“भारत भोगभूमि नहीं, कर्मभूमि है; यहाँ आत्मकल्याण का अधिकार जन्मसिद्ध है”
ब्रह्मांड के मानचित्र पर भारत केवल एक भू-खंड नहीं, अपितु एक चैतन्य सत्ता है। सनातन वाङ्मय में भारत को ‘कर्मभूमि’ के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है, जबकि शेष विश्व को ‘भोगभूमि’ की संज्ञा दी गई है। वर्तमान युग में जहाँ संवैधानिक व्यवस्थाएं केवल भौतिक देह की सुरक्षा और इंद्रिय-सुखों तक सीमित हैं, वहाँ ‘आत्मकल्याण’ के अधिकार की उपेक्षा मानवता के आध्यात्मिक पतन का कारण बन रही है। यह आलेख सिद्ध करता है कि आत्मकल्याण का अधिकार न केवल मौलिक है, अपितु मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है जीवन के समस्त अधिकारों का उद्गम स्थल भी है।
आत्मकल्याण : जन्मसिद्ध अधिकार और व्यवस्थागत हनन
भारतीय मनीषा में मानव जीवन का चरम लक्ष्य भौतिक सुखों की प्राप्ति मात्र नहीं, अपितु ‘आत्मकल्याण’ रहा है। वर्तमान भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्रदान करता है, किंतु वह जीवन की परिभाषा केवल ‘दैहिक अस्तित्व’ तक सीमित रखता है। पौराणिक साक्ष्यों और सनातन मान्यताओं के आलोक में, ‘आत्मकल्याण का अधिकार’ न केवल मौलिक अधिकार है, अपितु यह जीवन के अधिकार से भी श्रेष्ठ और गरिमामयी है। समय की मांग है कि इस शाश्वत सत्य को संविधान के मूल ढांचे में स्थान दिया जाए।

वास्तविकता यह है कि, “आत्मकल्याण” नाम का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन यह अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) के व्यापक दायरे में समाहित कहा जा सकता है जो कि भ्रामक और असत्य है। यदि कोई परिस्थिति आपके व्यक्तिगत विकास या कल्याण (भौतिक) में बाधा डालती है, तो आप उसे मौलिक अधिकार के हनन के रूप में चुनौती दे सकते हैं किन्तु यदि आपके आत्मकल्याण में बाधा डाल रही हो तो उसे चुनौती नहीं दे सकते।
भारतीय संविधान और कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए, तो ‘आत्मकल्याण‘ शब्द का कोई उल्लेख मौलिक अधिकारों की सूची में नहीं है, लेकिन यह हमारे सभी मौलिक अधिकारों से ऊपर होना चाहिये, शास्त्रों के अनुसार जीवन के अधिकार से भी ऊपर होता है आत्मकल्याण का अधिकार।
आत्मकल्याण की श्रेष्ठता: पौराणिक परिप्रेक्ष्य
ऐसी ढेरों कथायें मिलती हैं जिसमें आत्मकल्याण के लिये किसी ने अपने प्राणों (जीवन) को अर्पित कर दिया या प्रयास किया, जैसे “राजा दिलीप की कथा”, “राजा हरिश्चंद्र की कथा”, (जड़ भरत की कथा”, “रामायण”, “महाभारत” आदि की कथायें सभी यही सिद्ध करती है कि आत्मकल्याण के लिये कितना भी बड़ा त्याग क्यों न करना हो हमें करना ही चाहिये क्योंकि हमारे जीवन का उद्देश्य ही एक मात्र “आत्मकल्याण” होता है।

यदि हमने आत्मकल्याण नहीं किया तो हमारा जीवन भी निरर्थक ही सिद्ध होता है। अर्थात जीवन का उद्देश्य ही आत्मकल्याण है और इस कारण “आत्मकल्याण का अधिकार” हमारा मौलिक अधिकार है जो “जीवन के अधिकार” से भी ऊपर है।
भारतीय मनीषा में ‘स्व’ (आत्मा) का कल्याण ही जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है। भारतीय शास्त्रों (जैसे रामायण, महाभारत और पुराणों) में ‘धर्म’ और ‘मोक्ष’ (आत्मकल्याण) को सर्वोपरि माना गया है। राजा दिलीप का नंदिनी गाय के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार होना या राजा हरिश्चंद्र का सत्य के लिए सर्वस्व त्याग देना, यह दर्शाता है कि ‘आत्मकल्याण’ और ‘कर्तव्य’ भौतिक जीवन से कहीं ऊंचे हैं।
इसके विपरीत, आधुनिक भारतीय संविधान मुख्य रूप से एक ‘सामाजिक अनुबंध’ (Social Contract) है, जो नागरिक के भौतिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा पर केंद्रित है। वर्तमान कानूनी ढांचे में ‘जीवन के अधिकार’ (Article 21) को सबसे ऊपर रखा गया है क्योंकि राज्य केवल शरीर और भौतिक अस्तित्व की सुरक्षा की गारंटी दे सकता है, ‘आत्मा’ की नहीं। वर्तमान व्यवस्था में यदि कोई आपके भौतिक विकास (Personal Development) को रोकता है, तो आप कोर्ट जा सकते हैं, लेकिन ‘आत्मकल्याण’ (Spiritual Welfare) के मार्ग में बाधा आने पर कानूनी पेचीदगियां बढ़ जाती हैं।
इसका मुख्य कारण यह है कि :
- परिभाषा का अभाव: कानून के लिए ‘आत्मकल्याण’ एक व्यक्तिपरक (Subjective) शब्द है। हर व्यक्ति के लिए आत्मकल्याण का मार्ग अलग हो सकता है।
- भौतिकता बनाम आध्यात्मिकता: वर्तमान न्यायपालिका साक्ष्यों और भौतिक नुकसान पर काम करती है, जबकि आत्मकल्याण एक आंतरिक और आध्यात्मिक यात्रा है।
सनातन शास्त्रों में स्पष्ट उद्घोष है कि जिस जीवन में आत्म-साक्षात्कार या आत्मकल्याण का प्रयास नहीं है, वह व्यर्थ है।
आपदार्थे धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥
राजा दिलीप का आख्यान: रघुवंश के अनुसार, राजा दिलीप ने एक गौ (नंदिनी) की रक्षा हेतु अपने नश्वर शरीर को सिंह के समक्ष अर्पित करने का निर्णय लिया। उनके लिए ‘क्षत्रिय धर्म’ और ‘आत्मकल्याण’ अपने प्राणों से अधिक मूल्यवान थे। उनका यह त्याग सिद्ध करता है कि आत्मा की शुद्धि और कर्तव्य-पालन का अधिकार दैहिक सुरक्षा से ऊपर है।
राजा हरिश्चंद्र का दृष्टांत: सत्यवादी हरिश्चंद्र ने आत्मकल्याण और सत्य की रक्षा हेतु अपने राज्य, परिवार और स्वयं का परित्याग कर दिया। यदि उनके पास केवल ‘जीवन का अधिकार’ होता, तो वे कदाचित् समझौता कर लेते, किंतु उन्होंने ‘आत्मकल्याण के अधिकार’ को सर्वोपरि माना।
जड़ भरत का आख्यान (श्रीमद्भागवत महापुराण): महाराज भरत ने संपूर्ण पृथ्वी का राज्य एक तृण के समान त्याग दिया। उनका यह कृत्य सिद्ध करता है कि आत्म-साक्षात्कार का अधिकार किसी भी राजनीतिक या भौतिक अधिकार से सहस्र गुणा श्रेष्ठ है।
महर्षि दधीचि का त्याग: लोक-कल्याण और असुर-विनाश हेतु महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियों का दान कर दिया। उनके लिए देह की रक्षा गौण थी और आत्मकल्याण हेतु कर्तव्य-पालन मुख्य था।
राजा रन्तिदेव की करुणा:
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥
(श्रीमद्भागवत)
अर्थ: मैं न राज्य की इच्छा करता हूँ, न स्वर्ग की, न मोक्ष की। मैं केवल दुःख से तप्त प्राणियों के क्लेश का नाश चाहता हूँ।
आध्यात्मिक प्रमाण और संवैधानिक रिक्तता
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा की अमरता और देह की नश्वरता का प्रतिपादन करते हुए स्पष्ट किया है:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता २.२२)
जब शरीर मात्र एक वस्त्र है, तो वस्त्र की रक्षा (अनुच्छेद 21) को प्राथमिकता देना और अंतरात्मा के कल्याण की उपेक्षा करना एक संवैधानिक त्रुटि है। वर्तमान न्यायशास्त्र ‘भौतिक बाधाओं’ को तो समझता है, किंतु यदि कोई राजनैतिक या सामाजिक परिस्थिति व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान में बाधक बनती है, तो संविधान मौन हो जाता है। अतः, आत्मकल्याण को विधि-सम्मत मौलिक अधिकार बनाना अपरिहार्य है।
भारत: कर्मभूमि एवं आत्मकल्याण का क्षेत्र
पुराणों के अनुसार, देवताओं के लिए भी भारत भूमि पर जन्म लेना एक दुर्लभ सौभाग्य है, क्योंकि यहीं से आत्मकल्याण के द्वारा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥
विष्णु पुराण २.३.२४
अर्थ: देवता गान करते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं जो स्वर्ग और मोक्ष के मार्गभूत भारत भूमि के भाग में देवत्व त्यागकर पुन: जन्म लेते हैं।
आयुः क्षयति पश्यतां हि जगतं तस्मात्समालोक्यताम्। आत्मार्थं हि शुभं कर्म कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ (भविष्य पुराण)
अर्थ: समस्त जगत को देखते-देखते आयु का क्षय हो रहा है, अतः अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को आत्म-हित के लिए शुभ कर्म करने चाहिए।
ततः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यश्चान्तश्च गम्यते। न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्म विधीयते ॥ (ब्रह्म पुराण)
अर्थ: इसी भारत भूमि से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति संभव है। मनुष्यों के लिए कर्म का विधान अन्यत्र कहीं नहीं है, केवल इसी भूमि पर है।
इस विषय में यदि शास्त्रों के प्रमाण ढूंढते रहे जो आजीवन प्रमाणों का संकलन नहीं हो पायेगा, इतने प्रमाण भरे पड़े हैं। हमारे शास्त्र स्पष्ट घोषणा करते हैं कि :
आत्मकल्याण कोई धार्मिक कर्मकांड मात्र नहीं है, अपितु यह मनुष्य के अस्तित्व की ‘उपादेयता’ है। शास्त्रों के अनुसार ‘शरीर’ केवल एक माध्यम है (शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्), अतः माध्यम की रक्षा के साथ-साथ ‘साध्य’ (आत्मा) की रक्षा और कल्याण का अधिकार भी मौलिक होना चाहिए। आत्मकल्याण भारत में जन्म लेने वाले मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मौलिक अधिकार की मान्यता देनी चाहिये।

जब साक्षात् देवगण इस भूमि को ‘स्वर्गापवर्गास्पदमार्ग’ (स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग) मानते हैं, तो यहाँ रहने वाले प्रत्येक नागरिक का यह नैसर्गिक और मौलिक अधिकार है कि वह अपने आत्मकल्याण हेतु स्वतंत्र हो। भारत में जन्म लेने का उद्देश्य भौतिक उपभोग नहीं, अपितु ‘कर्म’ के माध्यम से आत्मा का उत्थान है।
कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात्क्षणायुषः भारतभूजयो वरम् ।
क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः ॥
(श्रीमद्भागवत ५.१९.२३)
अर्थ: स्वर्ग के कल्प-भर की आयु वाले देवताओं के स्थान को जीतने की अपेक्षा भारत भूमि में क्षणभर का जीवन श्रेष्ठ है, क्योंकि यहाँ मर्त्य शरीर (मनुष्य देह) से किए गए कर्मों को भगवान को समर्पित कर निर्भय पद (मोक्ष) प्राप्त किया जा सकता है।
पृथिव्यां भारतं वर्षं दण्डकं तत्र पुण्यदम्। तस्मिन्क्षेत्रे कृतं कर्म भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम्॥
ब्रह्मपुराण ॥८८.१८॥
मनुष्य जन्म यः प्राप्य सुकृतं न करोति च । स एव पापिनां श्रेष्ठ आत्मघातं करोति च ॥
नारदपुराणम्- पूर्वार्ध – ३१-३२
अर्थ: अत्यंत दुर्लभ भारत भूमि और मनुष्य जन्म पाकर भी जो मोक्ष (आत्मकल्याण) के लिए प्रयत्न नहीं करता सुकृत नहीं करता, वह पापियों में बड़ा है और आत्मघात करता है।
- मनुष्य जन्म का एक मात्र उद्देश्य है आत्मकल्याण करना।
- आत्मकल्याण भारत भूमि में ही संभव है और इसलिये देवता भी भारत में मनुष्य शरीर प्राप्त करने की कामना करते हैं।
- यदि आत्मकल्याण के लिये हमें सर्वस्व त्याग भी करना पड़े, प्राणों की भी आहूति देनी पड़े तो सहर्ष देना चाहिये क्योंकि यही परम लक्ष्य है और इसी कारण हमें अनेकों कथाओं में सर्वस्व त्याग करके दुःखमय जीवन व्यतीत करने वाली कथायें मिलते हैं।
- यदि आत्मकल्याण मनुष्य जीवन (भारत में) का परम लक्ष्य है तो यह भारत में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।
- यह हमारा सैद्धांतिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक सभी दृष्टिकोणों से पुष्ट सिद्धांत है।
आधुनिक युग में भी अनिवार्य
यदि हम आधुनिक युग की बात करें तो ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे हमारे जीवन का परम लक्ष्य “आत्मकल्याण” न होकर कुछ और हो गया हो। यदि हमारे जीवन का परम लक्ष्य “आत्मकल्याण” न होता तो हमारा जन्म ही भारत में नहीं होता, अन्यत्र होता अथवा मानव योनि में नहीं होता। भारत में मानव योनि प्राप्ति का एक मात्र परम लक्ष्य “आत्मकल्याण” करना है चाहे सतयुग आदि रहा हो अथवा कलयुग हो।

यदि वर्त्तमान में कलयुग चल रहा है तो भी भारत में मनुष्य जन्म का परमलक्ष्य “आत्मकल्याण” ही है क्योंकि शास्त्रों में कलयुग होने पर भी आत्मकल्याण के सरल उपायों का वर्णन मिलता है।
आधुनिक युग विज्ञान और यंत्रों का युग है, जिसने मनुष्य को केवल एक ‘उपभोक्ता’ बना दिया है। आज मनुष्य का जन्म ‘पतन’ की ओर अग्रसर है। मानसिक अवसाद, अशांति और नैतिक क्षरण का मूल कारण यही है कि हमने संविधान में ‘जीवन’ को तो सुरक्षित किया, किंतु ‘जीवन के उद्देश्य’ (आत्मकल्याण) को विस्मृत कर दिया।
मनुष्य जन्म केवल आहार, निद्रा, भय और मैथुन हेतु नहीं है:
आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
यदि संविधान व्यक्ति को ‘धर्म’ (आत्मकल्याण का साधन) के पालन का सर्वोच्च अधिकार नहीं देता, तो वह मनुष्य को केवल एक परिष्कृत पशु (Sophisticated Animal) के रूप में स्वीकार कर रहा है।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
अर्थात आत्मकल्याण सर्वोपरि है।
संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता
वर्तमान अनुच्छेद २१ में ‘प्राण’ शब्द की व्याख्या केवल जैविक श्वास-प्रश्वास तक सीमित है। इसमें ‘आत्मकल्याण’ को समाहित करना इसलिए आवश्यक है ताकि:
- आध्यात्मिक संरक्षण: आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर व्यक्ति को राज्य का पूर्ण संरक्षण प्राप्त हो। शास्त्रों (रामायण, मनुस्मृति आदि) का अपमान करने वालों पर दंडात्मक कार्यवाही हो, क्योंकि यह आस्था नहीं, अपितु नागरिक के ‘आत्मकल्याण के अधिकार’ का हनन है।
- शिक्षा में आत्म-विद्या: शैक्षणिक संस्थानों में ‘विद्या’ का अर्थ केवल जीविकोपार्जन न होकर ‘आत्म-बोध’ होना चाहिए।
- विकास का आध्यात्मिक मापन: भौतिक विकास के नाम पर आध्यात्मिक मूल्यों का हनन न हो। तीर्थाटन को ‘पर्यटन’ (Entertainment) का स्वरूप देना बंद हो। किसी भी आधुनिक प्रगति का मूल्यांकन इस आधार पर हो कि उसका ‘आत्मकल्याण’ पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
“यदि संविधान केवल देह की रक्षा करता है और आत्मा के पतन पर मौन है, तो वह मनुष्य को केवल एक ‘परिष्कृत पशु’ के रूप में स्वीकार कर रहा है।”
बाधित आत्मकल्याण
हमें यह भी समझना आवश्यक है कि आत्मकल्याण का अधिकार किस प्रकार बाधित होता है ? संभव है इस तथ्य का खंडन करने वाले ये कहें कि आत्मकल्याण के लिये आपको साधु, सन्यासी आदि बनने से, जप, पूजा, यज्ञ, अनुष्ठान आदि करने से कोई नहीं रोकता तो फिर बाधित कैसे होता है? मैं बताता हूँ हमारे आत्मकल्याण का जन्मसिद्ध अधिकार कैसे बाधित होता है :
आप यत्र-तत्र मनुस्मृति के फाड़ने, जलाने की घटनाओं को देखते-सुनते हैं, इसी प्रकार रामायण, देवी-देवताओं के अपमान करने की भी घटनायें सामने आती ही रहती है किन्तु इसको रोकने के लिये स्वतंत्र भारत की सरकार और वर्त्तमान की कथित भगवा सरकार ने एक भी सार्थक प्रयास नहीं किया है। अपितु ऐसी घटनायें कथित भगवा सरकार के कार्यकाल में और बढ़ती जा रही है। क्या आप जानते हैं अपने शास्त्रों, देवताओं का अपमान देखना-सुनना भी एक बड़ा पाप है जो “आत्मकल्याण के मार्ग से पतन का कारण होता है”
तीर्थों को पर्यटन स्थल बनाया जा रहा है। सोचिये यदि हम वहां आत्मकल्याण के लिये जाते हैं तो हमें वहां क्या-क्या मिलेंगे :
- वो ढेरों पर्यटक पापी मिलेंगे जिनको देखना भी पाप का कारण होता है, उनसे संसर्ग करना तो होता ही है।
- विलासिता बधाई जा चुकी है और वहां हमें वो सभी देखने को मिलेंगे जो हमें पथभ्रष्ट करने वाले हैं, “आत्मकल्याण के मार्ग से च्युत करने वाले हैं”
- तीर्थों में एक मात्र डुबकी लगाने के अतिरिक्त ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमारे आत्मकल्याण के अनुकूल हो अथवा विघ्न न उपस्थित करे अर्थात हमारे आत्मकल्याण के प्रतिकूल ही हैं।
- इसी प्रकार मंदिरों में देवदर्शन के अतिरिक्त ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमारे आत्मकल्याण के अनुकूल हो अथवा विघ्न न उपस्थित करे अर्थात हमारे आत्मकल्याण के प्रतिकूल ही हैं।
- जैसे : दुराचारी, म्लेच्छ, अब्राह्मण पंडे-पुजारी, भ्रष्टाचारी, अश्लील गाने, धर्म का व्यापार अर्थात लुटेरे आदि ही मिलते हैं।
यहां दुराचारी, म्लेच्छ, भ्रष्टाचारी, भ्रष्टाचारी, लुटेरे आदि की बात की गयी है जिसमें एक प्रश्न उत्पन्न होगा कि क्या इनको तीर्थ-मंदिर जाने का अधिकार नहीं है ? इसका उत्तर है जब इनका विवेक जागृत हो जाये तो प्रायश्चित और आत्मकल्याण के उद्देश्य से जाने का अधिकार है किन्तु पर्यटन, प्रदर्शन, रिलबाजी आदि के उद्देश्य से जाने का अधिकार नहीं है।
हम व्रत-पूजा-यज्ञ-अनुष्ठान आदि करते हैं और इन सबको व्यापार का साधन बना दिया गया है। सामान्य लोगों को इसका ज्ञान नहीं है क्योंकि उसे आत्मकल्याण ही परमलक्ष्य है ऐसा बताया ही नहीं जा रहा है, भोगवादी बनाया जा रहा है और धर्म को व्यापार का, आर्थिक विकास का साधन बनाया जा रहा है। तो इनके उस आत्मकल्याण के अधिकार का जो कि जन्मसिद्ध अधिकार है; हनन किया जा रहा है।
दूसरी बात यह कि सन्यास लेना आत्मकल्याण की अनिवार्य शर्त नहीं है और गृहस्थ को भी आत्मकल्याण का अधिकार है। गृहस्थ जीवन जीते हुये भी यह अधिकार सुरक्षित होना ही चाहिये। ब्रह्मचर्य आश्रम में भी आत्मकल्याण का अधिकार और उसके लिये भी यह अधिकार सुरक्षित होना चाहिये।
हम व्यवस्थागत रूप से किसी को ब्रह्मचर्याश्रम में प्रवेश पाने ही नहीं दे रहे हैं, स्कूल-कॉलेज में लव-गेम खेलने के लिये फंसा रहे हैं तो क्या यह उसके “आत्मकल्याण के जन्मसिद्ध अधिकार” का हनन नहीं है। हमारा दायित्व है कि हम उसके “आत्मकल्याण के जन्मसिद्ध अधिकार” में सहयोगी बने न की विघ्नकर्त्ता, हाँ यदि वह स्वयं ही च्युत हो जाये तो हमारा दोष नहीं, किन्तु यदि हम विघ्नकर्त्ता बन रहे हैं तो हम हनन कर रहे हैं।
भारत केवल भूगोल नहीं, एक ‘मोक्ष-द्वार’ है। यहाँ का प्रत्येक कण ‘कर्मभूमि’ की ऊर्जा से स्पंदित है। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक भारत का संविधान व्यक्ति को ‘भोग’ की स्वतंत्रता तो देता है, पर ‘योग’ और ‘आत्मकल्याण’ के मार्ग में आने वाली बाधाओं पर मौन रहता है। आत्मकल्याण का अधिकार केवल निजी साधना का विषय नहीं है; यह राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह ऐसी व्यवस्था निर्मित करे जहाँ नागरिक का आध्यात्मिक पतन न हो।
व्यवस्थागत रूप से अधिकार का संरक्षण हो हनन नहीं
उपरोक्त विमर्श का भाव यह है कि वर्त्तमान में व्यवस्थागत रूप से “आत्मकल्याण के जन्मसिद्ध अधिकार” का हनन किया जा रहा है जिसके ढेरों उदहारण हैं जो तीर्थाटन को पर्यटन बना देना, नारी सशक्तिकरण, लिविंग, अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन (कुलघाती बनने और वर्णसंकर उत्पन्न करने के संबंध में) आदि रूपों में देखने को मिल रहा है। ऐसे सभी कार्य मूलतः लोगों के “आत्मकल्याण का जन्मसिद्ध अधिकार” का हनन कर रहे हैं। जनमानस को भोगवादी बनाकर आत्मकल्याण के पथ से भ्रष्ट करते हुये पतनोन्मुखी बना रहे हैं।
अब गंभीर प्रश्न आएगा लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष आदि का क्या करें ? अरे लोकतंत्र का तात्पर्य लोककल्याण है अथवा नहीं ? धर्मनिरपेक्ष का अनर्थ बताया जा रहा है किन्तु इसका वास्तविक अर्थ धर्म की अपेक्षा न करना है किन्तु इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि यह धर्म की उपेक्षा करने के लिये कहता है। प्रश्न यहां पर यह है कि भारत मूलतः किसका है तो सीधा उत्तर है सनातन का है और सनातन भारत का है। किन्तु इस्लाम, क्राइस्ट आदि न तो भारत के हैं और न ही भारत उनका है।
हां यदि भारत में भी उसको मानने वाले कुछ लोग रहते हैं तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि सनातन भारत का नहीं और भारत सनातन का नहीं। जैसे किसी के घर में कोई व्यक्ति आकर आश्रय ले ले तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह घर उस व्यक्ति का हो जायेगा, घर जिसका था उसी का रहेगा और वही जैसे चलाना हो चालयेगा। इसी प्रकार सनातन के भारत और भारत के सनातन में यदि इस्लाम, क्राइस्ट आदि आ गए हैं तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि भारत का इस्लाम और इस्लाम का भारत हो गया अथवा क्राइस्ट भारत का और भारत क्राइस्ट का हो गया।
जिस प्रकार घर में आए अतिथि के कारण घर का स्वामी अपना ‘स्वत्व’ नहीं खो देता, उसी प्रकार पंथनिरपेक्षता (Secularism) के नाम पर सनातन धर्म के आत्मकल्याणकारी सिद्धांतों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
सामाजिक आवश्यकता या अनिवार्यता
हमने अब तक जिसे आवश्यक कहा है वो वास्तव में सामाजिक दृष्टिकोण से भी अनिवार्य है। इसके बिना सामाजिक जीवन भी विकृत हो जाता है और चतुर्दिक दिख भी रहा है। आज भी भारत का कोई सामान्य व्यक्ति यदि कानून का पालन करता है तो भय वश नहीं अपितु जितने ही अंशों में हो “आत्मकल्याण का बोध हो” तो ही करता है। अन्यथा तो जिसे आत्मकल्याण का बोध नहीं है वो डाक्टर, इंजिनियर बनके भी आतंकवादी बन जाता है, जिहाद करता है।
यदि आत्मकल्याण के लक्ष्य से भटक जायें तो कितने भी कठोर कानून क्यों न हों, वो लोग छिद्र ढूंढ ही लेते हैं और भ्रष्टाचार, अनाचार कर ही लेते हैं। यह वास्तविकता है कि आत्मकल्याण का लक्ष्य सामान्य जनता रखती है किन्तु व्यवस्था उसकी प्रतिकूल है, वो चाहकर भी आत्मकल्याण नहीं कर सकती। इसके लिये हमें कुछ उदाहरण की आवश्यकता है :
आज हमारे अन्न-जल इतने प्रदूषित हो गये हैं कि उसका विकार हमारे मन को विकृत कर ही देता है भले ही कितना भी प्रयास क्यों न करें। एक बार एक व्यक्ति से राजनीतिक विषय में कुछ वार्तालाप करते हुए कहा गया कि यदि आप ही उस पद पर हों और आपको वो सभी विलासिता सहज ही उपलब्ध हो तो क्या आप नहीं भोग करेंगे ?
प्रश्न विचारणीय था और मेरा उत्तर था कि हां हो सकता है मैं भी वही करूँ और बाद में उसको ही सही सिद्ध करूँ किन्तु अभी तो हम सुधार के विषय में विमर्श कर सकते हैं न। एक बड़े मंदिर में चर्बी वाले घी से बने लड्डू चढने की चर्चा देश भर में व्यापक रूप से किया गया किन्तु क्या अन्य मंदिरों में इस विषय पर कोई जागरूकता है ? हम जाते हैं और बाजार से मिठाई क्रय करके चढ़ा देते हैं, शुद्धि के विषय में हमें कुछ ज्ञात ही नहीं है। ये ज्ञात नहीं है इसका कारण व्यवस्था है।
हम कितना भी आत्मकल्याण का प्रयास करें किन्तु रात-दिन चारों ओर अश्लील गाने बजाये जा रहे हैं। सड़को पर चलें तो कामातुर युवावर्ग विचलित करता है क्या सड़कों पर चलना बंद कर दें, क्या कान में रुई लगाकर घर में बंद रहें ?
एक घटना है जो मध्यप्रदेश के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जुड़ा हुआ है जो ट्रेन में टीटी के ऊपर रौब दिखाते हैं, और कंपार्ट में बैठी हुई महिला के समक्ष ही मूत्रत्याग करते हैं जो प्रकरण सर्वोच्च न्यायलय तक पहुंचा। यहां ज्ञात क्या हो रहा है ? वह व्यक्ति आत्मकल्याण के पथ से भ्रष्ट है और इस कारण असामाजिक है।
जिसका लक्ष्य आत्मकल्याण हो वह किसी भी प्रकार के अनैतिक, अवैध कार्य को करने से पूर्व सौ बार सोचता है, यह व्यवस्था ही है जो उसे चलता है समझा कर पतन के गड्ढे में गिरा देती है। जिसका लक्ष्य आत्मकल्याण न हो वह किसी भी कार्य को अनैतिक और अवैध नहीं मानता। अनैतिक के विषय में तो कोई बात ही नहीं है, अवैध के विषय में छिद्र ढूंढा जाता है और फिर करते रहते हैं।
यदि समाज और राष्ट्र को भी व्यवस्थित रूप देना चाहें, सुख, शांति की कामना हो तो सबसे सुगम मार्ग यही है कि लोग आत्मकल्याण का लक्ष्य लेकर जीवनयापन करें और व्यवस्था उसके अनुकूल ही कार्य करे। प्रत्येक अपराध के लिये यदि मृत्युदण्ड का नियम बना दें तो भी जिसका लक्ष्य आत्मकल्याण नहीं है वह छिद्र ढूंढ ही लेगा और अपराध समाप्त नहीं हो सकते, समाज में सुख, शांति संभव नहीं है। किन्तु दण्ड विधान हो ही नहीं, लेकिन लोगों का लक्ष्य आत्मकल्याण हो तो वहां अपराध, अनैतिक कार्य नहीं होंगे। इस प्रकार हम सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से तो इसे और अधिक अनिवार्य समझते हैं।
विरोध कौन करेगा ?
निश्चित रूप से इस विषय का भी विरोध लोग करेंगे किन्तु जो विरोध करेंगे वो स्वयं की वास्तविकता ही प्रकट करेंगे कि वो आत्मकल्याण का लक्ष्य नहीं रखते और इस कारण वो राष्ट्र-समाज के लिये कहीं न कहीं घातक हैं।
निष्कर्ष
आत्मकल्याण का अधिकार मनुष्य के जन्मसिद्ध अधिकारों में सर्वश्रेष्ठ है। चूँकि भारत एक कर्मभूमि है, यहाँ की विधि-संहिता शास्त्र-सम्मत होनी चाहिए। जब तक राज्य व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक उत्कर्ष की पूर्ण स्वतंत्रता और संरक्षण सुनिश्चित नहीं करता, तब तक न्याय की अवधारणा अपूर्ण है। “आत्मकल्याण का अधिकार” संविधान में सम्मिलित करना केवल एक संशोधन नहीं, अपितु राष्ट्र के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान का शंखनाद होगा।

FAQ
प्रश्न : क्या आत्मकल्याण का अधिकार केवल सन्यासियों के लिए है?
उत्तर : कदापि नहीं। गृहस्थ, ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ—प्रत्येक आश्रम के व्यक्ति का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि उसकी व्यवस्था उसके आत्मकल्याण के अनुकूल हो।
प्रश्न : व्यवस्थागत रूप से आत्मकल्याण का हनन कैसे होता है?
उत्तर : जब राज्य ऐसी नीतियां बनाता है जो शास्त्रों के विरुद्ध हों, या तीर्थों की पवित्रता नष्ट करें, या वर्णसंकर को बढ़ावा दें, तो वह प्रत्यक्षतः नागरिक के आध्यात्मिक पतन (नरक गमन) का मार्ग प्रशस्त करता है, जो उसके अधिकार का हनन है।
प्रश्न : “परिष्कृत पशु” की अवधारणा क्या है?
उत्तर : यदि मनुष्य केवल भौतिक सुख, आहार और मनोरंजन तक सीमित है और उसका उद्देश्य आत्मा का शोधन नहीं है, तो शास्त्रों के अनुसार वह केवल एक ‘पढ़ा-लिखा पशु’ ही है।
प्रश्न : क्या यह मांग लोकतंत्र के विरुद्ध है?
उत्तर : नहीं। वास्तविक लोकतंत्र ‘लोक’ (जनता) का कल्याण है। चूँकि भारत की आत्मा ‘सनातन’ है, अतः यहाँ के लोक का कल्याण केवल आत्मकल्याण से ही संभव है।
प्रश्न : क्या “आत्मकल्याण” अनुच्छेद 21 में पहले से सम्मिलित नहीं है?
उत्तर : नहीं। वर्तमान में अनुच्छेद 21 केवल ‘दैहिक स्वतंत्रता’ और ‘भौतिक गरिमा’ की रक्षा करता है। आत्मकल्याण एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। यदि राज्य की नीतियां (जैसे तीर्थों का बाजारीकरण या शास्त्र-निंदा) आपके आध्यात्मिक मार्ग में बाधा डालती हैं, तो वर्तमान संविधान उसे मौलिक अधिकार का हनन नहीं मानता। अतः इसका पृथक उल्लेख आवश्यक है।
प्रश्न : भारत को ‘कर्मभूमि’ कहना संवैधानिक रूप से कैसे प्रासंगिक है?
उत्तर : संविधान भारत के विशिष्ट स्वरूप को स्वीकार करता है। चूंकि भारत की शास्त्रीय पहचान ‘कर्मभूमि’ (जहाँ कर्म से मोक्ष मिलता है) की है, इसलिए यहाँ की विधि-संहिता में ‘आत्मकल्याण’ का स्थान सर्वोच्च होना चाहिए, जैसा कि विष्णु पुराण और ब्रह्म पुराण में वर्णित है।
प्रश्न : आत्मकल्याण का अधिकार जीवन के अधिकार से ऊपर क्यों है?
उत्तर: क्योंकि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत। पौराणिक आख्यान (यथा राजा दिलीप एवं दधीचि) सिद्ध करते हैं कि महान उद्देश्यों (आत्मकल्याण और धर्म) के लिए नश्वर शरीर का त्याग करना श्रेष्ठ माना गया है। अतः साध्य (आत्मा) का अधिकार साधन (देह) के अधिकार से बड़ा है।
प्रश्न : इस अधिकार को संविधान में जोड़ने से सामान्य नागरिक को क्या लाभ होगा?
उत्तर: इससे शिक्षा में आत्म-विद्या को स्थान मिलेगा, आध्यात्मिक संस्थानों और तीर्थों की पवित्रता अक्षुण्ण रहेगी, और व्यक्ति को अपने मानसिक एवं आत्मिक उत्थान के लिए राज्य से विधिक संरक्षण प्राप्त होगा।
प्रश्न : क्या राज्य आत्मकल्याण सुनिश्चित कर सकता है?
उत्तर : राज्य आत्मकल्याण प्रदान नहीं कर सकता, किंतु वह ऐसे ‘अवरोध’ हटा सकता है और ऐसा ‘वातावरण’ निर्मित कर सकता है जहाँ नागरिक सुगमता से अपने पथ पर बढ़ सकें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









