“जिस स्वतंत्रता में विवेक का अंकुश नहीं, वह पशुता का निमंत्रण पत्र है।”
प्रस्तावना: शब्दावलियों का मायाजाल और वैचारिक पतन
आधुनिक युग में शब्दावलियाँ केवल संवाद का माध्यम नहीं, अपितु वैचारिक अस्त्र बन गई हैं। ‘स्वतंत्रता’, ‘समानता’, ‘लोकतंत्र’ और ‘संविधान’—ये शब्द सुनने में जितने उदात्त और कल्याणकारी प्रतीत होते हैं, आज इनका उतना ही भयावह दुरुपयोग हो रहा है। विडंबना यह है कि इन शब्दों की ओट में समाज को उस दिशा में धकेला जा रहा है जहाँ केवल स्वछंदता (Licentiousness) है, ‘स्वतंत्रता’ नहीं। यदि समय रहते इस बौद्धिक प्रमाद को न रोका गया, तो मानवीय सभ्यता का रसातल में जाना सुनिश्चित है।
संविधान, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता का अनर्थ – रसातल जाता समाज
मानवीय सभ्यता के इतिहास में वर्तमान कालखंड अपनी तकनीकी प्रगति के लिए जितना विख्यात है, अपनी वैचारिक दरिद्रता और अर्थगत अनर्थ के लिए उतना ही कुख्यात सिद्ध हो रहा है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ ‘शब्द’ जीवित हैं किंतु उनके ‘मर्म’ की हत्या कर दी गई है। संविधान, लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समानता—ये वे चार स्तंभ थे जिन पर एक आदर्श समाज की अट्टालिका निर्मित होनी थी। किंतु आज इन शब्दों का प्रयोग केवल स्वार्थ-सिद्धि, उच्छृंखलता और सामाजिक विखंडन के लिए किया जा रहा है।
समाज का एक बड़ा वर्ग, विशेषकर तथाकथित बुद्धिजीवी और दिग्भ्रमित युवा पीढ़ी, ‘स्वतंत्रता’ को ‘स्वछंदता’ का पर्यायवाची मान बैठी है। यह एक ऐसी बौद्धिक महामारी है जो समाज को रसातल की ओर ले जा रही है। इस आलेख का ध्येय उन भ्रांतियों का उच्छेदन करना है जो आधुनिकता के आवरण में हमारी नैसर्गिक और सामाजिक जड़ों को काट रही हैं।
स्वतंत्रता बनाम स्वछंदता: एक भ्रामक व्याख्या
“स्वतंत्रता का अर्थ बंधनों का अभाव नहीं, बल्कि श्रेष्ठ मर्यादाओं का चुनाव है।”
स्वतंत्रता का शाब्दिक अर्थ है—’स्व’ के ‘तंत्र’ में होना। यहाँ ‘स्व’ का अर्थ अहंकार या पाशविक इच्छाएँ नहीं, अपितु ‘आत्मा’ और ‘विवेक’ है। जब मनुष्य अपने विवेक और मर्यादा के शासन में रहता है, तब वह स्वतंत्र है। इसके विपरीत, जब मनुष्य अपनी इंद्रियों का दास होकर मर्यादाओं का उल्लंघन करता है, तो उसे ‘स्वछंदता’ या ‘स्वेच्छाचारिता’ कहते हैं।
आज का विमर्श स्वतंत्रता के नाम पर जिस स्वछंदता का पाठ पढ़ा रहा है, वह वास्तव में मनुष्य को पशुता की ओर धकेलना है। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल “वही करना जो मन को भाए” है, तो समाज और जंगल में क्या भेद रह जाएगा?
आज की पीढ़ी को स्वतंत्रता का अर्थ ‘मनमानी’ सिखाया जा रहा है। स्वतंत्रता (Self-rule) का अर्थ है स्वयं के तंत्र में बंधना, जबकि स्वछंदता का अर्थ है समस्त बंधनों का उच्छेद करना। लोग तर्क देते हैं कि “यह मेरा जीवन है, मैं जो चाहूँ वो करूँ, क्योंकि संविधान मुझे व्यक्तिगत स्वतंत्रता देता है।”

माता-पिता की महिमा: शास्त्रीय प्रमाण
वर्तमान युवा पीढ़ी प्रायः पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में ‘निजी स्वतंत्रता’ को सर्वोच्च मानती है, जो वास्तव में उनके आध्यात्मिक पतन का कारण है। शास्त्रों ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता की प्रसन्नता के बिना कोई भी साधना सफल नहीं होती।
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम् ।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥
अर्थ: माता-पिता अपनी सन्तान के पालन-पोषण में जिस क्लेश को सहते हैं, उसका बदला सौ वर्षों में भी नहीं चुकाया जा सकता।

आधुनिक स्वतंत्रता के दम्भ में युवा यह भूल जाते हैं कि उनके अस्तित्व का आधार और प्रथम गुरु उनके माता-पिता ही हैं। शास्त्रों में माता-पिता की सेवा को समस्त तीर्थों और यज्ञों से श्रेष्ठ माना गया है।
“जो संतान अपने जन्मदाताओं के प्रति उत्तरदायी नहीं, वह राष्ट्र और संविधान के प्रति निष्ठावान कभी नहीं हो सकती।”
परंतु क्या वास्तव में मनुष्य पूर्णतः स्वतंत्र है?
स्वतंत्रता की दुहाई देने वाले अक्सर यह भूल जाते हैं कि वे एक ‘जैविक इकाई’ (Biological Entity) हैं, जो प्रकृति के अटल नियमों से बंधी है। आप कितने ही ‘स्वतंत्र’ क्यों न हो जाएँ, क्या आप प्रकृति के वेगों को चुनौती दे सकते हैं? आपकी शारीरिक संरचना और नैसर्गिक वेग ही आपकी कथित ‘असीमित स्वतंत्रता’ की सीमाएं निर्धारित कर देते हैं। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति है, तो विचार कीजिए :
यदि निद्रा का वेग आए, तो क्या आप यह कह सकते हैं कि “मुझे सोने की स्वतंत्रता है, इसलिए मैं मल-मूत्र का त्याग बिछौने पर ही करूँगा”?
यदि भूख लगे, तो क्या आधुनिकता के नाम पर आप अन्न-जल का त्याग कर मिट्टी या लौह-कण चबाने लगेंगे?
सृष्टि के आदि काल से वायु, जल और भोजन की जो मर्यादा प्रकृति ने तय की है, उसे चुनौती देना स्वतंत्रता नहीं, अपितु आत्मघात है। आपकी ‘स्वास’ (सांस) ही आपकी स्वतंत्रता को असिद्ध कर देती है; आप दो मिनट भी स्वेच्छा से अपनी सांस नहीं रोक सकते। जब प्रकृति के नैसर्गिक नियम आपको नियंत्रित करते हैं, तो संविधान की दुहाई देकर सामाजिक और नैतिक मर्यादाओं को तोड़ना केवल एक कुतर्क है।
संविधान की सीमा और नैसर्गिक मूल्य
“संविधान व्यवस्था को नियंत्रित कर सकता है, किंतु चरित्र का निर्माण केवल संस्कार ही कर सकते हैं।”
संविधान राष्ट्र के संचालन की एक नियमावली है, वह जीवन जीने का ‘संपूर्ण दर्शन’ नहीं है। संविधान यह निर्धारित करता है कि नागरिक एक-दूसरे के अधिकारों का हनन न करें और व्यवस्था बनी रहे। वह दंड का विधान करता है, लेकिन वह मनुष्य को ‘मनुष्य’ बने रहने के संस्कार नहीं देता।

- मल-मूत्र का वेग और छद्म स्वतंत्रता: कल्पना कीजिए उस व्यक्ति की जो यह तर्क देता है कि “मुझे अपने घर में कहीं भी लेटने या बैठने की स्वतंत्रता है।” यदि उसे मलमूत्र का वेग आए और वह कहे कि “मैं तो बिस्तर पर ही इसका उत्सर्ग करूँगा क्योंकि मैं स्वतंत्र हूँ”, तो क्या समाज उसे स्वतंत्र कहेगा? नहीं, उसे विक्षिप्त कहा जाएगा। यहाँ उसकी ‘स्वतंत्रता’ उसकी नैसर्गिक शुचिता और स्वास्थ्य के नियम से बंधी है।
- निद्रा और जागरण का चक्र: यदि कोई व्यक्ति संविधान की धारा का उल्लेख करते हुए कहे कि मैं २३ घंटे सोऊँगा और १ घंटा जागूँगा, अथवा इसके विपरीत करेगा, तो क्या संविधान उसे रोक लेगा? कदाचित नहीं। किंतु क्या उसका शरीर उसे अनुमति देगा? कुछ ही दिनों में उसका मानसिक और शारीरिक तंत्र ध्वस्त हो जाएगा। यहाँ संविधान नहीं, अपितु प्रकृति का ‘विधान’ कार्य करता है।
संविधान यह नहीं बताता कि आपको माता-पिता का सम्मान करना चाहिए, या आपको कितने घंटे सोना चाहिए, या आपको समाज में किस प्रकार का आचरण करना चाहिए। ये विषय नैसर्गिक (Natural), सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों के अधीन हैं।
यदि हम हर बात के लिए संविधान की ओर देखेंगे और यह मान लेंगे कि “जो संविधान में वर्जित नहीं, वह सब कुछ करने की हमें छूट है”, तो हम एक ‘कानूनी समाज’ तो बन जाएंगे, लेकिन ‘संस्कारी समाज’ कभी नहीं रह पाएंगे। मर्यादाविहीन स्वतंत्रता अंततः समाज में जंगल राज को जन्म देती है, जहाँ बलशाली की इच्छा ही कानून बन जाती है।
अतः, यह समझना अनिवार्य है कि स्वतंत्रता ‘शून्यता’ में क्रियान्वित नहीं होती। वह सदैव नियमों के अधीन होती है। जो नियम दिखाई नहीं देते (जैसे गुरुत्वाकर्षण या पाचन तंत्र के नियम), वे ही वास्तव में हमारे जीवन का आधार हैं।
समानता का अनर्थ: पूरकता बनाम प्रतिस्पर्धा
समानता (Equality) का अर्थ अवसर की समता और मानवीय गरिमा की समानता था। परंतु आज समानता का अर्थ ‘एकरूपता’ और ‘प्रतिस्पर्धा’ बना दिया गया है। स्त्री-पुरुष, शिष्य-गुरु, और संतान-माता-पिता के बीच के पूरक संबंधों को ‘संघर्ष’ में बदल दिया गया है।
जब हम समानता का अनर्थ करते हैं, तब हम समाज के स्वाभाविक पदानुक्रम और परस्पर निर्भरता को नष्ट कर देते हैं। परिवार, जो समाज की सबसे छोटी और सुदृढ़ इकाई है, आज ‘अधिकारों की लड़ाई’ का अखाड़ा बन गया है। जहाँ त्याग और समर्पण होना चाहिए था, वहाँ अब केवल संविदा (Contract) और स्वार्थ शेष है। यह ‘समानता’ नहीं, अपितु संबंधों का विखंडन है।
लोकतंत्र का दूसरा सबसे अधिक दुरुपयोग किया जाने वाला शब्द है—‘समानता’ (Equality)। समानता का वास्तविक और उदात्त अर्थ था—अवसर की समता, विधि के समक्ष समता और मानवीय गरिमा की सुरक्षा। किंतु आज के बौद्धिक प्रमाद ने समानता का अर्थ ‘एकरूपता’ (Uniformity) और ‘प्रतिस्पर्धा’ (Conflict) निकाल लिया है।
प्रकृति ने सृष्टि की रचना ‘वैविध्य’ पर की है, समानता पर नहीं। वन में प्रत्येक वृक्ष की ऊंचाई भिन्न है, प्रत्येक पशु की शक्ति भिन्न है, और प्रत्येक तत्व का गुण भिन्न है। यह भिन्नता ‘अन्याय’ नहीं, अपितु सृष्टि के संचालन के लिए ‘अनिवार्यता’ है।
- पूरकता का लोप: यदि हाथ कहे कि मैं पैर के समान हूँ और पैर का कार्य करूँगा, तो शरीर पंगु हो जाएगा। समाज में भी गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, पति-पत्नी और स्वामी-सेवक के संबंधों में एक स्वाभाविक पदानुक्रम और पूरकता थी।
- संघर्ष का पाठ: आज समानता के नाम पर पुत्र को पिता के विरुद्ध, स्त्री को पुरुष के विरुद्ध और शिष्य को गुरु के विरुद्ध खड़ा कर दिया गया है। इसे ‘अधिकारों की लड़ाई’ का नाम दिया गया है, जबकि यह वास्तव में उस सामाजिक ताने-बाने का विनाश है जो परस्पर विश्वास और सम्मान पर टिका था।
जब हम समानता का अनर्थ करके हर संबंध में ‘सत्ता का संघर्ष’ (Power Struggle) खोजने लगते हैं, तब प्रेम और श्रद्धा का अंत हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ से समाज रसातल की ओर प्रस्थान करता है।
आधुनिकता का प्रपंच
आधुनिकता के नाम पर आज जीवन के मूलभूत आधारों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। सृष्टि के आरंभ से ही मनुष्य ने जीवित रहने के लिए ‘पंचतत्त्वों’ (पृथ्वी, जल, पावक, गगन, समीर) पर निर्भरता को स्वीकार किया है। अन्न ग्रहण करना और स्वच्छ वायु में श्वास लेना एक शाश्वत सत्य है।
किंतु यदि ‘स्वतंत्रता’ और ‘आधुनिकता’ का अर्थ केवल ‘परंपरा का विरोध’ है, तो तर्कतः मनुष्य को अन्न-जल का भी त्याग कर देना चाहिए।
- धातु और मिट्टी का भक्षण: यदि कोई आधुनिकतावादी यह कहे कि “हजारों वर्षों से मनुष्य अन्न खा रहा है, अब मैं स्वतंत्र हूँ इसलिए मैं लोहा चबाऊँगा या मिट्टी खाऊँगा”, तो परिणाम केवल मृत्यु है।
- सुगंधित धुआं और कृत्रिम वायु: आज की पीढ़ी शुद्ध वायु के स्थान पर ‘हुक्का’, ‘वेप’ या ‘नशीले रसायनों’ के रंग-बिरंगे सुगंधित धुएं को फेफड़ों में भर रही है। वे इसे अपनी ‘जीवनशैली की स्वतंत्रता’ कहते हैं। किंतु क्या उनकी स्वतंत्रता उन्हें दो मिनट श्वास रोकने की अनुमति देती है? आपकी स्वतंत्रता आपकी अपनी धड़कनों पर भी नहीं है, फिर इस स्वछंदता का अहंकार कैसा?
आधुनिकता का अर्थ प्रगति होना चाहिए था, न कि अपनी जड़ों को काटना। आज जिसे आधुनिकता कहा जा रहा है, वह वास्तव में वैचारिक प्रदूषण है। सुगंधित धुएं को सांस में लेना, प्राकृतिक जीवन शैली का त्याग करना और केवल उपभोग को ही जीवन का लक्ष्य मान लेना—यह उस समाज के लक्षण हैं जो मानसिक रूप से रुग्ण हो चुका है।
यह आधुनिकता नहीं, अपितु एक प्रकार का ‘सामूहिक आत्मघात’ है। हम उन नियमों को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं जो हमारे अस्तित्व की रक्षा करते हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो हमारी अगली पीढ़ियाँ न केवल मूल्यों से विहीन होंगी, बल्कि वे अत्यंत हिंसक और कुंठित भी होंगी। यदि आज की पीढ़ी ने अपनी चेतना को जागृत नहीं किया और स्वतंत्रता के नाम पर हो रहे इस अनर्थ को नहीं रोका, तो आने वाली संतानें अपने पूर्वजों को उनके द्वारा बोए गए काँटों के लिए कभी क्षमा नहीं करेंगी ।

आज की आधुनिकता का अर्थ ‘पूर्वजों के ज्ञान का उपहास’ बन गया है। हमारे पूर्वजों ने वायु को ‘देवता’ और जल को ‘जीवन’ कहा था। उन्होंने मर्यादाएँ तय की थीं कि प्रकृति का दोहन कैसे हो।
आज की ‘स्वतंत्र’ पीढ़ी क्या कर रही है?
- कृत्रिमता का मोह: लोग शुद्ध वायु के स्थान पर सुगंधित और विषैले धुएं (Vaping/Smoking) को अपनी जीवनशैली का अंग बना रहे हैं। वे तर्क देते हैं कि “यह मेरी पसंद है।” किंतु क्या यह ‘पसंद’ आपके फेफड़ों की कोशिकाएं भी स्वीकार करती हैं?
- संविधान की दुहाई: जब इन कुरीतियों पर सामाजिक रोक की बात आती है, तो ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ का ढोल पीटा जाता है। क्या संविधान ने आपको अपने स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ी के आनुवंशिक गुणों (Genetics) को नष्ट करने का अधिकार दिया है? कदापि नहीं।
संविधान देश की सीमाओं और व्यवस्था की रक्षा कर सकता है, किंतु यदि समाज स्वयं ही ‘विषपान’ करने पर उतारू हो जाए, तो कोई भी विधि उसे बचा नहीं सकती।
सृष्टि के आदि काल से ही मनुष्य:
- मुख से ही अन्न-जल ग्रहण कर रहा है।
- नासिका से ही प्राणवायु (ऑक्सीजन) ले रहा है।
- चक्षुओं से ही देख रहा है और कर्णों से ही सुन रहा है।
- मलमूत्रोत्सर्ग के लिए प्रकृति ने जो नियत मार्ग बनाए हैं, उन्हीं का उपयोग कर रहा है।
अब प्रश्न यह है कि क्या यह ‘रूढ़िवादिता’ नहीं है? यदि आधुनिकता का अर्थ केवल प्राचीन का त्याग और नवीन का अंधानुकरण है, तो आज के ‘स्वतंत्र’ और ‘प्रगतिशील’ युवाओं को चाहिए मलमूत्रोत्सर्जन मुंह नाक से करें, भोजन और श्वास आदि मलमूत्रोत्सर्जन के इन्द्रियों से करें, कान से देखें, आँखों से सुनें। संविधान तो नहीं रोकता है अर्थात इसकी भी स्वतंत्रता दे रहा है।
यह विडंबना ही है कि जो लोग “मेरा शरीर, मेरी मर्जी” या “संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता” का ढोल पीटते हैं, वे अपनी एक सांस रोकने की भी स्वतंत्रता नहीं रखते। वे प्रकृति के बनाए ‘पुराने’ नियमों के अनुसार जीने को विवश हैं, फिर भी अपनी जड़ों और संस्कारों को ‘रूढ़ि’ कहकर उनका अपमान करते हैं। यह आधुनिकता नहीं, बल्कि बौद्धिक दिवालियापन है।
संविधान: मर्यादा की लक्ष्मण रेखा या स्वछंदता का लाइसेंस?
संविधान की दुहाई आज हर उस कृत्य के लिए दी जाती है जो अनैतिक या असामाजिक है। हमें यह समझना होगा कि संविधान ‘राष्ट्र के शासन’ के लिए है, न कि ‘व्यक्ति के कुशासन’ के लिए।
- संविधान का प्रयोजन: संविधान का मुख्य कार्य एक नागरिक को दूसरे नागरिक के हस्तक्षेप से बचाना और राज्य की शक्तियों को नियंत्रित करना है। वह समाज के ‘बाह्य ढांचे’ को व्यवस्थित करता है।
- संविधान की सीमा: संविधान यह नहीं सिखाता कि पुत्र को पिता के चरण स्पर्श करने चाहिए या नहीं। वह यह नहीं बताता कि भोजन की मर्यादा क्या है। वह यह नहीं बताता कि समाज में शील और लज्जा का क्या महत्व है। ये मूल्य सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं से आते हैं।
जब लोग कहते हैं कि “संविधान में यह नहीं लिखा है कि मैं सार्वजनिक स्थल पर अभद्र व्यवहार नहीं कर सकता”, तो वे वास्तव में समाज के उस अलिखित अनुबंध (Unwritten Social Contract) को तोड़ रहे होते हैं जिसके बिना कोई भी सभ्यता जीवित नहीं रह सकती। संविधान ‘अधिकारों’ की बात करता है, किंतु वे अधिकार ‘कर्तव्यों’ की भूमि पर उगे हुए वृक्ष हैं। यदि कर्तव्य की भूमि सूख जाए, तो अधिकारों का वृक्ष स्वतः गिर जाएगा।
संविधान के संबंध में एक बड़ी दुविधाजनक स्थिति देश की घृणित राजनीति ने उत्पन्न कर दिया है और आप प्रायः एक प्रश्न उठाते देखते-सुनते होंगे कि धर्म बड़ा या संविधान ? और कुछ मूढ़ राजनीतिक व्यक्ति 56 इंच का सीना करके कहते भी मिलेंगे कि मेरे लिये संविधान ऊपर है। मूढ़ कहने का तात्पर्य यह है कि इन लोगों का विवेक, चिंतन-मनन शक्ति मृतप्राय है और इस विषय में बिना सोचे-समझे तपाक से उत्तर दे देते हैं और जनमानस को भी दिग्भ्रमित करते हैं।
यदि हम विचार करें तो जो संविधान है वह लोगों का एक अनुबंध है, नियमावली है जो राज्य के सन्दर्भ में है और धर्म के एक अंश राजधर्म से सम्बद्ध है। यह नियमावली राज्यव्यवस्था के संचालन और व्यक्तिगत-सामाजिक जीवन के लिये कुछ विशेष पहलुओं को भी नियंत्रित करता है।
किन्तु विचार कीजिये जो धर्म के एक अंश राजधर्म से सम्बद्ध है वह धर्म से बड़ा कैसे हो सकता है ? इसी प्रकार धर्म ऊपर या संविधान का भी प्रश्न हो जाता है ? यह प्रश्न ही अज्ञानता की उपज है क्योंकि संविधान जब स्वयं ही धर्म के एक अंश राजधर्म से सम्बद्ध है तो फिर धर्म से ऊपर या नीचे का प्रश्न उत्पन्न ही कैसे हो सकता है ?
सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों का क्षरण
स्वतंत्रता के अनर्थ ने सबसे अधिक प्रहार हमारे पारिवारिक ढांचे पर किया है। परिवार एक ऐसी संस्था है जो ‘त्याग’ और ‘परस्पर पूरकता’ पर आधारित है। किंतु आज यहाँ भी ‘संविधान’ और ‘कानून’ को घुसा दिया गया है।
- संबंधों का विखंडन: माता-पिता और संतान के बीच के प्रेमपूर्ण संबंधों को ‘अधिकारों के युद्ध’ में बदल दिया गया है।
- स्वछंदता का कुप्रभाव: जब एक युवा यह सोचता है कि वह अपने माता-पिता के प्रति उत्तरदायी नहीं है क्योंकि संविधान उसे ‘निजी स्वतंत्रता’ देता है, तब वह वास्तव में उस सामाजिक सुरक्षा चक्र को तोड़ रहा होता है जिसने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया।
यदि हम हर मानवीय संबंध को केवल कानूनी तराजू पर तौलेंगे, तो समाज में केवल ‘अकेलापन’ और ‘अवसाद’ (Depression) ही बचेगा। एक ऐसा समाज जहाँ लोग एक-दूसरे से केवल कानून के डर से बंधे हों, वह समाज नहीं बल्कि एक ‘बंदीगृह’ है।
समाधान: विवेक और मर्यादा का पुनरागमन
इस रसातल की यात्रा को रोकने का केवल एक ही मार्ग है—शब्दावलियों का शुद्धिकरण और विवेक का जागरण।
संविधान को राष्ट्र का रथ समझें, जीवन की आत्मा नहीं: संविधान देश की व्यवस्था के लिए है। जीवन के लिए तो धर्म, दर्शन और नैसर्गिक मूल्य ही आधार होने चाहिए।
- स्वतंत्रता की सीमा: स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जानी चाहिए जहाँ से दूसरे की शांति या प्रकृति के नियम का उल्लंघन शुरू हो। मल-मूत्र के वेग और भोजन के उदाहरणों से स्पष्ट है कि हम नियमों के दास नहीं, अपितु नियमों के ‘संरक्षण’ में हैं।
- प्राकृतिक जीवन की ओर वापसी: आधुनिकता का अर्थ सुगंधित धुआं या नैसर्गिक नियमों का त्याग नहीं, बल्कि ज्ञान की पराकाष्ठा होना चाहिए। यदि हम श्वास रोकने की स्वतंत्रता नहीं रखते, तो हमें प्रकृति के विरुद्ध जाने का भी कोई अधिकार नहीं है।
संविधान, लोकतंत्र और स्वतंत्रता का अनर्थ करना बंद करना होगा। समानता का अर्थ संघर्ष नहीं, बल्कि ‘सह-अस्तित्व’ होना चाहिए। यदि हम अपनी चेतना को आज जागृत नहीं करते, तो हम इतिहास के उन पन्नों में दर्ज होंगे जिन्होंने अपनी ही सभ्यता को अपने हाथों से नष्ट किया।
याद रहे, संविधान समाज को दंडित कर सकता है, उसे सुधार नहीं सकता। समाज का सुधार केवल और केवल नैसर्गिक, सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों के पुनरुद्धार से ही संभव है। समय रहते मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को पहचानिए, अन्यथा रसातल अधिक दूर नहीं है।
एक बार विचार करके तो देखो तुम जिस परम्परा, आदर्श, मूल्य आदि को संविधान की ओट लेकर तोड़ रहे हो दोनों की आयु क्या है ? इस संविधान की आयु अभी ७५ वर्ष है और इसको बदला जा सकता है, भंग भी किया जा सकता है। किन्तु संविधान की ओट में जिन मूल्यों का उल्लंघन करते हो वह करोड़ों वर्ष प्राचीन है, तुम नष्ट कर ही नहीं सकते और तुम्हारे नष्ट होते-होते भी उसकी जड़ें शेष रहेंगी एवं पुनः विशाल वृक्ष बन जायेगा। विदेशी आक्रांताओं ने तो जी-जान से प्रयास किया था और आज भी कर ही रहे हैं किन्तु नष्ट नहीं कर पाये।
ये तो कुछ वैसा है जैसे कोई तुम्हें एक मशीनी हाथ बनाकर दे किन्तु यह कहे कि तुम्हारा जो वास्तविक हाथ है उसे काटकर अलग करना होगा। अब मशीनी हाथ के लिये अपने वास्तविक हाथ को काट लेने वाला महामूर्ख ही तो कहा जा सकता है।
“मर्यादा न लङ्घयेत् क्वचित्।” (मर्यादा का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए।)
किंतु आज ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर मर्यादा को ही बेड़ियाँ सिद्ध किया जा रहा है।
निष्कर्ष
हमें समझना होगा कि:
संविधान देश चलाने के लिए है, चरित्र निर्माण के लिए धर्म (कर्तव्य) और संस्कार अनिवार्य हैं।
- संविधान समाज को बाह्य रूप से अनुशासित करता है।
- धर्म और संस्कार समाज को आंतरिक रूप से सुसंस्कृत करते हैं।
स्वतंत्रता का अर्थ है—अपने श्रेष्ठ स्वरूप को प्राप्त करने की सुविधा। स्वछंदता का अर्थ है—अपनी नीच प्रवृत्तियों के आगे घुटने टेक देना। यदि हमने स्वतंत्रता और स्वछंदता के इस सूक्ष्म भेद को नहीं समझा, तो हम एक ऐसी भीड़ बनकर रह जाएंगे जिसके पास अधिकार तो बहुत होंगे, किंतु ‘जीवन’ शून्य होगा।
समय आ गया है कि हम ‘स्वतंत्रता’ को ‘स्वछंदता’ से अलग करें और ‘संविधान’ की आड़ में किए जा रहे अनैतिक कृत्यों का विरोध करें। समाज केवल कानूनों से नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, मर्यादा और नैसर्गिक मूल्यों से चलता है। यदि हम अब भी नहीं जागे, तो रसातल की यात्रा अटूट है।
“अति सर्वत्र वर्जयेत्” — स्वतंत्रता की अति जब स्वछंदता बन जाए, तो वह विनाश का पथ प्रशस्त करती है। जागिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
FAQ
प्रश्न : स्वतंत्रता और स्वछंदता में क्या अंतर है?
उत्तर : स्वतंत्रता का अर्थ है विवेक और मर्यादा के भीतर ‘स्व’ के तंत्र में रहना, जबकि स्वछंदता का अर्थ है नैसर्गिक, सामाजिक और नैतिक बंधनों को तोड़कर केवल इंद्रियों की इच्छा के अनुसार मनमाना आचरण करना।
प्रश्न : क्या संविधान व्यक्ति को पूर्ण स्वछंदता का अधिकार देता है?
उत्तर : नहीं, संविधान राष्ट्र संचालन की एक नियमावली है जो अधिकारों के साथ कर्तव्यों और अन्य नागरिकों की सुरक्षा की सीमाएं भी तय करता है। यह नैसर्गिक और पारिवारिक मूल्यों के हनन का लाइसेंस नहीं देता।
प्रश्न : आधुनिकता के नाम पर परंपराओं का विरोध क्यों गलत है?
उत्तर : यदि परंपरा का विरोध ही आधुनिकता है, तो हमें सांस लेने या भोजन करने जैसी प्राचीन जैविक क्रियाओं को भी छोड़ देना चाहिए, जो असंभव है। परंपराएं समाज के अनुभव का निचोड़ और सुरक्षा चक्र होती हैं।
प्रश्न : लेखक ने ‘अगली पीढ़ी के आक्रोश’ की चेतावनी क्यों दी है?
उत्तर : क्योंकि यदि आज की पीढ़ी स्वतंत्रता के नाम पर मर्यादाएं तोड़कर समाज को खोखला करेगी, तो आने वाली पीढ़ी को एक असुरक्षित, संस्कारविहीन और रुग्ण समाज मिलेगा, जिसके लिए वे अपने पूर्वजों का तिरस्कार करेंगे।
प्रश्न : क्या प्राकृतिक नियम संविधान से ऊपर हैं?
उत्तर : जीवन की क्रियाशीलता, पारिवारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के संदर्भ में हाँ। संविधान आपको सोने या खाने के घंटे नहीं बताता, लेकिन प्रकृति के नियम (जैसे भूख, प्यास, नींद) आपको नियंत्रित करते हैं। इन नैसर्गिक नियमों का उल्लंघन आत्मघाती है।
प्रश्न : क्या पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों का आधुनिक युग में भी पालन करना सही है ?
उत्तर : नई पीढ़ी को इसी विषय में सर्वाधिक भ्रमित किया जा रहा है और संविधान वर्णित स्वतंत्रता को स्वछंदता समझाया जा रहा है। आधुनिक युग या संविधान में वर्णित स्वतंत्रता का तात्पर्य यह है ही नहीं कि नैसर्गिक व्यवस्था, पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों का भी उल्लंघन किया जाय।
प्रश्न : क्या संविधान धर्म से ऊपर है?
उत्तर: वैचारिक रूप से संविधान ‘राजधर्म’ का एक हिस्सा है, जो राज्य व्यवस्था चलाने के लिए बना है। चूंकि यह स्वयं धर्म का एक अंग है, इसलिए यह पूर्ण (धर्म) से ऊपर नहीं हो सकता। यह एक सामाजिक अनुबंध है, जबकि धर्म शाश्वत और नैसर्गिक है।
प्रश्न : संविधान की ओट में स्वछंदता का क्या अर्थ है?
उत्तर: जब लोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हवाला देकर माता-पिता का अपमान करते हैं, अभद्र आचरण (दुराचार) करते हैं या नैसर्गिक मर्यादाओं को तोड़ते हैं, तो वे संविधान का दुरुपयोग कर रहे होते हैं। संविधान व्यवस्था के लिए है, चरित्र के पतन के लिए नहीं।
प्रश्न : अगली पीढ़ी वर्तमान पीढ़ी का तिरस्कार क्यों करेगी?
उत्तर: क्योंकि वर्तमान पीढ़ी स्वतंत्रता के नाम पर मर्यादाओं के उन तटबंधों को तोड़ रही है जो समाज को सुरक्षित रखते थे। संस्कारविहीन और एकाकी भविष्य मिलने पर अगली पीढ़ी अपने पूर्वजों को उत्तरदायी ठहराएगी।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









