एपस्टीन फाइल : आधुनिक असुरों का रक्त-रंजित षड्यंत्र और वैश्विक मानवतावाद का ढोंग

एपस्टीन फाइल : आधुनिक असुरों का रक्त-रंजित षड्यंत्र और वैश्विक मानवतावाद का ढोंग एपस्टीन फाइल : आधुनिक असुरों का रक्त-रंजित षड्यंत्र और वैश्विक मानवतावाद का ढोंग

“कलयुग के दानव अट्टालिकाओं में बैठकर रक्त-उत्सव मनाते हैं।”

महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि जो नृशंस और पापी दृष्टि वाले होते हैं, वे स्वयं तो नरकगामी होते ही हैं, संपूर्ण समाज को भी रसातल में ले जाते हैं। वर्तमान समय में ‘जेफ्री एपस्टीन’ की जो फाइलों का भंडार खुला है, वह इस सूत्र की साक्षात व्याख्या है। यह केवल एक अपराध की फाइल नहीं है, बल्कि यह ‘आधुनिक असुर-संहिता’ है।

हमारे पुराणों में जिन राक्षसों का वर्णन है—जो यज्ञों का विध्वंस करते थे, ऋषियों का वध करते थे और बालकों का भक्षण करते थे—आज वे ही असुर सूट-बूट धारण कर, मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देते हुए ऊंचे अट्टालिकाओं में बैठकर वही कुकृत्य दुहरा ही नहीं रहे हैं अपितु उससे भी आगे बढ़ गये हैं।

Table of Contents

ब्रह्माण्ड के इस पावन आर्यावर्त खंड की संस्कृति सदैव मर्यादा और पवित्रता की पक्षधर रही है। किंतु, वर्तमान विश्व जिस भयावह ‘अंधकार’ की ओर बढ़ रहा है, उसका साक्षात प्रमाण है—जेफ्री एपस्टीन। यह केवल एक नाम नहीं, अपितु एक ऐसी ‘आसुरी-ग्रन्थि’ है जिसे खोलते ही आधुनिक सभ्यता के वे घृणित कीड़े बाहर निकल रहे हैं, जो दिन के उजाले में ‘लोकतंत्र’, ‘समानता’ और ‘मानवता’ की दुहाई देते हैं, किंतु रात्रि के सन्नाटे में वे उन अबोध बालक-बालिकाओं का भक्षण करते हैं जिन्हें जीवन का अर्थ भी ज्ञात नहीं।

पुराणों में वर्णित ‘हिरण्यकशिपु’ और ‘कंस’ की वृत्तियाँ आज के इन सफेदपोश राक्षसों में पुनः जीवित हो उठी हैं। इन ‘आधुनिक असुरों’ ने अपने ऐश्वर्य और सत्ता के बल पर एक ऐसा समानांतर जगत निर्मित किया है, जहाँ नैतिकता का कोई स्थान नहीं है। एपस्टीन केवल एक अपराधी नहीं था, बल्कि वह दुनिया को चलाने वाले ‘ग्लोबल एलीट’ (Global Elite) के लिए एक ‘सप्लायर’ और ‘ब्लैकमेलर’ के रूप में कार्य कर रहा था।

फाइल खुला और राक्षस निकला: सत्ताधीशों का नग्न-नृत्य

जब एपस्टीन की फाइलों का प्रकाशन हुआ, तो विश्व के वे नाम सामने आए जिन्हें मानवता का रक्षक, पर्यावरण का हितैषी और विज्ञान का पुरोधा कहा जाता था। पूर्व राष्ट्रपति, राजकुमार, महान वैज्ञानिक और अरबपति—इन सबके नाम उस ‘लिटिल सेंट जेम्स’ द्वीप से जुड़े पाए गए, जिसे स्थानीय लोग ‘पाप का द्वीप’ (Sin Island) कहते थे।

इन फाइलों में आए नामों की सूची इस सत्य को पुष्ट करती है कि जिन्हें हम ‘सभ्य’ मानकर पूजते थे, वे वस्तुतः ‘नर-पिशाच’ थे। इन लोगों ने अपनी काम-वासना की तृप्ति के लिए उन अबोध बालिकाओं का उपयोग किया जिन्हें जीवन का अर्थ भी ज्ञात नहीं था। यह राक्षसी कुकर्म नहीं तो और क्या है? जेफ्री एपस्टीन की फाइलों का सार्वजनिक होना आधुनिक इतिहास की वह घटना है जिसे ‘असुर-कांड’ कहा जाना चाहिए। इन फाइलों में वे नाम अंकित हैं जो विश्व के भाग्यविधाता माने जाते थे।

  • राजनीतिक राक्षस: पूर्व राष्ट्रपति, वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष और विभिन्न देशों के नीति-निर्धारक। ये वे लोग हैं जिन्होंने कानून बनाए, किंतु स्वयं को कानून से ऊपर मानकर मासूमों के साथ नृशंसता की।
  • वैज्ञानिक एवं बौद्धिक असुर: महान वैज्ञानिक और विचारक, जो प्रयोगशालाओं में ‘मानवता के कल्याण’ की बात करते थे, किंतु एपस्टीन के ‘लिटिल सेंट जेम्स’ द्वीप पर वे अपनी कुत्सित वासनाओं के दास बने हुए थे।
  • राजसी एवं धनाढ्य पिशाच: राजकुमार और अरबपति, जिनके पास धन की कोई सीमा नहीं थी, किंतु उनकी आत्मा इतनी दरिद्र थी कि उन्हें अबोध बालक-बालिकाओं के क्रंदन में आनंद आता था।
फाइल खुला और राक्षस निकला: सत्ताधीशों का नग्न-नृत्य
फाइल खुला और राक्षस निकला: सत्ताधीशों का नग्न-नृत्य

यह बुराई किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक ‘वैश्विक राक्षसी सिंडिकेट’ (Global Demonic Syndicate) था और फाइल से निकला। किन्तु यहां ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है कि था, समाप्त हो गया अपितु ऐसे ही चल रहा है यह भी स्पष्ट होता है भले ही वो फाइल फिर 25-50 वर्षों के बाद खुले। “डीप स्टेट” भी कहीं न कहीं इससे संबंधित होना चाहिये अथवा ऐसा भी हो सकता है कि ये उसी का अस्त्र हो।

“एड्रेनोक्रोम की बूंदें मानवता के माथे पर कलंक का टीका हैं।”

पिज्जागेट और कोडवर्ड्स का भयावह रहस्य

इस घृणित व्यापार में जिस भाषा का प्रयोग किया गया, वह मानव समाज के लिए कलंक है। ‘पिज्जा’, ‘पास्ता’, ‘चीज’ जैसे सामान्य शब्दों को इन राक्षसों ने मासूम बच्चों के लिए कोडवर्ड बनाया। ‘पिज्जागेट’ (Pizzagate) प्रकरण ने यह सिद्ध कर दिया कि ये कुकृत्य किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं थे, बल्कि एक संगठित ‘पीडोफाइल रिंग’ (Pedophile Ring) संपूर्ण विश्व में कार्यरत है। ‘Cheese Pizza’ (CP), ‘Pasta’, ‘Sauce’, ‘Hotdog’ – इन कोडवर्ड्स के माध्यम से ये राक्षस एक-दूसरे से संवाद करते थे और उन होटलों, द्वीपों और गुप्त ठिकानों (Safe Houses) पर बच्चों की ‘आपूर्ति’ सुनिश्चित करते थे।

अधोद्वारं तमसः स्वर्गस्य तु विवृतं द्वारम्। तस्मादधो न गन्तव्यं स्वर्गस्यैव विवृतं द्वारम्॥

शास्त्र कहते हैं कि जो तामसिक प्रवृत्तियों के दास होते हैं, वे अधोगति को प्राप्त होते हैं। इन नर-पिशाचों ने बच्चों का अपहरण किया, उन्हें नशीले पदार्थ दिए, उनका शारीरिक शोषण किया और कतिपय साक्ष्यों के अनुसार, उनके साथ वे अनुष्ठान किए जिन्हें सुनकर आत्मा कांप जाए। ‘एड्रेनोक्रोम’ (Adrenochrome) जैसी डरावनी अवधारणाएं, जिसमें भयभीत बालक के रक्त से यौवन प्राप्त करने की बात कही जाती है, प्राचीन असुरों के ‘रक्त-पान’ की ही आधुनिक आवृत्ति है।

पिज्जागेट और कोडवर्ड्स का भयावह रहस्य
पिज्जागेट और कोडवर्ड्स का भयावह रहस्य

एड्रेनोक्रोम: आधुनिक रक्त-पान और आसुरी अनुष्ठान

पुराणों में असुरों द्वारा ऋषियों और बालकों के रक्त-पान का वर्णन मिलता है। आधुनिक विज्ञान और षड्यंत्रकारी सिद्धांतों (Conspiracy Theories) के संयोग से एक अत्यंत भयावह तथ्य सामने आया है—‘एड्रेनोक्रोम’ (Adrenochrome)।

कहा जाता है कि ये राक्षस उन बच्चों को पहले अत्यधिक भयभीत करते थे, जिससे उनके शरीर में ‘एड्रेनालिन’ (Adrenaline) का स्तर बढ़ जाए। फिर उस भयभीत अवस्था में उन बच्चों का रक्त निकाला जाता था। इन राक्षसों का विश्वास था कि इस ‘भय-रंजित रक्त’ का सेवन करने से उन्हें शाश्वत यौवन (Eternal Youth) और असीम ऊर्जा प्राप्त होगी।

यो हि हिंसति भूतानि आत्मनः सुखमिच्छति। स नैव लभते सुखं प्रेत्य चेह च मानवः॥ (मनुस्मृति ५.४५)

जो अपने सुख के लिए अन्य प्राणियों की हिंसा करता है, उसे न इहलोक में सुख मिलता है न परलोक में। ये आधुनिक असुर इसी ‘रक्त-पिपासा’ के वशीभूत होकर बालकों की हत्या करते थे। यह राक्षसी कृत्य किसी भी सभ्य समाज के लिए कल्पना से परे है, किंतु इन फाइलों ने सिद्ध कर दिया कि ‘शैतानी अनुष्ठान’ (Satanic Rituals) आज भी सत्ता के शीर्ष पर हो रहे हैं।

बड़ी बात तो ये है कि एक सामान्य सनातनी के लिये ऐसे कुकर्मों के बारे में सोचना भी पाप है ये असुर लोग उसको भी अनुष्ठान कहते हैं और हमें मानवता, स्वतंत्रता, समानता, सद्भाव, नारी उत्थान आदि का पाठ पढ़ाते हैं। विभिन्न माध्यमों से कल्याणकारी योजनायें चलाकर जनसामान्य तक पहुंच बनाते हैं और जो भा जाये उसे चुरा लेते हैं। भारत में भी बच्चों, लड़कियों के लापता होने की बहुत सारी घटनायें घटित हो चुकी हैं जिनका आगे कोई अता-पता ही नहीं है। सोचिये ये राक्षस हमें मानवता का ज्ञान देते हैं, क्या यह विश्वसनीय है ?

मानवाधिकारवादियों का मौन: एक सुनियोजित षड्यंत्र

सबसे गंभीर और चिंतन योग्य विषय यह है कि जो संगठन (NGOs), जो मानवाधिकारवादी, जो ‘बाल-कल्याण’ के नाम पर करोड़ों का चंदा डकारते हैं, वे आज कहाँ हैं?

  • UNICEF और बाल-कल्याण संगठन: ये संगठन अरबों डॉलर का चंदा केवल भाषण देने के लिए लेते हैं? जब एपस्टीन की फाइल में इनके ही संरक्षकों के नाम आए, तो इनकी जिव्हा क्यों कट गई?
  • शिक्षा और समानता के ठेकेदार: वे ‘बुद्धिजीवी’ जो सवर्णों को ‘अत्याचारी’ सिद्ध करने के लिए दिन-रात एक करते हैं, वे इन श्वेत-चमड़ी वाले राक्षसों के विरुद्ध एक शब्द क्यों नहीं बोल रहे?
  • फेमिनिस्ट और एक्टिविस्ट: वे महिलावादी जो छोटी-छोटी बातों पर सड़कों पर उतर आती हैं, क्या उन्हें उन हजारों छोटी बच्चियों की चीखें सुनाई नहीं दीं जिन्हें एपस्टीन के द्वीप पर नरक में धकेला गया था?
मानवाधिकारवादियों का मौन: एक सुनियोजित षड्यंत्र
मानवाधिकारवादियों का मौन: एक सुनियोजित षड्यंत्र

यह सिद्ध होता है कि ये समस्त मानवतावादी संगठन और ‘डीप स्टेट’ (Deep State) के प्यादे परस्पर मिले हुए हैं। यह एक ऐसा ‘आसुरी चक्रव्यूह’ है जहाँ भक्षक ही रक्षक का चोगा ओढ़े बैठा है। यदि ये मुँह खोलेंगे, तो इनकी अपनी वित्तीय जड़ें कट जाएंगी। समानता और स्वतंत्रता का राग अलापने वाले ये लोग वस्तुतः इन राक्षसों के ‘वैचारिक अंगरक्षक’ हैं।

यह स्पष्ट है कि ये समस्त संगठन उसी ‘डीप स्टेट’ के प्यादे हैं। ये सब मिलकर कार्य करते हैं। ये वही ‘एनजीओ’ हैं जो भारत जैसे देशों में अराजकता फैलाते हैं, किंतु अपने पश्चिमी आकाओं के राक्षसी कुकर्मों पर मौन की चादर ओढ़ लेते हैं। इनका ‘मानवतावाद’ केवल एक व्यवसाय है, जिसका उद्देश्य वास्तविक राक्षसों को बचाना और रक्षक का चोगा ओढ़कर समाज को भ्रमित करना है।

शास्त्रीय दृष्टि: असुरों का संहार अनिवार्य है

“असुर आज जंगलों में नहीं, सात-सितारा होटलों और निजी द्वीपों पर रहते हैं।”

सनातन धर्म में असुरों के लिए केवल एक ही विधान है—‘विनाश’

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (भगवद्गीता ४.८)

भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि दुष्कर्मियों का विनाश किए बिना धर्म की स्थापना संभव नहीं है। एपस्टीन कांड में संलिप्त लोग साक्षात ‘दुष्कृत’ हैं। छोटे-छोटे बालकों का बलात्कार, उनका रक्तपान और फिर उनकी हत्या कर देना—यह वह पाप है जिसका प्रायश्चित केवल मृत्युदंड है। किन्तु, वर्तमान की ‘न्यायपालिका’ और ‘शासन-तंत्र’ ने इन्हें संरक्षण दिया हुआ है। एपस्टीन की ‘आत्महत्या’ भी एक ऐसा ही रहस्य है जिसे इन राक्षसों ने स्वयं को बचाने के लिए रचा।

शास्त्रीय दृष्टि: असुरों का संहार अनिवार्य है

दस्यवो ये च लुम्पन्ति ये च धर्मविनाशकाः। तेषां निग्रहणं राज्ञो मुख्यं धर्मं प्रचक्षते॥
(मनुस्मृति)

आधुनिक समाज का दृष्टिदोष: कैंडल कहाँ है?

“कैंडल मार्च वाली संवेदनाएं अब अरबपतियों के नाम आते ही बुझ क्यों गईं?”

किसी गाँव में यदि किसी बच्चे के साथ दुर्व्यवहार हो, तो देशभर के न्यूज़ चैनलों पर ‘प्रलय’ आ जाता है। कैंडल मार्च निकाले जाते हैं, सरकारें गिराने की धमकियाँ दी जाती हैं। किंतु यहाँ तो ‘राक्षसत्व का महासागर’ खुल गया है! विश्व के सबसे शक्तिशाली लोग बच्चों का बलात्कार और हत्या कर रहे हैं, और कहीं कोई गतिविधि नहीं?

सोचिये, जिस समाज में तनिक सी बात पर न्यायालय ‘स्वतः संज्ञान’ (Suo Motu) लेता है, वहाँ इतनी बड़ी वैश्विक नृशंसता पर सन्नाटा क्यों है? कोई जाँच की मांग क्यों नहीं कर रहा? कोई अपराधियों को फाँसी पर लटकाने के लिए जुलूस क्यों नहीं निकाल रहा?

इसका कारण यह है कि इन राक्षसों ने शिक्षा, मीडिया और मनोरंजन जगत पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया है। वे आपके बच्चों को स्कूलों में जो ‘समानता’ और ‘स्वतंत्रता’ का पाठ पढ़ा रहे हैं, उसका उद्देश्य केवल उन्हें इन राक्षसों के लिए मानसिक रूप से तैयार करना है। यह ‘राक्षसी शिक्षा’ है जो धर्म और नैतिकता को जड़ से उखाड़ना चाहती है।

  • कहाँ हैं वे कैंडल?
  • कहाँ हैं वे जाँच की मांग करने वाले ‘सिविल सोसाइटी’ के लोग?
  • कहाँ है अंतरराष्ट्रीय संगठन?

इस सन्नाटे का कारण यह है कि इन राक्षसों ने मीडिया, न्यायपालिका और राजनीतिक व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया है। वे ही तय करते हैं कि समाज को किस बात पर क्रोधित होना है और किस बात पर शांत रहना है। यह ‘वैचारिक तानाशाही’ (Ideological Tyranny) है जो असली राक्षसों को सुरक्षा प्रदान करती है।

भारतीय सन्दर्भ में संभावना

आधुनिक राजनीति में प्रयुक्त शब्द जैसे—नारी सम्मान, स्वतंत्रता, और समानता—ऊपर से अत्यंत कल्याणकारी प्रतीत होते हैं। किंतु, जब इन शब्दों का स्रोत वही पश्चिमी ‘डीप स्टेट’ (Deep State) होता है जहाँ एपस्टीन जैसे राक्षस फलते-फूलते हैं, तब यह संदेह पुष्ट होता है कि ये शब्द भारत की ‘सांस्कृतिक प्रतिरोधात्मक क्षमता’ को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त किए जा रहे हैं।

  • लिंग परिवर्तन और समलैंगिकता: इन विषयों को ‘अधिकार’ के रूप में प्रस्तुत करना वस्तुतः परिवार नामक उस मूल इकाई को तोड़ने का प्रयास है, जो सनातन धर्म की आधारशिला है। जब परिवार टूटता है, तो व्यक्ति अकेला और असहाय होता है, जिसे वैश्विक बाजार और ये ‘आसुरी गिरोह’ आसानी से नियंत्रित कर सकते हैं।
  • अंधविश्वास निर्मूलन: इसके नाम पर प्रायः केवल सनातनी परंपराओं, कर्मकांडों और वर्ण-मर्यादा पर प्रहार किया जाता है, जबकि पश्चिम में चल रहे ‘सैटनिक रिचुअल्स’ (Satanic Rituals) और ‘एड्रेनोक्रोम’ जैसे वास्तविक अंधविश्वासों और कुकर्मों पर ये गिरोह मौन रहते हैं।

‘दलित-शोषित-वंचित’ विमर्श: विभाजन के माध्यम से शासन – भारतीय राजनीति में दलित-पिछड़ा-वंचित के उत्थान का जो राग अलापा जाता है, वह अक्सर वास्तविक कल्याण के बजाय ‘जातीय संघर्ष’ (Caste Conflict) को हवा देने के लिए होता है।

  • षड्यंत्र का केंद्र: वैश्विक गिरोह जानते हैं कि यदि भारत का ‘सवर्ण’ (जिसमें शास्त्रोक्त शूद्र भी सम्मिलित हैं) और ‘वर्णव्यवस्था’ संगठित-सुदृढ़ रहे, तो भारत को वैचारिक दास बनाना असंभव है। इसलिए, ‘सवर्णों’ को अत्याचारी सिद्ध करना और शूद्रों को व्यवस्था से पृथक करना इन गिरोहों का प्राथमिक एजेंडा है।
  • एपस्टीन पंजिका का संकेत: एपस्टीन जैसे लोग उन्हीं देशों में सफल होते हैं जहाँ की सामाजिक संरचना अस्थिर हो। भारत में जातीय कलह पैदा करके ये गिरोह ऐसी ‘अराजकता’ उत्पन्न करना चाहते हैं जहाँ शासन-तंत्र कमजोर हो जाए और वे यहाँ के संसाधनों (एवं आपके अबोध बालकों) का अपनी इच्छानुसार शोषण कर सकें।

नारी उत्थान बनाम ‘लिव-इन’ और स्वच्छंदता : नारी सम्मान के नाम पर ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ और स्वच्छंद कामुकता को बढ़ावा देना वस्तुतः उस ‘दैहिक शोषण’ के बाजार को वैध बनाना है, जिसका चरम रूप एपस्टीन के द्वीप पर देखा गया।

आसुरी दृष्टि: शास्त्रों के अनुसार, नारी ‘शक्ति’ का रूप है और उसकी मर्यादा ही समाज की रक्षा करती है। जब आधुनिकता के नाम पर इस मर्यादा को भंग किया जाता है, तो नारी ‘भोग’ की वस्तु बन जाती है। एपस्टीन कांड में हजारों लड़कियों का गायब होना और उनका शोषण करना इसी ‘स्वच्छंदता’ की तार्किक परिणति है, जिसे ये वैश्विक गिरोह ‘स्वतंत्रता’ कहकर भारत में प्रचारित कर रहे हैं।

भारत में कार्यरत अनेक अंतर्राष्ट्रीय NGOs और मानवाधिकार संगठन स्वयं को ‘लोककल्याण’ का मसीहा बताते हैं। किंतु, एपस्टीन की फाइल में इनके संरक्षकों के नाम होने के बावजूद इनका मौन रहना यह सिद्ध करता है कि:

  • वित्तीय नियंत्रण: इन संगठनों का चंदा और एजेंडा वही ‘एलीट’ वर्ग तय करता है जो स्वयं इन कुकर्मों में लिप्त है।
  • रणनीतिक अराजकता: ये संगठन भारत में तब सक्रिय होते हैं जब किसी सनातनी परंपरा को रोकना हो, किंतु जब वैश्विक राक्षसों के विरुद्ध युद्ध की बात आती है, तो ये अदृश्य हो जाते हैं।
  • बाल-तस्करी और लापता बच्चे: भारत से बच्चों और लड़कियों का लापता होना और उनके अंगों के व्यापार की संभावनाओं को ये संगठन ‘डाटा’ और ‘तकनीकी’ के नाम पर दबा देते हैं।

यह स्पष्ट संभावना बनती है कि भारत में जो ‘प्रगतिशील’ विमर्श हमें दिखाई दे रहा है, वह वस्तुतः उन वैश्विक असुरों की ‘वैचारिक सेना’ है, जो हमें भीतर से खोखला कर रही है। ‘डीप स्टेट’ का लक्ष्य हमें अपनी जड़ों से काटकर एक ऐसी भीड़ में परिवर्तित करना है जिसका कोई धर्म न हो, कोई कुल-मर्यादा न हो, ताकि वे निर्बाध रूप से अपना ‘रक्त-उत्सव’ मना सकें।

समाधान

जेफ्री एपस्टीन की फाइल ने सिद्ध कर दिया है कि मानवता का सबसे बड़ा शत्रु वह नहीं है जो सीमा पर खड़ा है, बल्कि वह है जो व्यवस्था के भीतर बैठकर ‘शिक्षित’ और ‘सभ्य’ होने का ढोंग कर रहा है। इन राक्षसों का समाधान केवल ‘कानूनी जाँच’ से नहीं होगा, क्योंकि कानून इनके हाथ का खिलौना है।

अराजकेषु राष्ट्रषु न धर्मो न च सत्यता। न च वित्तं न च सुखं न च शान्तिः कदाचन॥
(रामायण, अयोध्याकाण्ड ६७.९)

समाधान तो दिखता ही नहीं है — क्योंकि सामान्य जन कुछ कर ही नहीं सकता है वो तो इनके हाथों की कठपुतली जैसे नाचता है। उससे भी बड़ी बात तो यह है कि इसे यह भी ज्ञात नहीं कि वो पीड़ित पक्ष है। विरोध-प्रदर्शन के नाम पर भी वो अपनी कठपुतलियों को हो आगे करेंगे और लीपा-पोती कर देंगे। जो विभिन्न देशों के सत्ताधीशों को नियंत्रित करता है वह कितना शक्तिशाली होगा कल्पना से पड़े है और इसीलिये “डीप स्टेट” शब्द का प्रयोग किया जाता है। सोचिये जो व्यक्ति चुनाव में “डीप स्टेट” को समाप्त करने की बात करता है वही फाइल खुलने पर इसकी सेना के रूप में दिखता है।

जेफ्री एपस्टीन फाइल
जेफ्री एपस्टीन फाइल

निष्कर्ष

“सभ्यता की चमक के पीछे बैठा पिशाच ही मानवता का असली शत्रु है।”

जेफ्री एपस्टीन की फाइल ने सिद्ध कर दिया है कि मानवता का सबसे बड़ा शत्रु वह नहीं है जो सीमा पर खड़ा है, बल्कि वह है जो व्यवस्था के भीतर बैठकर ‘शिक्षित’ और ‘सभ्य’ होने का ढोंग कर रहा है। इन राक्षसों का समाधान केवल ‘कागजी जाँच’ से नहीं होगा, क्योंकि कानून इनके हाथ का खिलौना है। कुछ दिनों में सभी बातें भूला दी जायेंगी, हमें तो भारत में जो सवर्ण विरोध आदि दिख रहा है वो भी इसी कड़ी का हिस्सा प्रतीत होता है की हम इस आसुरी कुकर्मों को जान ही न पायें आपसी कलह में फंसे रहें।

अराजकता का उत्तरदायी
अराजकता का उत्तरदायी

यह स्पष्ट है कि हम जिस ‘मानवता’, ‘स्वतंत्रता’ और ‘समानता’ के नारों पर मुग्ध हैं, वे वस्तुतः इन राक्षसों द्वारा निर्मित वे ‘वैचारिक बेड़ियाँ’ हैं, जो हमें असली संकट को देखने से रोकती हैं। ‘डीप स्टेट’ का यह तंत्र इतना सूक्ष्म है कि वह हमें सवर्ण-अवर्ण, उत्तर-दक्षिण और अगड़ा-पिछड़ा के कृत्रिम युद्धों में उलझाकर स्वयं पर्दे के पीछे मासूमों का रक्तपान कर रहा है।

FAQ

प्रश्न : एपस्टीन फाइल में किन बड़े नामों का उल्लेख है?

उत्तर: इसमें पूर्व राष्ट्रपतियों, राजकुमारों और अरबपतियों के नाम संलिप्त हैं।

प्रश्न : एड्रेनोक्रोम का सिद्धांत क्या है?

उत्तर: यह डरावनी अवधारणा बच्चों के भय से उत्पन्न रक्त के सेवन से जुड़ी है।

प्रश्न : मानवाधिकारवादी इस पर मौन क्यों हैं?

उत्तर: क्योंकि इन अपराधों में उनके ही संरक्षक और फंड देने वाले शामिल हैं।

प्रश्न : क्या एपस्टीन द्वीप पर तंत्र-मंत्र के अनुष्ठान होते थे?

उत्तर: साक्ष्यों और प्रतीकों के अनुसार वहां राक्षसी अनुष्ठानों की संभावना व्यक्त की गई है।

प्रश्न : क्या यह कुकर्म मानवोचित है?

उत्तर: कदापि नहीं, यह केवल राक्षसी वृत्ति का परिचायक है।

प्रश्न : फाइल खुलने के बाद भी विरोध क्यों नहीं हो रहा?

उत्तर: मीडिया और तंत्र पर इन शक्तिशाली राक्षसों का पूर्ण नियंत्रण है।

प्रश्न : जेफ्री एपस्टीन कौन था?

उत्तर : वह एक अमेरिकी अरबपति था जिसने वैश्विक स्तर पर बाल-तस्करी और शोषण का तंत्र विकसित किया था।

प्रश्न : क्या अब न्याय की कोई संभावना है?

उत्तर : फाइलों का सार्वजनिक होना प्रथम चरण है, किन्तु आगे कुछ हो सकता है ऐसी कोई संभावना ही नहीं दिखाई देती। कुछ वर्षों में लोग भूल जायेंगे और फिर दूसरी फाइल भी खुलेगी क्योंकि यह खेल किसी एक व्यक्ति या फाइल तक सीमित नहीं है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

प्रस्तुत आलेख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक हुई ‘जेफ्री एपस्टीन’ अदालती फाइलों, वैश्विक खोजी पत्रकारिता और पौराणिक-शास्त्रीय सिद्धांतों के गहन विश्लेषण पर आधारित है। यहाँ प्रयुक्त ‘राक्षस’ और ‘पिशाच’ शब्द किसी अलंकारिक प्रयोग के लिए नहीं, अपितु उन जघन्य और अमानवीय कृत्यों की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए प्रयुक्त हुए हैं जो मानवता के विरुद्ध महापाप की श्रेणी में आते हैं। यह आलेख किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं करता, अपितु पाठकों को वैश्विक षड्यंत्रों और चयनात्मक मानवतावाद के प्रति जागरूक करने का एक बौद्धिक प्रयास है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *