है।)
जब शासन की नीतियां ही अन्यायी हों, जहाँ सवर्णों का वैधानिक उत्पीड़न ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ की सीमा पार कर चुका हो, वहाँ निर्मित मंदिर केवल पर्यटन केंद्र हो सकते हैं, धर्म के जीवंत विग्रह नहीं। काशी में जिस प्रकार प्राचीन मंदिरों और प्रतिमाओं के विखंडन की वार्ता सामने आई, उसे राष्ट्रवादियों ने ‘विपक्ष का प्रोपेगेंडा’ समझा। किंतु गंगा में क्रूज चलाकर और मां गंगा के पावन जल में आधुनिकता के नाम पर मल-मूत्र विसर्जित कर जिस प्रकार की ‘धार्मिक राजनीति’ की गई, उसने कालनेमि के वास्तविक स्वरूप का भंडाफोड़ कर दिया है।
अति सर्वत्र वर्जयेत् (उत्पीड़न की पराकाष्ठा) सामान्य वर्ग के विरुद्ध वैधानिक अत्याचार आज उस सीमा पर पहुँच चुका है जहाँ से वापसी का कोई मार्ग शेष नहीं बचता। आरक्षण की रोटियाँ छीनने से प्रारंभ हुआ यह सफर अब ‘यूजीसी २०२६’ के माध्यम से बेटियों और मर्यादा को छीनने तक पहुँच गया है। शास्त्र कहते हैं—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।” जब धर्म (मर्यादा और न्याय) की हानि पराकाष्ठा पर पहुँचती है, तब विनाश अवश्यम्भावी होता है। सवर्णों को विकास दिखाया जा रहा है, किंतु उनकी सुरक्षा का कवच एक-एक कर उतारा जा रहा है।
२. सुरक्षा की बलि: अस्तित्वविहीन विकास की निरर्थकता
“सुरक्षा विहीन विकास आक्रांताओं का निमंत्रण है। यदि आज तुम अपनी बेटियों और मर्यादा की रक्षा नहीं करोगे, तो तुम्हारा विकास किसी अन्य की विलासिता का साधन बनेगा।”
विकास और सुरक्षा में जब संघर्ष हो, तो बुद्धिमान सदैव सुरक्षा का चयन करता है।
यदि आप सुरक्षित नहीं हैं, तो आपकी मेधा द्वारा अर्जित विकास का लाभ अंततः वही वर्ग उठाएगा जिसे शासन ‘विशेषाधिकार’ प्रदान कर रहा है। सवर्णों की रोटियां ‘आरक्षण’ से पहले ही छीनी जा चुकी थीं, अब ‘यूजीसी २०२६’ के माध्यम से उनकी बेटियों की सुरक्षा और कुल की मर्यादा पर प्रहार किया जा रहा है। २०४७ का भारत विकसित नहीं होगा, बल्कि वह एक ऐसे गृहयुद्ध की ज्वाला में होगा जहाँ एक वर्ग (सवर्ण) अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहा होगा।

३. संघ और आर्यसमाज: शास्त्रीय मतांतरण के आधुनिक कालनेमि
“कालनेमि रूपी शासन ने तुम्हें शस्त्र और शास्त्र दोनों से विमुख कर दिया है। सनातनी होने का अर्थ संघ का दास होना नहीं, बल्कि शास्त्रों का रक्षक होना है।”
इस विनाशकारी स्थिति के पीछे वह वैचारिक ‘मतांतरण’ उत्तरदायी है, जिसे संघ और आर्यसमाज जैसे संगठनों ने ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर हिंदुओं के मस्तिष्क में भरा है। इन्होंने सनातनी हिंदुओं को ‘शस्त्रविरोधी’ बनाकर वास्तव में उन्हें ‘अधर्मी’ बना दिया है।
शास्त्रों का विरूपण और मनगढंत विचारधारा तथाकथित राष्ट्रवादी आज शास्त्रों की चर्चा शास्त्रों के अनुसार नहीं, अपितु संघ की विचारधारा के अनुसार करते हैं। जो कार्य विदेशी म्लेच्छ सहस्रों वर्षों में नहीं कर सके, वह संघ ने दिग्भ्रमित करके कर दिया। आज ये लोग कुतर्क देते हैं कि “वर्ण का आधार जन्म नहीं, कर्म है” और “जाति व्यवस्था अंग्रेजों ने बनाई है।”
इस विनाश का मूल कारण वह वैचारिक मतांतरण है जो संघ और आर्यसमाज जैसे संगठनों ने दशकों से किया है। इन्होंने राष्ट्रवादियों को यह विश्वास दिलाया कि “शस्त्रों की आवश्यकता नहीं, केवल सेवा ही धर्म है” और “शास्त्र प्रक्षिप्त हैं।” यह शस्त्रविरोधी विचारधारा वस्तुतः ‘अधर्मी’ बनाने का षड्यंत्र है। शास्त्र स्पष्ट घोषणा करते हैं:
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।” (गीता ४.१३) यहाँ ‘गुण और कर्म’ का विभाग पूर्वजन्मों के संस्कारों और जन्मना वर्ण से ही निर्धारित होता है। किंतु इन आधुनिक कालनेमियों ने शास्त्रों को ‘प्रक्षिप्त’ (बाद में जोड़ा गया) और ‘आउटडेटेड’ कहकर सनातनी समाज को उसकी मूल जड़ों से काट दिया है।
शास्त्रों में वर्ण का आधार ‘जन्म’ है, किन्तु इन आधुनिक कालनेमियों ने उसे ‘कर्म’ बताकर सनातन धर्म की मूल व्यवस्था को ही ध्वस्त कर दिया। म्लेच्छों ने तलवार से जो कार्य नहीं किया, वह संघ ने ‘बौद्धिक भ्रम’ से कर दिया। सवर्णों को शास्त्रों से दूर करके उन्हें ‘मानसिक म्लेच्छ’ बनाया जा रहा है ताकि वे अपने विरुद्ध होने वाले वैधानिक अत्याचारों को भी ‘राष्ट्रहित’ मानकर स्वीकार कर लें।
जब ये संगठन मतांतरण-मतांतरण का शोर मचाते हैं, तो वास्तव में ये स्वयं भी सनातनी हिंदुओं का ‘शास्त्रीय मतांतरण’ ही कर रहे होते हैं। वे शास्त्र-विरोधी सेना खड़ी कर रहे हैं जो धर्म के नाम पर अधर्म को ही सत्य मानेगी।
४. वैधानिक संहार: रोटी से बेटी तक की कुत्सित यात्रा का उद्भेदन
शासन ने ‘दलित-वंचित-शोषित-पिछड़ा’ का ऐसा कृत्रिम नैरेटिव खड़ा किया है, जिसने समाज के अन्य वर्गों को सवर्णों (विशेषकर ब्राह्मण और वैश्य) का वैधानिक शत्रु बना दिया है। “ब्राह्मणों भारत छोड़ो” के नारे आज सड़कों पर गूँज रहे हैं, और सरकार इसे ‘सामाजिक न्याय’ कहकर मौन स्वीकृति दे रही है।
‘हायर एजुकेशन रेगुलेशन २०२६’ कोई साधारण नियम नहीं है। यह सवर्ण कन्याओं को ‘येन-केन-प्रकारेण’ हड़पने और सवर्णों को देश से बाहर भगाने का वैधानिक मार्ग है।
कश्मीर में जो नारा लगाया गया था— “बेटियों-बहुओं को छोड़कर जाओ”, वही नारा अब परिष्कृत रूप में वैधानिक जामा पहनकर आपके सम्मुख है। जातिवाद मिटाने का ढोंग वस्तुतः सवर्ण कन्याओं को सामाजिक रूप से असुरक्षित करने का उपक्रम है। यदि सवर्ण आज अपनी पट्टी नहीं उतारता, तो उसे या तो हिन्द महासागर में डूबना होगा या अपने ही घर में शरणार्थी बनकर मर्यादा की आहुति देनी होगी, बहू-बेटी के अस्मिता की बलि देनी होगी।

५. धर्मो रक्षति रक्षितः : वास्तविक रक्षा का सूत्र
तुम्हारी रक्षा न तो विकासपुरुष करेंगे, न ही संघ की अधर्मी विचारधारा। तुम्हारी रक्षा केवल तुम्हारा धर्म कर सकता है। किंतु धर्म का तात्पर्य वह नहीं है जो इन संगठनों ने तुम्हारे मस्तिष्क में भर दिया है; धर्म का तात्पर्य वह है जो शास्त्रों से ज्ञात होता है।
“ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:।” (ऋग्वेद १०.९०.१२)
धर्मो रक्षति रक्षितः
ब्राह्मण: पृथ्वी का चल-देवता शास्त्र ब्राह्मण को पृथ्वी का देवता मानते हैं:
“देवमूर्तिमयीं विप्रान् सर्वदेवात्मका हि ते।” ब्राह्मण द्वेष और ब्राह्मण विरोध को शास्त्र घोर अधर्म और पतन का लक्षण मानते हैं। जो लोग ब्राह्मणों को गाली दे रहे हैं या मारने की बात करते हैं, वे सनातनी नहीं हो सकते। वे केवल वैधानिक लाभ हेतु ‘हिंदू’ बने हुए ‘मानसिक म्लेच्छ’ हैं।
शास्त्रों ने ब्राह्मण को पृथ्वी का देवता कहा है। जो ब्राह्मण-द्वेष करते हैं, जो सवर्णों को गाली देते हैं और वैधानिक लाभ लेकर स्वयं को हिन्दू कहते हैं, वे वास्तव में ‘पतित’ हैं। यदि तुम धर्म (शास्त्रीय मर्यादा) की रक्षा करोगे, तभी धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा। “धर्मो रक्षति रक्षितः” का अर्थ यह है कि जब आप शास्त्रों के विरुद्ध आचरण करते हैं, तो आप प्रकृति के सुरक्षा चक्र से बाहर हो जाते हैं। आज सवर्णों पर होने वाले संवैधानिक प्रहार उनके ‘धर्म-त्याग’ का ही परिणाम हैं।
देश को शताब्दियों तक चलने वाले गृहयुद्ध में झोंका जा चुका है। २०४७ का भारत ‘विश्वगुरु’ नहीं, बल्कि एक जलता हुआ ज्वालामुखी होगा। जब एक मेधावी सवर्ण को शिक्षा से वंचित किया जाएगा, जब उसके कुल की मर्यादा पर वैधानिक प्रहार होगा, तो वह ‘अहिंसा’ की पट्टी उतारकर शस्त्र उठाने पर विवश होगा। यही वह गृहयुद्ध है जिसकी भूमिका वर्तमान सत्ता ने अपने घृणित तुष्टिकरण और सवर्ण-विरोध से लिखी है।
निष्कर्ष
चेतना का अंतिम शंखनाद देश शताब्दियों के गृहयुद्ध में झोंका जा चुका है। अब प्रश्न यह नहीं है कि युद्ध होगा या नहीं, प्रश्न यह है कि उस समय आप शस्त्रसम्मत धर्म के साथ होंगे या शास्त्र-विरोधी सम्मोहन में अपनी आहुति देंगे। विकास और राष्ट्रवाद की पट्टी उतारो और वास्तविकता का सामना करो।
गृहयुद्ध की अनिवार्यता : जब राज्य ही अपराधी का संरक्षक बन जाए और योग्यता का वध वैधानिक रूप से किया जाने लगे, तो प्रकृति स्वयं ‘कुरुक्षेत्र’ का निर्माण करती है। सवर्णों के विरुद्ध घृणित दमनकारी राजनीति जिसने छद्म समानता-उत्थान-विकास आदि की ओट ले रखा है; ने आज वापसी के समस्त मार्ग बंद कर दिए हैं। गृहयुद्ध ही अब वह शोधक अग्नि है जिससे सनातन की पुनर्स्थापना होगी और देश को गृहयुद्ध की अग्नि में झोंक दिया है। इसका पूर्ण उत्तरदायित्व देश के कर्णधारों को जाता है।

शास्त्रों की ओर वापसी ही अंतिम मार्ग अस्तित्व की रक्षा केवल ‘स्वधर्म’ में प्रतिष्ठित होने से ही संभव है। मनमुखी व्याख्याओं का त्याग करो और शास्त्रों को आत्मसात करो। यदि तुम धर्म की रक्षा करोगे, तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा। “यतो धर्मस्ततो जयः” के मंत्र को जीवन का आधार बनाओ।
FAQ
प्रश्न : क्या २०४७ का भारत विकसित होगा?
उत्तर : नहीं, जिस दिशा में नीतियां जा रही हैं, वह देश को गृहयुद्ध की ओर ले जा रही हैं।
प्रश्न : UGC Regulation 2026 सवर्णों के लिए खतरा क्यों है?
उत्तर : क्योंकि यह सवर्णों को बिना साक्ष्य के अपराधी सिद्ध करने का वैधानिक यंत्र है।
प्रश्न : विकास और सुरक्षा में क्या महत्वपूर्ण है?
उत्तर : सुरक्षा अनिवार्य है, क्योंकि असुरक्षित समाज विकास का लाभ नहीं ले सकता।
प्रश्न : संघ सनातनी क्यों नहीं है
उत्तर : क्योंकि संघ शास्त्रों की मनमुखी व्याख्या करता है और जन्मना वर्ण व्यवस्था का विरोध करता है।
प्रश्न : ब्राह्मण विरोध को शास्त्र क्या कहते हैं?
उत्तर : शास्त्र इसे अधर्म और पतित होने का लक्षण मानते हैं।
प्रश्न : क्या गृहयुद्ध को रोका जा सकता है?
उत्तर : केवल अष्टसूत्री सुधारों द्वारा इसके विनाश को कम किया जा सकता है।
प्रश्न : क्या आरक्षण सामाजिक न्याय है?
उत्तर : नहीं, यह सवर्णों की मेधा और रोटियों का वैधानिक अपहरण है।
प्रश्न : ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ का अर्थ क्या है?
यदि आप धर्म (शास्त्रीय नियमों) की रक्षा करेंगे, तो धर्म संकट में आपकी रक्षा करेगा।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख विशुद्ध रूप से वैचारिक अन्वेषण और उपलब्ध राजनैतिक-नीतिगत तथ्यों के शास्त्रीय विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या समूह के विरुद्ध वैमनस्य फैलाना नहीं, बल्कि अस्तित्वगत संकट के प्रति समाज को सचेत करना है। आलेख में प्रयुक्त ‘गृहयुद्ध’ शब्द सामाजिक और वैधानिक संघर्ष की उस पराकाष्ठा का सूचक है, जो इतिहास में दमनकारी नीतियों के उपरांत अनिवार्यतः घटित होती रही है। शास्त्रीय उद्धरण और पौराणिक संदर्भों का प्रयोग वर्तमान विसंगतियों को प्राचीन मर्यादा के आलोक में स्पष्ट करने हेतु किया गया है। लेखक का उद्देश्य सनातन धर्म की मूल रक्षा है। पाठक विवेक से सत्य का अन्वेषण करें।
१. वैचारिक एवं शास्त्रीय विमर्श का उद्देश्य: यह आलेख पूर्णतः स्वतंत्र वैचारिक विश्लेषण, उपलब्ध राजनैतिक तथ्यों और सनातन धर्म के शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संस्था, दल या समुदाय के विरुद्ध घृणा अथवा हिंसा भड़काना नहीं, बल्कि सवर्ण समाज (सामान्य वर्ग) के विरुद्ध हो रहे वैधानिक प्रहारों के प्रति जन-चेतना जागृत करना और नीतिगत निर्णयों के दूरगामी सामाजिक-धार्मिक परिणामों पर ‘दो टूक’ विमर्श प्रस्तुत करना है।
२. शब्दावली और प्रतीकों का स्पष्टीकरण: आलेख में प्रयुक्त ‘गृहयुद्ध’, ‘शस्त्रधारण’ और ‘कालनेमि’ जैसे शब्द सामाजिक असंतोष की गंभीर पराकाष्ठा और शास्त्रों में वर्णित प्रतीकों के आधार पर आलंकारिक रूप से प्रयुक्त किए गए हैं। इनका उद्देश्य संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर राजनैतिक सुधारों की मांग करना और शास्त्र-सम्मत मर्यादा का स्मरण कराना है। लेखक और प्रकाशक किसी भी प्रकार की असंवैधानिक गतिविधियों का समर्थन नहीं करते।
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