“अपात्र को मशाल देना संपूर्ण वन को भस्म करने का आमंत्रण है।”
ब्रह्माण्ड के इस पावन आर्यावर्त खंड में जब-जब धर्म का लोप हुआ, तब-तब व्यवस्था का विनाश सुनिश्चित रहा। सांप्रतिक काल में व्याप्त अराजकता का मूल अन्वेषण करने पर यह तथ्य सूर्य के प्रकाश के समान स्पष्ट हो जाता है कि जब समाज अपनी नैसर्गिक और शास्त्रीय मर्यादाओं का त्याग कर ‘मनगढंत’ मूल्यों का आश्रय लेता है, तो राष्ट्र का पतन अवश्यम्भावी है।
अराजकता का अर्थ है—‘अराजकत्व’ अर्थात् जहाँ ‘राजा’ (शासन) का भय और धर्म का अंकुश समाप्त हो जाए। इस स्थिति का बीजारोपण तब होता है जब समाज के वे वर्ग, जिन्हें शास्त्रों ने उनकी तामसिक और अराजक प्रवृत्तियों के कारण ‘दस्यु’ और ‘मर्यादा-हीन’ की श्रेणी में रखा था, व्यवस्था के शीर्ष पर आरूढ़ हो जाते हैं।
अराजकता का उत्तरदायी कौन ?
“जब दंड सो जाता है, तब दस्यु का नग्न-नृत्य आरम्भ होता है।”
सांप्रतिक कालखंड में राष्ट्र जिस अराजकता की ज्वाला में दग्ध हो रहा है, उसका मूल कारण केवल राजनीतिक अस्थिरता नहीं, अपितु ‘धर्म-च्युति’ और ‘वर्ण-संकरत्व’ की पराकाष्ठा है। जब समाज अपनी नैसर्गिक संरचना का परित्याग कर कल्पित और कृत्रिम मूल्यों को अंगीकार करता है, तब ‘मात्स्य-न्याय’ (शक्तिशाली द्वारा निर्बल का भक्षण) की स्थिति उत्पन्न होती है। जिसे आज ‘समानता’ का नाम दिया जा रहा है, वह वस्तुतः प्रकृति और शास्त्र के शाश्वत नियमों के विरुद्ध एक कृत्रिम थोपा गया सिद्धांत है।
समानता का मिथ्या भ्रम और शासक का प्रमाद
आधुनिक राज्यतंत्र जिस ‘समानता’ (Equality) का राग अलापता है, वह न केवल शास्त्रीय दृष्टि से अपितु प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) की दृष्टि से भी दोषपूर्ण है। प्रकृति में सर्वत्र विविधता और अधिकार-भेद विद्यमान है।
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्राह्ममिदं जगत। ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम्॥ (महाभारत, शांतिपर्व १८८.१०)
यद्यपि आत्मा के धरातल पर तात्विक समानता है, किंतु व्यावहारिक जगत ‘त्रिगुणात्मक’ है। शासन ने ‘मनुष्य मात्र समान है’—इस आत्मघाती मंत्र को समाज पर बलपूर्वक थोप दिया। जब तिरस्कार के पात्र को सम्मान और अधिकार प्रदान किया जाता है, तो वह ‘अपच’ का कारण बनता है। जिसे मर्यादा का ज्ञान नहीं, उसे अधिकार देना वैसा ही है जैसे बंदर के हाथ में मशाल देना। वह स्वयं को तो जलाएगा ही, संपूर्ण वन (समाज) को भी भस्म कर देगा। समानता-समानता चिल्लाने वाले समाज में जिस समानता की बात करते हैं उसको यदि शासन व्यवस्था में पिरोयें तो कुछ इस प्रकार होगा :
- प्रिंसिपल और प्यून (चपरासी) एक कार्यालय में समान रूप से बैठें, एक बार प्यून चाय लाये तो दूसरी बार प्रिंसिपल, एक बार प्यून झाड़ू लगाये तो दूसरी बार प्रिंसिपल।
- मोदी जैसे अंबानी के बेटे के विवाह में जाते हैं उसी प्रकार देश भर में सबके विवाह में सम्मिलित हों और यदि न हो सकें तो असमानता है, भेद-भाव है आदि।
- अंबानी-अडानी (यदि मिलना चाहें तो) जैसे कुछ घंटों में मोदी से मिल सकते हैं उसी प्रकार देश का कोई भी नागरिक मिल सकता है।
- जैसे एक शंकराचार्य का दूसरे शंकराचार्य सम्मान करेंगे वैसे ही हमारा भी करें।
- जैसे एक शिक्षक से तुरंत मिल सकते हैं उसी प्रकार एक डॉक्टर से भी तुरंत कोई भी मिल सके।
- जैसे सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस का निर्णय देश भर में मान्य होता है वैसे ही जिला के न्यायाधीश का निर्णय भी देशभर में मान्य हो।
जिस प्रकार व्यवस्थागत रूप से यह भेदभाव होते हुये भी भेदभाव की श्रेणी में नहीं आता उसी प्रकार समाज की भी अपनी व्यवस्था है, परिवार की भी अपनी व्यवस्था है किन्तु ये मूढ़ लोग सभी व्यवस्था को समाप्त करने के उद्देश्य से समानता-समानता और भेद-भाव चिल्लाते रहते हैं। कुछ विदेशी समूह भारतीय संस्कृति पर आघात कर रहे हैं तो वहीं देश के नेता वोटबैंक के चक्रव्यूह में फंसे हुये हैं। ये समानता का राग इसलिये अलापते हैं क्योंकि ये सनातन संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं। सनातन में ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है :

- ब्राह्मण कहे खड़ा हो जाओ तो यजमान खड़ा होगा।
- ब्राह्मण कहे बैठो तो यजमान बैठेगा।
- ब्राह्मण कहे परिक्रमा करो (घूमो) तो यजमान घूमेगा।
- ब्राह्मण कहे भोजन कराओ तो यजमान भोजन कराएगा।
- ब्राह्मण कहे दक्षिणा लाओ तो यजमान दक्षिणा देगा।
- ब्राह्मण कहे उपवास करो तो यजमान उपवास करेगा।
तात्पर्य यह कि भारतीय संस्कृति में ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है जो भारतीय संस्कृति के विरोधियों को भेद-भाव लगता है। उन्होंने दशकों से इसको मिटाने के लिये अनेकों षड्यंत्र किया, यहां तक की कर्मणा वर्णव्यवस्था भी चिल्लाया, किन्तु वास्तव में समाज स्वीकार नहीं कर रहा है। संतोषप्रद इतना ही है कि इन धूर्तों और धर्मद्रोहियों को देश से भगा नहीं रहा है, बस कान में तेल देकर सो रहा है और इनके मन बढ़ते ही जा रहे हैं और इस कड़ी में इनका सबसे बड़ा अस्त्र है भेदभाव पर आधारित समानता का मनगढंत सिद्धांत।
इसके अनेकों उदाहरण हैं जो कि वैधानिक रूप से प्रभावी किया गया, ब्राह्मणों को विदेशी, अराजकतावादी और न जाने क्या-क्या नहीं कहा, किन्तु ब्राह्मणों को समाज सिर पर बैठाये हुये है। इसके फलस्वरूप ये और जोर-शोर से उत्पात मचाने लगे और ugc रेगुलेशन 2026 तक ले आये ताकि शिक्षा के समय ही ब्राह्मणों और सभी सवर्णों को मनगढंत समानता का पाठ पढ़ा दिया जाये, ब्राह्मणों की सर्वोच्चता के सिद्धांत को समाप्त कर दिया जाये।
“समानता का अर्थ दृष्टिदोष है, व्यवस्था का दोष नहीं।”
अराजकता का मुख्य उत्तरदायी: शासक (राजा)
देश में व्याप्त किसी भी अराजकता का अंतिम और मुख्य उत्तरदायी ‘शासक’ ही होता है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि प्रजा का दोष भी राजा के खाते में जाता है क्योंकि राजा ही काल का निर्माता है।
राजा कालस्य कारणम्। (महाभारत, शांतिपर्व ६९.७९)
अर्थात् युग अच्छा है या बुरा, समाज मर्यादित है या अराजक, इसका पूर्ण उत्तरदायित्व शासक पर है। यदि देश में ‘अवर्ण-दस्यु’ तत्व अराजकता फैला रहे हैं और नग्न-नृत्य कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि शासक ने ‘दंड-नीति’ का परित्याग कर दिया है।
यदा राजा अधर्मिष्ठो भवति, तदा प्रजा अपि अधर्मिष्ठा भवति।
जब राजा स्वयं लोक-लुभावन (Populist) नीतियों के वशीभूत होकर ‘समानता’ जैसे छद्म आदर्शों को प्रश्रय देता है और अराजक तत्वों को ‘तुष्टीकरण’ के माध्यम से अधिकार बांटता है, तो वह राष्ट्रद्रोही कृत्य करता है। शासक का कर्तव्य था कि वह दस्युओं को समाज की परिधि से बाहर रखता, किंतु उसने उन्हें ‘सम्मान’ दिया। यह शासक का ‘प्रमाद’ (Negligence) है जो अराजकता की नींव है।
शास्त्र प्रदत्त व्यवस्था मात्र आत्मकल्याण तक ही सीमित नहीं है, व्यावहारिक जगत अर्थात संसार में भी सुख-शांति का स्थापक है। किन्तु अधर्मी नेताओं ने अर्थात नेताओं ने धर्म का त्याग करके उन अराजक तत्वों को भी मुख्यधारा में जोड़ दिया जिनको बहिष्कृत रखना चाहिये था और इसका आधार बनाया मनगढंत समानता का सिद्धांत। आज वही अराजक तत्व जिन्हें सम्मान पचता ही नहीं है देश में नग्ननृत्य करने लगे हैं, अराजकता का प्रसार कर रहे हैं।
क्या कभी किसी सरकार, न्यायपालिका ने मनुस्मृति जलाने वालों, ब्राह्मणों-देवताओं का अपमान करने वालों को दण्डित किया ? मध्यप्रदेश में तो मोहन यादव की भाजपा सरकार ने मनुस्मृति फाड़ने वाले को छूट दिया किन्तु प्रतिक्रिया में जब अनिल मिश्रा ने अम्बेडकर का चित्र जलाया तो उनके लिये जेल का प्रबंध कर दिया। वो तो अनिल मिश्रा थे जो बच निकले, सामान्य ब्राह्मण होता तो वर्षों तक जेल की खिचड़ी खाता रहता। किन्तु प्रश्न यह है कि मनुस्मृति को जिन लोगों और समूहों ने फाड़ा या जलाया उन अराजकतावादियों के ऊपर सरकार की क्या प्रतिक्रिया रही ? मौन समर्थन !

वर्तमान शासन-तंत्र ने ‘मनुष्य मात्र समान है’—इस आत्मघाती मंत्र को जपा, जिससे उन लोगों को भी शासन और समाज में निर्णायक भूमिका मिल गई, जो अपनी नैसर्गिक वृत्तियों से अराजक थे।
अपात्राय न दातव्यं प्रत्यक्षं च विशेषतः। अपात्रदानेन हि नरः सद्यः पतति रौरवे॥
अर्थात् अपात्र को अधिकार या दान देना नरक का द्वार खोलना है। जब शासन ने अनधिकारियों को ‘समानता’ के नाम पर सम्मान परोसा, तो उस ‘अपच’ ने अराजकता के रूप में वमन (Vomiting) करना आरम्भ कर दिया।
दस्यु-लक्षण एवं अधिकार-दुरुपयोग
सर्वप्रथम तो इन अराजकतावादियों को चिह्नित करना अनिवार्य है उसके उपरांत इनको समाज की मुख्य धारा से अलग करना अनिवार्य है। ये अराजकतावादी स्वयं तो शांति से रह सकते हैं किन्तु जिस समाज की मुख्य धारा से जुड़ते हैं उस समाज की शांति को भंग कर देते हैं। अराजकतावादियों को राष्ट्र की मुख्य धारा में सम्मिलित करके सरकार चक्रव्यूह में फंस गई है और वोटबैंक की राजनीति उबरने नहीं देगी। सोचिये ugc रेगुलेशन २०२६ आने के बाद विरोध प्रदर्शन तो हो रहे हैं किन्तु जो जन्मजात अराजकतावादी नहीं हैं उनका विरोध प्रदर्शन न तो उग्र हो रहा है, न हिंसा हो रही है, न आग लगाये जा रहे हैं।
किन्तु यदि यही विरोध अराजकतावादी कर रहे होते तो देश में आग लगा रहे होते, हिंसा कर रहे होते और न जाने क्या-क्या ? इनके समक्ष सरकार झुकती भी रहती है किन्तु जो अराजकतावादी नहीं हैं उनको प्रताड़ित होने के लिये छोड़ ही नहीं देती अपितु प्रताड़ना का विधान भी बना देती है। यहां हमारा उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि अराजकतावादियों की पहचान तो अत्यंत सरल है और देश में ऐसी घटनायें होती ही रहती हैं।
- जो मनुस्मृति या किसी भी धार्मिक ग्रन्थ को जलाता है या फाड़ता है वह अराजकतावादी है।
- जो देवताओं के प्रति, धर्म के प्रति, ब्राह्मणों के प्रति अपमाजनक वक्तव्य देता है वो अराजकतावादी है।
- किन्तु सरकारी तंत्र तो उसे भी शांतिप्रिय समझती है और स्वागत करती है जो ब्राह्मणों के नरसंहार की बात करता हो, देश से भगाने की बात करता हो।
- अर्थात पहचानती सरकार भी है और जानबूझकर अराजकतावादियों को ही प्रश्रय/संरक्षण भी प्रदान करती है।

दस्यवो ये च लुम्पन्ति ये च धर्मविनाशकाः। तेषां निग्रहणं राज्ञो मुख्यं धर्मं प्रचक्षते॥
(मनुस्मृति)
शास्त्रों ने स्पष्ट रूप से उन तत्वों को ‘दस्यु’ की संज्ञा दी है जो धर्म की मर्यादाओं को तोड़ते हैं और केवल अधिकार की लिप्सा रखते हैं। दस्यु वह नहीं है जो धर्म का त्याग करके समाज की शांति भंग करे। और शासक का कर्तव्य ऐसे अराजक तत्वों का निग्रह करना है न कि प्रश्रय और संरक्षण देना।
वर्तमान में वे वर्ग, जो अपने कर्तव्य और दायित्व का कभी निर्वहन नहीं करते, किंतु ‘अधिकार’ के नाम पर उत्पात मचाते हैं, वही वास्तविक अराजकतावादी हैं। कानून ने उन्हें ‘मनगढंत मूल्यों’ के आधार पर वह शक्ति प्रदान कर दी जिसके वे अधिकारी नहीं थे। परिणाम स्वरूप, आज वे व्यवस्था के ऊपर शासन कर रहे हैं।
इन अराजकतावादियों ने एक और गंभीर षड्यंत्र रचा है — इन्होंने ‘शूद्र’ वर्ण को भ्रमित कर अपने साथ कर लिया। जबकि सत्य यह है कि शूद्र ‘सवर्ण’ है और वह व्यवस्था का रक्षक है। अराजकतावादी तो वे हैं जो शूद्रों को भी ‘अवर्ण’ घोषित करके सवर्ण समाज (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र) को छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं।
यहाँ यह स्पष्ट करना अनिवार्य है कि ‘दस्यु’ वर्ग में वे नहीं आते जो अपनी मर्यादा में रहते हैं। अराजकतावादी वह है जो वन में रहे या पर्वत पर, गांव में रहे या नगर में, सदैव ही नागरिक व्यवस्था को चुनौती देता है। जो अधिकार, समानता, स्वतंत्रता आदि के नाम पर राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक संरचना पर प्रहार करता है, वही ‘दस्यु’ है।
बलपूर्वक थोपी गई समानता: एक अभिशाप
राजनीतिक व्यवस्था स्वयं तो ‘समानता’ के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करती (वहाँ पदों का कठोर पदानुक्रम है), किंतु समाज पर इसे बलपूर्वक थोपा गया है। यह विडंबना ही अराजकता के मूल में है।
यत्र पूज्यन्ते पूज्याः व्यतिक्रमो न विद्यते। तत्र धर्मः प्रवर्तते नान्यत्र स कदाचन॥
जहाँ पूज्यों की पूजा नहीं होती और जहाँ अनधिकारियों को सम्मान मिलता है, वहाँ धर्म लुप्त हो जाता है। जब शासक विद्वान और दस्यु को एक ही पलड़े में तोलता है, तो वह न्याय नहीं, अपितु समाज का विनाश करता है। अराजकतावादी वह है जो दायित्व से भागता है और अधिकार के लिए गला काटता है।
समाधान: शास्त्रोक्त दंड एवं शासक का जागरण
इस विभीषिका से मुक्ति का एकमात्र मार्ग ‘दंड-नीति’ का कठोर प्रयोग है।
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥
(मनुस्मृति ७.१८)
यदि शासक अपनी निद्रा त्यागकर इन अराजक तत्वों को पुनः उनकी वास्तविक सीमा (परिधि) में नहीं पहुँचाता, तो वह स्वयं भी विनाश का भागी बनेगा। अराजकता का समाधान ‘भाषण’ में नहीं, अपितु उन तत्वों के ‘निष्कासन’ और ‘चिह्नीकरण’ में है जिन्होंने धर्म और मर्यादा का उल्लंघन किया है।
अराजकेषु राष्ट्रषु न धर्मो न च सत्यता। न च वित्तं न च सुखं न च शान्तिः कदाचन॥
(रामायण, अयोध्याकाण्ड ६७.९)
बिना मर्यादा के समाज में न शांति संभव है, न सुख। शासक को यह स्मरण रखना चाहिए कि यदि प्रजा अराजक है, तो यह राजा की नपुंसकता और अधर्म का प्रमाण है।
शासन का यह दायित्व है कि वो अपनी कुम्भकर्णी निद्रा का परित्याग करके समानता को भलीभांति परिभाषित करे, अराजकता के लक्षणों को स्पष्ट करे और फिर जो अराजकता फैला रहे हैं उन सबका निग्रह करे। न कि समानता कर भेद-भाव का गीत गाता रहे। परिवार की अपनी व्यवस्था है और उस व्यवस्था में भेदभाव नहीं देखना चाहिये और यदि परिवार की व्यवस्था में भी किसी को भेदभाव दिखता है तो वह उसका दृष्टिदोष है। इसी प्रकार समाज की भी अपनी व्यवस्था है जो शास्त्रप्रदत्त है और संस्कृति का आधारस्तम्भ है। इसमें भी जिसे भेदभाव दिख रहा है ये उसका दृष्टिदोष है और चिकित्सा उसकी करनी चाहिये जिसे दृष्टिदोष है न की दृश्य की।

शूद्र वर्ण की गरिमा और दिग्भ्रमित राजनीति
वर्तमान अराजकतावादियों ने सबसे बड़ा षड्यंत्र यह किया है कि उन्होंने ‘शूद्र’ वर्ण को ‘अवर्ण’ घोषित कर सवर्ण समाज से पृथक कर दिया। जबकि सत्य यह है कि शूद्र सवर्ण समाज का अभिन्न अंग है।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:। ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
जब विराट पुरुष के अंगों की कल्पना की गई, तो शूद्र को ‘पद’ (चरण) कहा गया। बिना चरणों के शरीर खड़ा नहीं हो सकता। शूद्र सवर्ण है, वह धर्मावलंबी है। किंतु अराजकतावादी शक्तियों ने शूद्रों को यह कहकर भड़काया कि वे त्रिवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) के विरोधी हैं। यह विभाजन ही वर्तमान सामाजिक पतन का कारण है। जो वर्ग ‘अन्त्यज’ (पंचम वर्ण) थे, वे भी मूलतः अराजक नहीं थे, उन्हें भी व्यवस्था में एक स्थान प्राप्त था, किंतु वर्तमान के ‘अवर्ण दस्यु’ तत्वों ने सबको एक ही रंग में रंगकर व्यवस्था को नष्ट कर दिया है।
तथापि यदि हम गांवो में देखें तो आज भी शूद्र वर्णव्यस्था को स्वीकारते हैं किन्तु कुछ लोगों को भ्रमित करके ऐसा किया गया है। एक तथ्य यह भी है कि भ्रमित होने वालों में सभी शूद्र ही हैं ऐसा नहीं अपितु सभी वर्णों के कुछ लोग भी मिलते हैं प्रलोभन से हों अथवा अन्यान्य स्वार्थों के कारण। ये वर्णव्यवस्था सामाजिक व्यवस्था है और इसे इसी रूप में देखना आवश्यक है।
सोचिये यदि क्षत्रिय और वैश्य को ब्राह्मण से नीचे बैठने में, नतमस्तक होने में आपत्ति नहीं है, भेदभाव नहीं दिखता, अपमान नहीं दिखता तो मात्र शूद्र को ही ऐसा क्यों दिखाया जा रहा है, शूद्र भी तो इसी वर्णव्यवस्था का अंग है। रही अन्य भेदभाव जैसे बेटी-रोटी संबंध की तो वो अन्य तीनों वर्णों में भी है फिर मात्र शूद्र को ही क्यों उकसाया जाता है। निसंदेह जातीय संघर्ष प्रच्छन्न भाव है और राजनीति करने वाले वोटबैंक के चक्रव्यूह में फंसे हैं।
- शरीर के ही सिर, हाथ, हृदय, पेट, पैर आदि में भेदभाव है अथवा नहीं ?
- आँख, कान, नाक मुंह आदि में भेदभाव है अथवा नहीं ?
किन्तु सबके अपने कार्य हैं और सभी अपने कार्यों में रत रहे उसी का नाम व्यवस्था है। यदि कोई भी अंग निर्धारित कार्य करना बंद कर दे तो दूसरा अंग उस कार्य को नहीं कर सकता। जैसे कान देख नहीं सकता, नाक सुन नहीं सकता, ऑंखें सांस नहीं ले सकती, हृदय भोजन को पचा नहीं सकता आदि। अर्थात जैसे शरीर के सभी अंग अपने कार्य को ही करते हैं और दूसरे से भेदभाव का युद्ध नहीं करते उसी प्रकार सामाजिक व्यवस्था थी जिसको भेदभाव मिटाने और समानता लाने के चक्रव्यूह में फंसा दिया गया है एवं अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गयी है।
वर्तमान के दस्यु वर्ग ने स्वयं को शूद्रों का प्रतिनिधि घोषित कर दिया, जबकि उनका उद्देश्य केवल सामाजिक समरसता को नष्ट करना है। ‘बुद्धिजीवी दस्यु’ और ‘राजनैतिक दस्यु’ ने प्राचीन अन्त्यजों को भी अपने पक्ष में कर लिया है, जबकि अन्त्यज तो मर्यादा में रहने वाले लोग थे। ये नए अराजकतावादी सवर्णों (जिसमें शूद्र भी सम्मिलित हैं) को अपना शत्रु मानते हैं क्योंकि सवर्ण ‘मर्यादा’ की बात करते हैं।
निष्कर्ष
वर्तमान अराजकता का मूल कारण केवल भौतिक संसाधनों का अभाव नहीं, अपितु ‘अधिकार-विप्लव’ है। जब समाज के वे तत्व, जिन्हें शास्त्रों ने उनकी तामसिक, हिंसक और मर्यादाहीन प्रवृत्तियों के कारण ‘दस्यु’ की संज्ञा दी थी, कृत्रिम व्यवस्था के माध्यम से शासन और समाज के मर्म पर आसीन हो जाते हैं, तब उस स्थिति को शास्त्र ‘मत्स्य-न्याय’ कहता है।
वर्तमान की अराजकता का उत्तरदायी वह ‘अवर्ण-दस्यु’ वर्ग है जिसे शासक ने अनैतिक सम्मान प्रदान किया है। जब तक शासक ‘समानता’ के इस मिथ्या ढोंग को त्यागकर शास्त्रोक्त मर्यादा को पुनः स्थापित नहीं करता, तब तक यह नग्न-नृत्य चलता रहेगा। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ के सिद्धांत के अनुसार, शासक ही इस महाविनाश का आदि और अंत है।

FAQ
प्रश्न : अराजकता का मूल कारण क्या है?
उत्तर : शास्त्रों के अनुसार, मर्यादा का उल्लंघन और अनधिकारियों का सत्तासीन होना ही अराजकता है।
प्रश्न : ‘राजा कालस्य कारणम्’ का क्या अर्थ है?
उत्तर : इसका अर्थ है कि युग की परिस्थितियों और समाज के नैतिक पतन के लिए पूर्णतः शासक उत्तरदायी है।
प्रश्न : लेख में ‘दस्यु’ किसे कहा गया है?
उत्तर : वे तत्व जो कर्तव्यों की उपेक्षा कर केवल अधिकारों के लिए उत्पात मचाते हैं और धर्म का विनाश करते हैं।
प्रश्न : समानता का सिद्धांत अराजकता कैसे फैलाता है?
उत्तर : जब योग्यता और अधिकार-भेद को भुलाकर अपात्रों को पात्रों के समान अधिकार दिए जाते हैं, तो व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है।
प्रश्न : शासक का मुख्य कर्तव्य क्या है?
उत्तर : दुष्टों का निग्रह (दमन) और शिष्टों (मर्यादापालकों) का संरक्षण करना।
प्रश्न : क्या राजनीतिक व्यवस्था स्वयं समानता मानती है?
उत्तर : नहीं, प्रशासन में उच्च-नीच का पदानुक्रम सदैव बना रहता है, समानता केवल वोट बैंक के लिए थोपी जाती है।
प्रश्न : अराजकता का समाधान क्या है?
उत्तर : शास्त्रोक्त दंड-नीति का कठोर प्रयोग और समाज को पुनः वर्ण-मर्यादा में प्रतिष्ठित करना।
प्रश्न: ब्राह्मणों की सर्वोच्चता का क्या आधार है?
उत्तर: शास्त्रानुसार ब्राह्मण का स्थान उसके त्याग, तप और ज्ञान के कारण सर्वोच्च है, जो समाज को दिशा प्रदान करता है, न कि किसी भौतिक सत्ता के कारण।
अस्वीकरण (Disclaimer)
प्रस्तुत आलेख पूर्णतः शास्त्रीय मीमांसा और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के विश्लेषण पर आधारित है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे ‘दस्यु’, ‘अराजक’ या ‘मर्यादाहीन’ पूर्णतः प्राचीन नीति-ग्रंथों (जैसे मनुस्मृति, शुक्रनीति और महाभारत) की पारिभाषिक शब्दावली से प्रेरित हैं। इनका उद्देश्य किसी भी समुदाय, जाति या पंथ की गरिमा को ठेस पहुँचाना नहीं, अपितु व्यवस्थागत दोषों को शास्त्रीय मानदंडों पर रेखांकित करना है। यह आलेख किसी भी प्रकार की असंवैधानिक गतिविधि या हिंसा का समर्थन नहीं करता है।
यहाँ ‘समानता’ के आधुनिक बोध की समीक्षा प्रकृति और शास्त्र के ‘अधिकार-भेद’ सिद्धांत के आलोक में की गई है। हमारा मंतव्य समाज को खंडित करना नहीं, बल्कि उन ‘अराजक तत्वों’ की पहचान करना है जो व्यवस्था का दुरुपयोग कर सामाजिक शांति भंग करते हैं। इस मंच का उद्देश्य लुप्त प्राय हो रही शास्त्रोक्त शासन-पद्धति पर बौद्धिक विमर्श को जीवित रखना है। किसी भी विवाद की स्थिति में शास्त्रों के प्रमाण ही अंतिम मान्य होंगे।पाठकों से निवेदन है कि वे इसे एक ‘वैचारिक विमर्श’ और ‘शास्त्रीय दृष्टिकोण’ के रूप में ही ग्रहण करें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









