“जो शास्त्रों को बदलने की बात करे, वह सनातनी आवरण में छिपा शत्रु है।”
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक रंग का अपना आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। भगवा जहाँ वैराग्य और चित्त की शुद्धि का परिचायक है, वहीं ‘नील’ को शास्त्रों ने अपवित्र और तामसी माना है। वर्तमान में जो नीलान्तरण हो रहा है, वह मात्र वस्त्र का परिवर्तन नहीं, अपितु विचारधारा का क्षरण है।
संघ और भाजपा जो कभी भगवा के ध्वजवाहक होने का दम्भ भरते थे, आज सूक्ष्म रूप से नील के आकर्षण में बंध चुके हैं। यह परिवर्तन इतना धीमा और योजनाबद्ध है कि सामान्य जन मानस इसे देख ही नहीं पा रहा। सामने से प्रहार करने वाले शत्रु से लड़ना सरल है, किंतु जो अपने होकर शास्त्रों को प्रक्षिप्त कहें और धर्म के आधारभूत वर्णों को बदल दें, वे अधिक घातक हैं। भगवा का यह नीलान्तरण सनातन के मूल स्वरूप को विकृत करने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।
भगवा का नीलान्तरण हो गया और पता ही नहीं चला
“सामने का प्रहार घाव देता है, पीछे का प्रहार अस्तित्व मिटा देता है।”
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा का ‘नीलान्तरण’ मात्र एक फैशन नहीं, बल्कि एक गहरी विचारधारात्मक शिफ्ट है। संघ और भाजपा ने भगवा को अपनी सीढ़ी बनाया, किंतु सत्ता की चोटी पर पहुँचते ही उन्होंने उसी भगवा के मूल सिद्धांतों—अर्थात शास्त्रों की मर्यादा को चुनौती देना आरम्भ कर दिया।
यह आलेख उस ‘नीले सियार’ की असलियत उजागर करने के लिए है जिसने भगवा ओढ़कर सनातनी समाज का विश्वास जीता, किंतु अब सत्ता की गद्दी पर बैठते ही उसका वास्तविक नीला वर्ण उभर आया है।
भारतीय संस्कृति में वर्ण (रंग) मात्र परावर्तन नहीं, अपितु वृत्ति के परिचायक हैं। भगवा जहाँ वैराग्य, त्याग और ज्ञान की अग्नि का प्रतीक है, वहीं ‘नील’ को शास्त्रों ने अधर्म, अशुद्धि और तामस का वाहक माना है। विडंबना देखिये कि जिस संगठन का जन्म भगवा ध्वज की छाया में हुआ, आज उसकी राजनीतिक इकाई (भाजपा) पूर्णतः ‘नीलान्तरित’ हो चुकी है। यह नीलान्तरण केवल वस्त्रों तक सीमित नहीं है, अपितु यह उस मानसिकता का परिचायक है जो शास्त्रों को ‘प्रक्षिप्त’ मानती है और आचार्यों को अपनी विचारधारा का अनुगामी बनाना चाहती है। यह आलेख उस ‘नीले सियार’ की असलियत उजागर करने के लिए है जिसने भगवा ओढ़कर समाज को भ्रमित किया, किंतु अब उसका रंग उतरने लगा है।
सामने से प्रहार होने पर हम ढाल उठा सकते हैं, किंतु जो रक्षक बनकर पीठ में छुरा घोंप रहे हैं, उनसे कैसे बचेंगे?
शास्त्रों को प्रक्षिप्त (मिलावटी) कहना प्रथम चरण था, शास्त्रों में परिवर्तन करने के लिये उकसाना द्वितीय चरण और जब शास्त्रनिष्ठ (ब्राह्मण वर्ग) इसको अस्वीकार कर रहा है तो उसे बाध्य करने का प्रयास कर रहे हैं और ऐसा भी वक्तव्य मिलता है जिसमें कहते हैं कि पंडितों-पुजारियों आदि को इस प्रकार का संदेश (संघ की विचारधारा) देना चाहिये। और तो और एक प्रतीकात्मक धमकी भी दी जा रही है कि यदि मेरी विचारधारा के अनुसार नहीं बोलोगे और शास्त्र के अनुसार ज्ञान बांटोगे तो “शंकराचार्य को भी नहीं छोडूंगा तुम्हारी क्या औकात है” वर्त्तमान में प्रयाग के माघमेला में शंकराचार्य के अपमान वाली घटना का प्रच्छन्न सन्देश तो यही है।

भगवान विष्णु “नीलाम्बुजश्यामल” (नील वर्ण) हैं, फिर नीला रंग निषिद्ध क्यों?
“नील का स्पर्श शास्त्र के विरुद्ध है, और नील का मोह सनातन के विरुद्ध।”
अज्ञानी लोगों का तर्क हो सकता है कि भगवान विष्णु का वर्ण तो नीला है – “नीलाम्बुजश्यामल”, फिर नीला रंग बुरा कैसे? यहाँ महान शास्त्र-भ्रम है:
- प्राकृतिक वर्ण बनाम कृत्रिम नील: भगवान का वर्ण ‘नील’ नहीं, ‘श्याम’ (Deep Clouds/Space) है। यह ‘प्राकृतिक आभा’ है। भगवान विष्णु के इस वर्ण का मूल सागरमंथन से जुड़ा है। हलाहल विष के प्रभाव से शिव का कंठ और विष्णु की आभा नीली हुई। स्पष्ट है कि नील वर्ण के पीछे हलाहल विष का प्रभाव छुपा है, जो संसार के दुखों का प्रतीक है।
- विषाक्त नील: शास्त्रों ने जिस ‘नील’ का निषेध किया है, वह ‘इन्डिगो’ (Indigoferra Tinctoria) है, जो एक विषैले पौधे से निर्मित होता है। यह रंग सात्विक ऊर्जा को सोख लेता है (Light Absorber)।
- आध्यात्मिक विज्ञान: भगवान विष्णु नीलाम्बर नहीं, ‘पीताम्बर’ धारण करते हैं। वे नील वर्ण के होकर भी पीला वस्त्र पहनते हैं ताकि तामस का शमन हो। आज के राजनीतिज्ञों ने पीताम्बर (भगवा) त्यागकर नील को अपना लिया है, जो साक्षात विष्णु की आज्ञा का उल्लंघन है।
नील निषेध के शास्त्रीय प्रमाण
“संघ का राष्ट्रवाद यदि शास्त्र के विरुद्ध है, तो वह अधर्म है।”
- मनुस्मृति: “नीलीरक्तं वसनं यस्त्वन्त्यजैरपि पालितम्। तस्य दर्शनमात्रेण सूर्यमवलोकयेत्॥” (नील से रंगा वस्त्र यदि अंत्यज ने भी छुआ हो, तो दर्शन मात्र से सूर्य दर्शन कर शुद्धि करनी चाहिए।)
- अंगिरा स्मृति: “नीलीरक्तं च यद्वस्त्रं तद् दग्ध्वा भस्म कारयेत्। न तद्धार्यं न च स्पृश्यं सवासाः स्नानमर्हति ॥“ (नीले वस्त्र को जला देना चाहिए; उसे पहनना तो दूर, स्पर्श करने पर सवस्त्र स्नान अनिवार्य है।)
- अत्रि स्मृति : “नीलीवस्त्रेण यत् पक्वं नीलीवस्त्रेण यत् कृतम्। तद् भोज्यं न च भोक्तव्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥“ (नीले वस्त्र पहनकर बनाया गया भोजन अभोज्य है; उसे खाने पर चान्द्रायण व्रत करना पड़ता है।)
- व्यास स्मृति : “नीलीरक्तं वसनं यस्य देहे तु तिष्ठति। पितरस्तस्य न अश्नन्ति वर्षाणि दश पञ्च च ॥“ (नीला वस्त्र धारण करने वाले के पितर १५ वर्षों तक तर्पण स्वीकार नहीं करते।)
- विष्णु धर्मसूत्र: “नीलीरक्तं वसनं च न स्पृशेत्।” (नील से रंगे वस्त्र का स्पर्श भी निषिद्ध है।)
- यम स्मृति: “नीलीरक्तं च यद्वस्त्रं तद् दग्ध्वा तस्य भस्मना। स्नात्वा च सवासास्तस्य शुद्धिर्विधीयते॥” (नीले वस्त्र के स्पर्श पर सवस्त्र स्नान का विधान है।)
- पाराशर स्मृति : “नीलीरक्तं यदा वस्त्रं द्विजातिः कामतश्चरेत्। तदहस्तस्य पापिष्ठं जायते नात्र संशयः ॥“ (अर्थ: जो द्विज जानबूझकर नीला वस्त्र धारण करता है, उसका वह पूरा दिन पापमय हो जाता है।)
- बौधायन धर्मसूत्र: “नीलीरक्तं न धारयेत्।”
- पद्म पुराण: “नीलीरक्तं वसनं यस्य देहे तु तिष्ठति। स सर्वं फलमाप्नोति यत्किञ्चित्कुरुतेऽशुभम्॥” (नीला वस्त्र धारण करने वाला केवल अशुभ फल प्राप्त करता है।)
- स्कंद पुराण: “नीलीरक्तं वसनं दृष्ट्वा आदित्यमवलोकयेत्।” (नीला वस्त्र शरीर पर होने पर शुद्धि हेतु सूर्य का दर्शन अनिवार्य है।)
- मरीचि स्मृति: “नीलीरक्ते तु वाससि।” नील के स्पर्श पर पंचगव्य प्राशन का विधान बताती है।
- शंख स्मृति : “नीलीरक्तं वसनं यस्तु ब्राह्मणो धारयेत् क्वचित्। स पापी नरकं याति शूद्रवत् परिपूज्यते ॥” अर्थ: जो ब्राह्मण नील धारण करता है, वह नरकगामी होता है और उसकी स्थिति शूद्र के समान हो जाती है।
विशेष ध्यातव्य : शास्त्रों में रेशमी और ऊनी वस्त्रों में नील का दोष नहीं बताया गया है— “न दोषो रोमवस्त्रेषु नीलीरक्तेषु कर्हिचित्”। किंतु, यहाँ विषय ‘प्रतीकात्मकता’ का है। भाजपा नेतृत्व जिस प्रकार योजनाबद्ध तरीके से रेशमी वस्त्रों की ओट में नील का प्रदर्शन कर रहा है, वह स्पष्टतः एक वैचारिक संक्रमण है।
नीले सियार की कहानी और वर्तमान ‘नीलान्तरण’
पञ्चतन्त्र की ‘नीले सियार’ (नीलवर्ण श्रृगाल) की कथा आज के राजनीतिक परिदृश्य पर सटीक बैठती है। पञ्चतन्त्र की ‘नीलवर्ण श्रृगाल’ की कथा केवल बच्चों की कहानी नहीं, अपितु राजनीति शास्त्र का एक गंभीर पाठ है। जब सियार नील के कुंड में गिरता है, तो उसकी बाह्य आकृति बदल जाती है, किंतु उसकी आंतरिक ‘प्रवृत्ति’ वही रहती है।

- कथा का मर्म: एक सियार नील के टब में गिरकर नीला हो गया और उसने स्वयं को ‘देवदूत’ घोषित कर वन के पशुओं पर राज करना आरम्भ कर दिया। भोले पशु उसे दिव्य समझकर पूजने लगे।
- वर्तमान संदर्भ: संघ और भाजपा ने भगवा का ओढ़ावन पहनकर सनातनी जनमानस का विश्वास जीता। किंतु सत्ता के मद में अब उनका वास्तविक ‘नील’ वर्ण उभर आया है। जिस प्रकार उस सियार का भेद उसके ‘चीत्कार’ (हुंकार) से खुला, वैसे ही इन संगठनों का भेद तब खुलता है जब ये शास्त्रों को ‘प्रक्षिप्त’ कहते हैं और आचार्यों का अपमान करते हैं।
- भेद का उद्घाटन: भाजपा के प्रमुख आयोजनों, मंचों और विदेशी दौरों में आप देखेंगे कि भगवा लुप्त हो चुका है और ‘नीला’ रंग प्रधान हो गया है। यह नीलान्तरण सिद्ध करता है कि वे अब अपनी मूल सनातनी पहचान से लज्जित हैं और वैश्विक शक्तियों को प्रसन्न करने हेतु ‘नील’ की शरण में हैं।
पीठ पर प्रहार और छद्म राष्ट्रवाद
“शास्त्र के अनुसार समाज नहीं, बल्कि समाज के अनुसार शास्त्र बदलने की जिद ही अधर्म है।”
- रेशमी वस्त्रों की धूर्तता और नीलान्तरण: शास्त्रज्ञ जानते हैं कि रेशम (Silk) में नील का दोष नहीं है, किंतु भाजपा ने इसी ‘छूट’ का लाभ उठाकर अपने संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को नीला कर दिया है। यदि ये लोग उजले वस्त्र पहनते, तो उसमें भी ‘नील’ (Ujala/Indigo) का प्रयोग करते। यह नीलापन केवल कपड़ों पर नहीं, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली में है। यह उस नीली सत्ता का प्रभाव है जो सनातन के मूल वर्णों को मिटाना चाहती है।
- संघ का सनातन विरोध: शास्त्रों को प्रक्षिप्त कहना: सबसे चिंताजनक पक्ष संघ की वह विचारधारा है जो कहती है कि हमारे शास्त्रों में बहुत कुछ ‘प्रक्षिप्त’ (बाद में जोड़ा गया) है। जब वे शास्त्रों को बदलने की बात करते हैं, तो वे वास्तव में स्वयं को ऋषियों से ऊपर घोषित करते हैं। यह वही मानसिकता है जो कहती है कि “शास्त्र के अनुसार नहीं, मेरी (संघ की) विचारधारा के अनुसार समाज को बताओ।” यह आचार्यों की स्वायत्तता का हनन है।
- सामने का शत्रु बनाम पीठ का शत्रु: इतिहास में इस्लाम या ईसाइयत ने सामने से प्रहार किया, जिससे हम सावधान रहे। किंतु भाजपा और संघ ‘पीठ पर प्रहार’ कर रहे हैं। वे राम का नाम लेते हैं, किंतु राम के द्वारा पूजित ऋषियों और शास्त्रों की मर्यादा को खंडित करते हैं। जो लोग सामने से लड़ते हैं, उनका प्रतिकार संभव है; किंतु जो रक्षक बनकर शास्त्रों को ‘अप्रासंगिक’ बताते हैं, उनका प्रतिकार करना कठिन है क्योंकि समाज उनकी ‘भगवा छवि’ से भ्रमित है।
- भाजपा का राजनीतिक नीलान्तरण: भाजपा ने रणनीतिक रूप से भगवा को ‘चुनावी भगवा’ बना दिया है और वास्तविक जीवन में ‘नीलान्तरण’ को अपना लिया है। यह वैश्विक शक्तियों (Deep State) के साथ उनके तालमेल का संकेत है, जहाँ सनातन की प्रखरता को धीमा (Mute) करने के लिए रंगों के मनोविज्ञान का प्रयोग किया जा रहा है।
शास्त्रों की सर्वोच्चता: राष्ट्रवाद तभी तक वंदनीय है जब तक वह धर्म के अधीन है। यदि राष्ट्रवाद शास्त्रों को ‘प्रक्षिप्त’ कहकर अपनी नई संहिता बनाना चाहे, तो वह अधर्म है।
निष्कर्ष
सनातनी समाज को यह समझना होगा कि रंगों का परिवर्तन मात्र दृश्य नहीं है, यह ऊर्जा का परिवर्तन है। भगवा से नील की ओर बढ़ना प्रकाश से अंधकार की ओर बढ़ना है। कोई भी दल या संघ शास्त्रों से ऊपर नहीं हो सकता। संघ या भाजपा कोई भी हो, उन्हें शास्त्रों के नीचे ही रहना होगा। यदि कोई शास्त्रों को बदलने की बात करता है, तो वह सनातनी नहीं हो सकता। जो लोग सामने से प्रहार करते हैं, उनका प्रतिकार संभव है, किंतु जो अपने होकर पीछे से प्रहार कर रहे हैं, उनसे बचने के लिए शास्त्र-ज्ञान ही एकमात्र शस्त्र है।

“सावधान: नीले सियार का भेद खुल गया है।”
FAQ
प्रश्न : संघ शास्त्रों को प्रक्षिप्त क्यों कहता है?
उत्तर : ताकि वह अपनी आधुनिक और राजनीतिक विचारधारा को शास्त्रों के ऊपर थोप सके। अपनी सुविधा के अनुसार समाज को ढालने के लिए शास्त्रों की मौलिकता पर चोट की जा रही है।
प्रश्न : भाजपा का नीलान्तरण कैसे सिद्ध होता है?
उत्तर : उनके नेताओं के वस्त्रों और कार्यक्रमों के प्रतीकों में बढ़ते नीले रंग के प्रयोग से।
प्रश्न : सामान्य लोगों को यह क्यों नहीं दिखता?
उत्तर : क्योंकि वे शास्त्र-ज्ञान से वंचित हैं और मीडिया के प्रभाव में हैं।
प्रश्न : पीठ पर प्रहार का क्या अर्थ है?
उत्तर : सनातनी बनकर शास्त्रों की जड़ें काटना ही पीठ पर प्रहार है।
प्रश्न : क्या राजनीतिक दल शास्त्रों को बदल सकते हैं?
उत्तर : कदापि नहीं, शास्त्र ‘अपौरुषेय’ और ‘ऋषि-दृष्ट’ हैं। किसी संघी या नेता के कहने से अथवा इतिहासों में लिख देने से शास्त्र प्रक्षिप्त सिद्ध नहीं होता और न ही परिवर्तनीय हो सकता है। ऐसा विचार ही सनातन विरोधी होना प्रकट करता है।
प्रश्न : शंकराचार्य का विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर : क्योंकि वे शास्त्र-मर्यादा के रक्षक हैं और सरकार की ‘नीलान्तरित’ नीतियों के विरुद्ध प्रखर स्वर उठाते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख विशुद्ध रूप से सनातनी स्मृतियों, पुराणों और धर्मसूत्रों के वर्ण-विधान पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल की छवि धूमिल करना नहीं, अपितु शास्त्रों में वर्णित वर्ण-निषेध के प्रति सनातनी समाज को जाग्रत करना है। आलेख में प्रस्तुत निष्कर्ष शास्त्रों के आलोक में दिए गए हैं, जिन्हें वर्तमान परिदृश्य के साथ जोड़कर देखा गया है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









