हम संविधान के लिये नहीं बने हैं, संविधान हमारे लिये है – संविधान हमारा निर्माता नहीं, निर्मित संविदा है

हम संविधान के लिये नहीं बने हैं, संविधान हमारे लिये है - संविधान हमारा निर्माता नहीं, निर्मित संविदा है हम संविधान के लिये नहीं बने हैं, संविधान हमारे लिये है - संविधान हमारा निर्माता नहीं, निर्मित संविदा है

प्रस्तावना: शब्दावलियों का राजनीतिक कुचक्र

वर्तमान भारतीय विमर्श में एक ऐसा कृत्रिम द्वंद्व उत्पन्न कर दिया गया है, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। राजनीति के अखाड़े में अक्सर यह प्रश्न उछाला जाता है कि “धर्म बड़ा या संविधान?” यह प्रश्न ही अपने आप में एक तार्किक विकृति (Logical Fallacy) है। जब 56 इंच का सीना तानकर कोई राजनीतिज्ञ कहता है कि “मेरे लिए संविधान ऊपर है,” तो वह अनजाने में अपनी बौद्धिक रिक्तता का परिचय दे रहा होता है। यह आलेख उसी मूढ़ता के आवरण को हटाकर सत्य के अन्वेषण का प्रयास है।

Table of Contents

वर्तमान युग में बौद्धिक विमर्श का स्तर इतना गिर चुका है कि ‘धर्म’ और ‘संविधान’ जैसे शब्दों को परस्पर विरोधी खड़ा कर दिया गया है। सत्ता के गलियारों में बैठे मूढ़ राजनीतिज्ञ, जिनकी चिंतन-शक्ति सत्ता की क्षुद्र सीमाओं में कैद है, वे प्रायः यह गर्जना करते हैं कि “मेरे लिए संविधान धर्म से ऊपर है।” यह कथन ठीक वैसा ही है जैसे कोई कहे कि “समुद्र की एक लहर पूरे महासागर से बड़ी है।” यह आलेख उन मूढ़ों के लिए एक दर्पण है जो अपनी जड़ें काटकर शाखाओं की पूजा कर रहे हैं।

१. राजधर्म और संविधान: अंशी और अंश का विवेचन

धर्म कोई संकुचित ‘पूजा पद्धति’ नहीं है, बल्कि वह तत्व है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करता है — धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः। यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥ (महाभारत, कर्ण पर्व)।

संविधान क्या है? संविधान राज्य के संचालन के लिए बनाया गया एक अनुबंध (Contract) है, एक नियमावली है। यह ‘राजधर्म’ से संबंधित है अर्थात धर्म का एक अंग मात्र से इसका संबंध है। किसी भी वस्तु का ‘अंश’ (Part) कभी अपने ‘अंशी’ (Whole) से बड़ा नहीं हो सकता। धर्म एक व्यापक अवधारणा है जो सृष्टि के धारण करने वाले नियमों (Cosmic Order) का समूह है।

भारतीय मनीषा में राज्य के संचालन के नियमों को ‘राजधर्म’ कहा गया है। अतः संविधान, राजधर्म का ही एक आधुनिक स्वरूप या उसका एक अंश है। अब विचार कीजिए, जो नियमावली स्वयं धर्म के एक उप-भाग ‘राजधर्म’ से निकली हो, वह धर्म से ऊपर या धर्म के विरुद्ध कैसे हो सकती है? यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई कहे कि “शाखा वृक्ष से बड़ी है।” यह प्रश्न अज्ञानता की उपज है, क्योंकि अंश और अंशी में वरिष्ठता का विवाद ही अप्रासंगिक है।

१. राजधर्म और संविधान: अंशी और अंश का विवेचन
१. राजधर्म और संविधान: अंशी और अंश का विवेचन
  • तर्क: जो नियमावली स्वयं धर्म के एक उप-भाग ‘राजधर्म’ से निकली हो, वह मूल धर्म से श्रेष्ठ कैसे हो सकती है?
  • शास्त्रीय प्रमाण: मनुस्मृति और कौटिल्य अर्थशास्त्र में स्पष्ट है कि राजा का दंड (कानून) धर्म के अधीन है।

“धर्मो रक्षति रक्षितः” — यदि आप उस शाश्वत व्यवस्था (धर्म) की रक्षा करेंगे, तभी संविधान जैसी व्यवस्थाएँ आपकी रक्षा कर पाएँगी।

२. अधिकार कौन देता है? निर्माता बनाम नैसर्गिक अस्तित्व

एक बहुत बड़ा भ्रम यह फैलाया गया है कि “संविधान हमें मौलिक अधिकार देता है।” यह कथन चिंतन-मनन शक्ति के परित्याग का परिचायक है। हमें समझना होगा कि संविधान किसे अधिकार दे सकता है?

  • अधिकारों का स्रोत: संविधान केवल उन्हीं इकाइयों को अधिकार दे सकता है जिनका वह ‘निर्माता’ है। संसद, चुनाव आयोग, न्यायपालिका और राज्य सरकारें—ये सभी संविधान की संतानें हैं, अतः संविधान इनका स्वामी है।
  • नैसर्गिक सत्ता: व्यक्ति, परिवार और समाज का निर्माता संविधान नहीं है।
    • क्या आपकी भूख संविधान ने बनाई है?
    • क्या माता-पिता और संतान का संबंध संविधान की धारा से उत्पन्न हुआ है?
    • क्या आपकी चेतना संविधान की देन है?
माता-पिता की महिमा: शास्त्रीय प्रमाण

संविधान केवल उन्हीं संस्थाओं का स्वामी है जिनका वह जनक है (जैसे कंपनियाँ या सरकारी संगठन)। जो हमारा निर्माता नहीं, वह हमें अधिकार कैसे दे सकता है? सत्य तो यह है कि हमारे अधिकार ‘नैसर्गिक’ (Inherent) हैं। हमने संविधान को अधिकार दिए हैं कि वह हमारी व्यवस्था करे, न कि संविधान ने हमें जीवन जीने का अधिकार दिया है।

३. हम संविधान के निर्माता हैं, संविधान हमारा निर्माता नहीं

लोकतंत्र का मूल मंत्र है—”हम भारत के लोग।” हमने (हमारे प्रतिनिधियों ने) इस संविधान को आत्मार्पित किया है। इसका अर्थ है कि संविधान का अस्तित्व ‘हमारे’ अस्तित्व पर टिका है।

  • परिवर्तनशीलता: दुनिया भर में सैकड़ों बार संविधान बदले गए, तख्तापलट हुए। यदि संविधान से हमारा अस्तित्व होता, तो संविधान के समाप्त होते ही जनता का अस्तित्व भी समाप्त हो जाना चाहिए था।
  • कर्ता बनाम उपकरण: संविधान बदलता है क्योंकि मनुष्य उसे बदलता है। जिसके पास बदलने की शक्ति है, वही श्रेष्ठ है। हम (समाज) ‘कर्ता’ हैं और संविधान हमारा ‘उपकरण’ (Tool) है। मूढ़ लोग उपकरण को ही कर्ता मान बैठे हैं।

यथा: “मनुष्यः साधनं करोति, न तु साधनं मनुष्यम्।” (मनुष्य साधन बनाता है, साधन मनुष्य को नहीं बनाता।)

हमारा अस्तित्व सनातन है, संविधान की आयु मात्र ७५ वर्ष है। जिसे बदला जा सकता है, जो संशोधित (Amend) हो सकता है, वह उस सत्य से बड़ा कैसे हो सकता है जो ‘अपरिवर्तनीय’ है? वास्तविकता यही है कि हम संविधान के निर्माता हैं किन्तु संविधान हमारा निर्माता नहीं है।

४. मौलिक अधिकार: सुरक्षा या खैरात?

जब हम कहते हैं कि “संविधान हमें धार्मिक स्वतंत्रता देता है,” तो हम स्वयं को दास स्वीकार कर लेते हैं। धर्म का पालन करना हमारा नैसर्गिक अधिकार है। संविधान केवल यह घोषणा करता है कि राज्य इस नैसर्गिक अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

अधिकार ‘खैरात’ नहीं होते जो संविधान ने हमें दिए हैं। अधिकार वे शक्तियाँ हैं जो हमारे पास पहले से थीं, हमने संविधान नामक अनुबंध के माध्यम से राज्य को केवल उन्हें ‘सुरक्षित’ रखने का दायित्व सौंपा है। यदि कल संविधान न रहे, तब भी व्यक्ति का ईश्वर से संबंध या परिवार के प्रति कर्तव्य समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वे संविधान-पूर्व और संविधान-पर (Beyond Constitution) हैं।

४. मौलिक अधिकार: सुरक्षा या खैरात?

५. राजनीति की मूढ़ता और जनमानस का दिग्भ्रम

जब कोई राजनीतिज्ञ कहता है कि “संविधान ऊपर है,” तो वह वास्तव में जनमानस को दिग्भ्रमित कर रहा होता है। राजनीतिज्ञों ने संविधान को एक ‘पवित्र ग्रन्थ’ की तरह नहीं, बल्कि एक ‘राजनीतिक ढाल’ की तरह प्रयोग करना शुरू कर दिया है। जब वे कहते हैं कि “संविधान ऊपर है,” तो वे वास्तव में धर्म और संस्कृति के शाश्वत मूल्यों को दबाने का प्रयास कर रहे होते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि:

  • संविधान की आयु ७५ वर्ष है।
  • धर्म (कर्तव्य/मर्यादा) की आयु करोड़ों वर्ष है। जो भंग हो सकता है, जो संशोधित हो सकता है, वह उस सत्य से बड़ा कैसे हो सकता है जो अपरिवर्तनीय है?
  • अनुबंध बनाम सत्य: संविधान एक ‘पारस्परिक अनुबंध’ (Mutual Agreement) है। हमने इसे बनाया, हमने इसे अधिकार दिए।
  • भ्रम की राजनीति: यदि आप कहते हैं कि “संविधान मुझे धार्मिक स्वतंत्रता देता है,” तो आप स्वयं को एक ‘कैदी’ मान रहे हैं जिसे जेलर ने कुछ छूट दी है। जबकि सत्य यह है कि धर्म पालन आपकी आत्मा का गुण है, संविधान का कार्य केवल राज्य को आपकी इस स्वाभाविकता में बाधा डालने से रोकना है।

इस संबंध में कुछ विशेष तथ्यों को उजागर करना आवश्यक है :

  • वर्त्तमान राजनीतिक कर्णधार (नियुक्त व्यवस्था संचालक) स्वयं को सर्वज्ञाता समझने लगते हैं जबकि उन्हें सामान्य सिद्धांतों का भी ज्ञान नहीं होता।
  • ये कुछ पुराणों के शब्दों को पढ़कर उसके संबंध में भी ज्ञाता होने का भ्रम पालते हैं।
  • ये समस्या और समाधान के लिये अपने गुरु का आश्रय नहीं लेते अपितु ये स्वयं ही अपने मतिभ्रमता के कारण समस्या भी ज्ञात करते हैं और उसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं एवं स्वयं को गुरुओं के ऊपर समझते हैं और उन्हीं को मार्गदर्शन देने का कुकर्म भी करते हैं कि जैसा मैं कह रहा हूँ आपलोग वैसा ही करें। यहां एक वीडियो संलग्न किया जा रहा है जिसमें इस तथ्य को भलीभांति समझा जा सकता है।

यह वीडियो यद्यपि एक व्यक्ति विशेष का है किन्तु इसे व्यक्तिपरक न समझा जाय ये सामूहिक मतिभ्रमता को ही उजागर करने के लिये है। जितने भी कर्णधार हैं सबकी लगभग यही कुबुद्धि देखने को मिलती है। शास्त्रों को समझने की न तो शक्ति है और न ही शास्त्रों को समझने के लिये गुरु का आश्रय लेते हैं किन्तु थोड़ा-बहुत पढ़-सुन कर स्वयं महागुरु होने का भ्रम पाल लेते हैं। वीडियो में स्पष्ट रूप से गुरुओं के लिये निर्देश दिया जा रहा है।

सोचिये यह कर्णधार वर्ग कितना भ्रमित है :

  • ये लोग कहते हैं कि जाति व्यवस्था थी नहीं, अंग्रेजों द्वारा बनाई गयी। तो फिर भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के काल में कौन सा अंग्रेज था जिसने जातिव्यवस्था बनाया था ?
  • ये स्वयं ही सूत भी बोलते हैं और कहते हैं जातिव्यवस्था नहीं थी, कितने विरोधाभासी वकतव्य हैं ?
  • उक्त वीडियो में गोत्र व्यवस्था की बात की गयी है, गोत्र व्यवस्था तो वर्त्तमान में भी विद्यमान है ही और ये स्वयं भी भारद्वाज गोत्र बताकर इसकी सिद्धि कर रहे हैं। तो फिर किस गोत्र व्यवस्था को लाने की बात कर रहे हैं, सन्देश छुपा हुआ नहीं है स्पष्ट देते हैं जाति और वर्णव्यवस्था को समाप्त कर दिया जाय जो कि मनगढंत है। संविधान तुम्हारा बनाया हुआ है और इसे तुम नष्ट करने का अधिकार रखते हो, जाति-वर्ण-आश्रम ये तुम्हारा बनाया हुआ ही नहीं है तो इसे नष्ट करने का अधिकार तुमने कैसे प्राप्त किया ?
  • ये सीता स्वयंवर में रावण की उपस्थिति तो बताता है किन्तु यह छुपा लेता है कि द्रोपदी के स्वयंवर में कर्ण भी था और उसे अनधिकृत सिद्ध किया गया।
  • ये ढेरों उदाहरण तो प्रस्तुत करता है किन्तु प्रामाणिक रूप से नहीं भ्रामक रूप से जिसका एक उदाहरण बता दिया गया है।

इसके दृष्टिकोण से तो रावण ने सीता (विवाहिता) का अपहरण किया था और वो भी उचित ही था तभी तो रावण ने किया। अरे यदि हम संविधान, न्याय संहिता आदि को समझने का भी प्रयास करें तो मात्र अध्ययन करके भली-भांति नहीं समझ पायेंगे। तुमलोग ऋषि प्रणीत शास्त्रों को उसके शब्दों को पढ़कर समझने का भ्रम क्यों पाल लेते हो। यदि तुम भ्रम पाल लेते हो तो पालते रहो, जनमानस को भी दिग्भ्रमित क्यों करते रहते हो। तुम्हारे पास शास्त्रों को समझने का सामर्थ्य ही नहीं है तो शास्त्रीय आधार से अपने मनगढंत कुतर्कों को सिद्ध करने का कुप्रयास करते हो यह भी पाप है और तुम धर्म का ज्ञान बांट रहे हो।

यदि मैं यह स्वीकार कर सकता हूँ कि संविधान कर कानून को मात्र पढ़कर भलीभांति नहीं समझ पाउँगा, किसी विधिवेत्ता के परामर्श की भी आवश्यकता होगी तो तुम लोगों को यह स्वीकारने में आपत्ति क्यों है कि शास्त्रों को मात्र पढ़कर नहीं समझ सकते हो। अरे शास्त्र को समझने के लिये तो तपस्या की भी आवश्यकता पड़ती है, सरस्वती की कृपा और गुरुकृपा भी अनिवार्य है, तो तुम अपने मन में यह भ्रम क्यों पाल लेते हो कि तुमने बिना तपस्या और गुरु के ही समझ लिया।

मूढ़ता और दिग्भ्रम
मूढ़ता और दिग्भ्रम

उपरोक्त सभी तथ्य जिसकी वीडियो है मात्र उस व्यक्ति के लिये नहीं है अपितु सम्पूर्ण वर्ग के लिये ही है। वर्त्तमान में संघ की व्यवस्थापक मंडल में अधिक पैठ है और सबका यही विचार है। सब लगभग इसी प्रकार भ्रामक तथ्यों को उलट-पलट कर प्रस्तुत करते हैं और जाति-वर्ण-आश्रम आदि को नष्ट करने की बात करते हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि का उदाहरण देकर समस्या तो बताते हैं किन्तु इस समस्या का समाधान कौन देगा, किससे प्राप्त करें इन्हें यही नहीं ज्ञात है और स्वयं को ही महागुरु समझ लेते हैं।

इसके कारण एक और भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि जो वास्तविक गुरु हैं वो अल्पज्ञ हैं और उनको ये भ्रमित लोग निर्देश तक देने लगते हैं कि आपलोग हमें समझाओ मत, मैं जो समझा रहा हूँ वो समझो और जो कह रहा हूँ वह करो। अरे मूढ़ ऐसे में समस्या का समाधान नहीं होगा, समस्या और बढ़ जायेगी। इनके इस भ्रम का एक और भी कारण है वो यह कि वर्त्तमान में जो प्रसिद्ध कथावक्ता आदि हैं उनको इन्हीं लोगों ने प्रसिद्ध किया है इसलिये स्वयं को इनका महागुरु समझने का भ्रम पाल लेते हैं।

निष्कर्ष: चेतना का जागरण

हमें यह समझना होगा कि हम संविधान के लिए नहीं हैं, संविधान हमारे लिए है। संविधान देश चलाने की मशीनरी है, जीवन जीने का दर्शन नहीं। जीवन दर्शन तो धर्म, संस्कृति और नैसर्गिक मूल्यों से ही प्राप्त होता है। संविधान एक श्रेष्ठ नियमावली हो सकती है, किंतु वह ‘जीवन दर्शन’ नहीं है। वह समाज को दंडित कर सकता है, अनुशासित कर सकता है, किंतु वह मनुष्य को ‘संस्कारी’ नहीं बना सकता।

संविधान की दुहाई देकर जो लोग माता-पिता के अनादर, सामाजिक विखंडन या प्रकृति-विरोधी आचरण को बढ़ावा देते हैं, वे वास्तव में ‘मूर्खों के स्वर्ग’ में जी रहे हैं। जिस दिन समाज अपनी चेतना खो देगा, उस दिन कोई भी संविधान देश को नहीं बचा पाएगा।

दो टूक बात यह है: मर्यादा संविधान से नहीं, संस्कार से आती है। संविधान केवल अपराधी को दंड दे सकता है, किंतु श्रेष्ठ मनुष्य का निर्माण केवल धर्म (राजधर्म सहित) की छाया में ही संभव है।

FAQ

प्रश्न : क्या संविधान धर्म से बड़ा है?

उत्तर: यह प्रश्न ही तार्किक रूप से दोषपूर्ण है। धर्म वह शाश्वत व्यवस्था है जो पूरी सृष्टि को धारण करती है। संविधान राज्य चलाने की एक नियमावली है, जो ‘राजधर्म’ (धर्म का एक लघु अंश) के अंतर्गत आती है। अतः एक ‘अंश’ (संविधान) कभी अपने ‘अंशी’ (धर्म) से बड़ा नहीं हो सकता।

प्रश्न : क्या हमें हमारे मौलिक अधिकार संविधान ने दिए हैं?

उत्तर: कदापि नहीं। हमारे अधिकार ‘नैसर्गिक’ (Inherent) हैं, जैसे—जीने का अधिकार, सोचने का अधिकार, और धर्म पालन का अधिकार। ये अधिकार हमारे जन्म के साथ ही हमारे पास हैं। संविधान का कार्य इन अधिकारों को ‘देना’ नहीं, बल्कि राज्य की शक्तियों से इन्हें ‘सुरक्षित’ रखना है।

प्रश्न : “संविधान हमें अधिकार देता है” कहना मूढ़ता क्यों है?

उत्तर: क्योंकि संविधान केवल उन संस्थाओं को अधिकार दे सकता है जिनका वह स्वयं निर्माता है (जैसे संसद या चुनाव आयोग)। व्यक्ति, परिवार और समाज का निर्माता संविधान नहीं है, बल्कि व्यक्ति और समाज ने मिलकर संविधान को बनाया है। जो निर्मित है, वह अपने निर्माता को अधिकार नहीं दे सकता।

प्रश्न : यदि संविधान बदल जाए, तो क्या हमारा अस्तित्व भी बदल जाएगा?

उत्तर: नहीं। विश्व में अनेक बार संविधान बदले गए और तख्तापलट हुए, किंतु मनुष्य और समाज का अस्तित्व बना रहा। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य ‘कर्ता’ है और संविधान केवल एक ‘उपकरण’ (Tool) है। उपकरण बदलने से कर्ता का अस्तित्व समाप्त नहीं होता।

प्रश्न : क्या प्राकृतिक नियम संविधान से ऊपर हैं?

u003cstrongu003eउत्तर :u003c/strongu003e जीवन की क्रियाशीलता, पारिवारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के संदर्भ में हाँ। संविधान आपको सोने या खाने के घंटे नहीं बताता, लेकिन प्रकृति के नियम (जैसे भूख, प्यास, नींद) आपको नियंत्रित करते हैं। इन नैसर्गिक नियमों का उल्लंघन आत्मघाती है।

प्रश्न : राजनीतिज्ञ “संविधान ऊपर है” का राग क्यों अलापते हैं?

उत्तर: राजनीतिज्ञ प्रायः अपनी बौद्धिक रिक्तता और वैचारिक कमजोरी को छिपाने के लिए संविधान को एक ‘ढाल’ की तरह उपयोग करते हैं। वे शाश्वत मूल्यों और संस्कृति को दबाने के लिए संविधान की दुहाई देते हैं, जबकि वे स्वयं शास्त्रों और धर्म के मर्म से अनभिज्ञ होते हैं।

प्रश्न : जाति और वर्ण व्यवस्था के प्रति राजनीतिक दृष्टिकोण भ्रामक क्यों है?

उत्तर: वर्तमान राजनीतिज्ञ जाति-वर्ण व्यवस्था को अंग्रेजों की देन बताकर जनमानस को दिग्भ्रमित करते हैं। यदि यह व्यवस्था अंग्रेजों की होती, तो रामायण और महाभारत काल में इसका वर्णन कैसे मिलता?

प्रश्न : क्या संविधान समाज में संस्कार पैदा कर सकता है?

उत्तर: नहीं। संविधान केवल एक कानूनी नियमावली है जो अपराध होने पर दंड दे सकती है। श्रेष्ठ मनुष्य का निर्माण और चरित्र का विकास केवल धर्म, परिवार और नैसर्गिक मूल्यों (संस्कारों) के माध्यम से ही संभव है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

“यह आलेख किसी व्यक्ति विशेष, राजनीतिक दल, या संवैधानिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसका मूल ध्येय ‘वैचारिक मतिभ्रमता’ (Intellectual Confusion) का निवारण करना और उन दार्शनिक त्रुटियों को उजागर करना है जो ‘संविधान’ और ‘धर्म’ के पारस्परिक संबंधों को लेकर समाज में फैलाई जा रही हैं। यहाँ प्रयुक्त ‘मूढ़’ या अन्य कड़े शब्द किसी व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि उस ‘दृष्टिकोण’ और ‘विवेकहीनता’ के लिए हैं जो नैसर्गिक सत्यों की अनदेखी करते हैं। आलेख में दिए गए शास्त्रीय संदर्भ और तर्क पाठकों को स्वतंत्र चिंतन और मनन के लिए प्रेरित करने हेतु हैं।”

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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