“भगवा मात्र सत्ता की सीढ़ी थी, असली निष्ठा तो द्वेष और प्रतिशोध के प्रति थी।”
राजनीति में ‘प्रतीक’ बहुत शक्तिशाली होते हैं। दशकों तक जिस भगवा, हिंदुत्व और सनातन का जयघोष सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए किया गया, आज सत्ता के शिखर पर पहुँचते ही उन प्रतीकों को कुचला जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी का एक पुराना वक्तव्य वर्तमान में अत्यंत प्रासंगिक होकर वायरल हो रहा है, जिसमें वे पीड़ित पक्ष (कथित) की कुंठा को स्वर देते हुए कहते हैं— “यदि मौका मिल गया तो हिसाब तो चुकता करेगा न।” यह वाक्य मात्र एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक ग्रंथि का प्रकटीकरण है।
आज की सरकारी नीतियों और गतिविधियों को यदि एक सूत्र में पिरोया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदुत्व मात्र एक ‘सोपान’ (सीढ़ी) था, और वास्तविक लक्ष्य उस ‘हिसाब’ को चुकता करना है जो सवर्ण समाज और शास्त्र-मर्यादा के प्रति उनके मन में संचित है।
हिसाब तो चुकता करेगा; फिर आगे क्या ?
“हिसाब तो चुकता होगा — यह मोदी का वक्तव्य नहीं, उनकी नीति का आधार है।”
“इतिहास गवाह है कि सामने से वार करने वाले आक्रांताओं ने केवल शरीर को चोट पहुँचाई, किंतु रक्षक बनकर पीछे से वार करने वालों ने संस्कृति की आत्मा ही निकाल ली।” दशकों तक सनातनी समाज ने जिसे अपना ‘उद्धारक’ माना, आज वही सत्ता सवर्णों से ‘हिसाब चुकता’ करने की मुद्रा में खड़ी है।
भगवा जैकेट से नीली जैकेट तक का सफर मात्र एक वस्त्र परिवर्तन नहीं, बल्कि एक वैचारिक ‘नीलान्तरण’ है। जब देश के प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि उन्हें ‘बाबा साहब के संविधान ने बनाया है, शास्त्रों ने नहीं’, तो वे स्पष्ट संदेश देते हैं कि उनकी निष्ठा सनातन मर्यादा के प्रति नहीं, बल्कि उस अम्बेडकरवादी व्यवस्था के प्रति है जो शास्त्रों को नकारती है। तीर्थों को पर्यटन केंद्र बनाना, शंकराचार्यों को नोटिस भेजना और UGC 2026 के माध्यम से सवर्ण मेधा का गला घोंटना—ये सभी कड़ियाँ उस एक सूत्र से जुड़ी हैं, जिसका नाम है ‘प्रतिशोध’। यह आलेख उस कड़वे सच की पड़ताल करता है जिसे मुख्यधारा का मीडिया अंधभक्ति के कारण नहीं देख पा रहा।

“हिसाब तो चुकता करेगा; फिर आगे क्या?” — यह प्रश्न आज हर उस सनातनी के अस्तित्व से जुड़ा है जिसने ‘जय श्री राम’ के नारे पर विश्वास करके अपनी विरासत राजनीतिक दलों के गिरवी रख दी। जिस सत्ता ने ब्राह्मणों और आचार्यों को अपनी रैलियों में ‘शोभा की वस्तु’ बनाया, आज वही सत्ता उन्हें ‘फर्जी’ कहने का दुस्साहस कर रही है।
प्रधानमंत्री के मन में सवर्णों के प्रति जो द्वेष है, वह अब सरकारी गजटों और दमनकारी नीतियों (SC/ST Act & UGC Regulation 2026) के रूप में धरातल पर उतर चुका है। ममता कुलकर्णी जैसी (अकथित शब्द) का शंकराचार्यों पर अमर्यादित टिप्पणी करना और सरकार का उस पर मौन रहना यह सिद्ध करता है कि भाजपा न तो धर्म के साथ है न सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित अपितु सत्तासुख के अधीन है और धर्म क्षरण की मुख्य उत्प्रेरक बन चुकी है।
राजकीय विलासिता और आचार्यों का प्रतीकात्मक दमन
प्रधानमंत्री के व्यवहार में एक विचित्र और दंभी विरोधाभास झलकता है। लोकलुभावनवाद (Populism) के नाम पर वे नेताओं को पैर छूने से तो रोक देते हैं, किंतु शास्त्र के संरक्षकों के सम्मुख उनका व्यवहार अत्यंत अहंकारी होता है।
वृद्धदर्शी च सततम् विद्वद्भिर्ब्राह्मणै: सह। नयविद्भिर्विनीतः स्यात् नित्यं धर्मपरायण: ॥
(राजा को सदैव वृद्धों, विद्वान ब्राह्मणों और नीतिज्ञों के सान्निध्य में विनीत रहना चाहिए। यहाँ राजा का ब्राह्मणों के सम्मुख विनीत होना अनिवार्य बताया गया है, न कि ब्राह्मणों का राजा के सम्मुख नतमस्तक होना।)
पुजारियों का सुनियोजित समर्पण: गंगा आरती हो या सोमनाथ का पूजन, राजकीय कैमरों के सामने विद्वान कर्मकांडी ब्राह्मणों और पुजारियों को हाथ जोड़े मोदी के पीछे खड़ा करना एक मनोवैज्ञानिक संदेश है। अन्यत्र जब ब्राह्मण भूमि पर सिर झुकाकर मोदी को साष्टांग प्रणाम करते हैं, तो वे उन्हें एक बार भी नहीं रोकते। जहाँ मोदी एक साधारण स्त्री को साष्टांग प्रणाम करके गुणगान प्राप्त करते हैं, वहीं ब्राह्मणों द्वारा भूमि पर लेटकर उन्हें प्रणाम किए जाने पर वे उसे अपनी ‘विजय’ के रूप में स्वीकार करते हैं।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध चित्रों और वीडियो के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री मोदी के ऐसे चित्र अत्यंत दुर्लभ हैं जहाँ वे किसी ब्राह्मण या कर्मकांडी पुरोहित को झुककर या भूमि पर सिर रखकर साष्टांग प्रणाम कर रहे हों। इसके विपरीत, ऐसे अनेक साक्ष्य उपलब्ध हैं जहाँ तीर्थ स्थलों (जैसे काशी विश्वनाथ, सोमनाथ या अयोध्या) के मुख्य पुजारी और विद्वान ब्राह्मण स्वयं मोदी के सम्मुख हाथ जोड़े खड़े दिखाई देते हैं या उन्हें प्रणाम करते हैं।
ये एक सुनियोजित संदेश देने की कार्यप्रणाली है, संभव है गुप्त रूप से करते हों किन्तु सार्वजनिक रूप से तो विपरीत ही दिखता रहा है। स्मरण कीजिये पद्मश्री पुरस्कार लेते स्वामी शिवानंद को, पंडित गणेश्वर शास्त्री को आप इस तथ्य से सहमत हो जायेंगे।
यह साक्षात ‘अहंकार’ की वह पराकाष्ठा है जहाँ ‘राजसत्ता’ स्वयं को ‘धर्मसत्ता’ से ऊपर स्थापित देख रही है। उन्हें इस सामान्य तथ्य का ज्ञान नहीं है ऐसी बात नहीं अपितु सुनियोजित रूप से ही ऐसा कराकर विशेष पक्ष को अनुकूल सन्देश तो देते हैं किन्तु राष्ट्रवादियों की आंखों में धूल झोंक देते हैं क्योंकि वह तो समझ ही नहीं पाता कि धर्म का सिद्धांत क्या है, ब्राह्मण और शासक में कौन प्रणम्य है ?

उद्धत: पुरुषो लोके न क्वचित् सुखमश्नुते। अभिमानो हि धर्मस्य सर्वनाशस्य कारणम् ॥
(अहंकारी पुरुष लोक में कहीं सुख नहीं पाता, क्योंकि अभिमान ही धर्म के सर्वनाश का मूल कारण है।)
शंकराचार्य का अपमान: जहाँ एक ओर मोदी एक साधारण स्त्री के चरणों में गिरकर गुणगान प्राप्त करते हैं, वहीं दूसरी ओर सनातन धर्म के सर्वोच्च पद ‘शंकराचार्य’ को प्रशासन के माध्यम से नोटिस भिजवाते हैं। हाल ही में प्रयागराज माघ मेले (जनवरी २०२६) के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी को संगम स्नान से रोकना और उन्हें ‘शंकराचार्य’ उपाधि प्रयोग न करने का प्रशासनिक नोटिस देना सिद्ध करता है कि भाजपा और संघ वास्तव में घनघोर सनातन द्रोही हैं।
वर्तमान विवादों में रामभद्राचार्य की भूमिका अत्यंत संदेहास्पद और अहंकारवश अनधिकृत रही है। रामभद्राचार्य स्वयं को जगद्गुरु घोषित करते हैं, जबकि आदि शंकराचार्य की स्थापित परंपरा के सम्मुख उन्हें शंकराचार्यों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।
अनाधिकार चेष्टा: शंकराचार्यों से ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उन्हें ज्ञान दिया नहीं जाता। विडंबना यह है कि राजनीति के संरक्षण में ममता कुलकर्णी जैसी (अकथित शब्द) भी जो कभी टॉपलेस भी हुआ करती थी और न जाने किन-किन कुकर्मों में संलिप्त रही अब आचार्यों पर अभद्र टिप्पणियां करने लगी हैं। यह समाज के नैतिक पतन और सरकार की मौन सहमति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। क्या ऐसी महिला जिसका धर्म से कभी कोई संबंध ही नहीं रहा वर्त्तमान में भगवा पहन ले तो वो शंकराचार्यों को ज्ञान देगी ? ऐसी धूर्त्ताओं को जिसके कुकर्म समाचार माध्यमों से भी सार्वजानिक होते रहे हैं ये अधिकार किसने दिया कि भगवा धारण करके वो शंकराचार्यों को महामूर्ख कहे, पापी कहे, ज्ञान दे ?

यत्र विद्वज्जन: पीड्यते राजाज्ञावशतो द्विज:। तत्कुलं विनाशं याति राज्यं लक्ष्मी: प्रणश्यति ॥
(जहाँ राजा की आज्ञा से विद्वानों और द्विजों को पीड़ित किया जाता है, वह राज्य, कुल और लक्ष्मी नष्ट हो जाते हैं।)
“शंकराचार्यों से ज्ञान लिया जाता है, उन्हें ज्ञान नहीं दिया जाता।”
संविधान की ओट में शास्त्र-द्रोह और आर्यसमाजी षड्यंत्र
मोदी का यह बहुचर्चित वक्तव्य— “मुझे बाबा साहब के इस संविधान ने ही प्रधानमंत्री बनाया है”, सनातनी मूल्यों पर किया गया एक वैचारिक प्रहार है।
शास्त्रों की अप्रासंगिकता: इस वक्तव्य का अंतर्निहित अर्थ यह है कि “चूंकि मनुस्मृति या शास्त्रों ने मुझे यह पद नहीं दिया, इसलिए मैं उनके प्रति उत्तरदायी नहीं हूँ।” यह शास्त्रों को ‘संविधान विरोधी’ सिद्ध करने की एक सोची-समझी चाल है।
आर्य समाज का मुखौटा: मोदी द्वारा आर्यसमाजी दयानन्द सरस्वती का अत्यधिक महिमामंडन करना इसी कड़ी का हिस्सा है। आर्य समाज वेदों की दुहाई तो देता है, किंतु वास्तव में वह मूल सनातन संस्कृति, विग्रह पूजन और स्मार्त परंपरा का कट्टर विरोधी है। आर्य समाज एक पृथक संगठन की भांति है जिसे ग्रामीण और मूल सनातनी जनमानस कभी स्वीकार नहीं करता। मोदी द्वारा इस विचारधारा को सरकारी प्रश्रय देना ‘विग्रह-भंजन’ और शास्त्रों के निरादर की पृष्ठभूमि तैयार करना है।

पयर्टन केंद्र: काशी और अयोध्या को ‘पर्यटन केंद्र’ बना देना शास्त्रों के विरुद्ध है। विकास के नाम पर प्राचीन मंदिरों का ध्वंस और मलबे में खंडित शिवलिंगों का मिलना यह सिद्ध करता है कि यह सरकार ‘विग्रह-द्रोह’ कर रही है। तीर्थ ‘तप’ की भूमि है, ‘पिकनिक’ की नहीं।
भगवा का नीलान्तरण और सवर्ण द्वेष का वैधानिक स्वरूप
अब भगवा की आवश्यकता समाप्त हो चुकी है, इसलिए प्रतीकों का रंग बदल रहा है। जहाँ देखो वहाँ ‘नीले जैकेट’, ‘जय भीम’ के नारे और अम्बेडकरवादी विचारधारा का बोलबाला है।
- UGC रेगुलेशन २०२६: यूजीसी के नए नियम सवर्णों से ‘हिसाब चुकता’ करने की एक नवीन वैधानिक घोषणा है। मेधावी सवर्ण छात्रों के अवसरों को सीमित करना और सवर्णों के प्रति द्वेष पालना अब सरकारी एजेंडा बन चुका है।
- SC/ST एक्ट और अनिल मिश्रा प्रकरण: सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्दोष सवर्णों को सुरक्षा देने के प्रयास को मोदी सरकार ने अध्यादेश लाकर कुचल दिया। मध्यप्रदेश में अनिल मिश्रा जैसे प्रकरणों में सवर्णों के विरुद्ध कानून का दुरुपयोग और अम्बेडकरवादियों को प्रश्रय देना भाजपा की नई नीति बन गई है। स्थिति यहाँ तक गिर गई है कि मायावती जैसी नेता भी अब भाजपा से अधिक सवर्णों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं।
निष्कर्ष: फिर आगे क्या?
“विनाशकाले विपरीत बुद्धि:” – जब विनाश निकट होता है, तब बुद्धि शास्त्रों और आचार्यों के विरुद्ध हो जाती है।
“हिसाब तो चुकता करेगा; फिर आगे क्या?” यह प्रश्न प्रत्येक सनातनी के अस्तित्व से जुड़ा है। मोदी के मन का द्वेष अब सरकारी नीति बन चुका है। सामने से प्रहार करने वाले आक्रांताओं का प्रतिकार संभव था, किंतु ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करके पीठ में छुरा घोंपने वाली यह ‘नीली सत्ता’ अत्यंत घातक है।
भगवा अब नीलान्तरित हो चुका है और प्रतिशोध की यह ज्वाला शास्त्रों की जड़ें जला रही है। शंकराचार्य को फर्जी कहना और सवर्णों को मेधा से वंचित करना इसी कड़ी के अंतिम चरण हैं। यदि सनातनी समाज अब भी इस ‘नीले सियार’ के छल को नहीं समझ सका, तो इतिहास उसे कभी क्षमा नहीं करेगा।

“सावधान: नीले सियार का भेद खुल गया है।”
FAQ
प्रश्न : मोदी का “हिसाब चुकता करेगा” वाला वक्तव्य क्या सिद्ध करता है?
उत्तर : यह सवर्णों और शास्त्र-व्यवस्था के प्रति उनके मन में संचित गहरे प्रतिशोध और कुंठा को सिद्ध करता है।
प्रश्न : भगवा का नीलान्तरण क्या है?
उत्तर : भगवा प्रतीकों को त्यागकर अम्बेडकरवादी नीले प्रतीकों और नारों को अपनाना, जो सनातन विरोधी मानसिकता का परिचायक है।
प्रश्न : रामभद्राचार्य की आलोचना क्यों की जा रही है?
उत्तर : चूंकि वे अहंकारवश शंकराचार्यों जैसे सर्वोच्च पदों पर अनधिकृत टिप्पणियां करते हैं, जो शास्त्रीय मर्यादा के विरुद्ध है।
प्रश्न : तीर्थों को पयर्टन केंद्र बनाना क्यों गलत है?
उत्तर : शास्त्रों के अनुसार तीर्थों की अपनी पवित्रता और ऊर्जा होती है, पयर्टन उसे मात्र मनोरंजन और अशुद्धि का स्थान बना देता है।
प्रश्न : क्या भाजपा अब सनातन द्रोही बन चुकी है?
उत्तर : आचार्यों का अपमान, SC/ST एक्ट का दुरुपयोग और शास्त्रों को ‘प्रक्षिप्त’ मानना इसी ओर संकेत करता है।
प्रश्न : क्या मोदी सरकार सवर्ण विरोधी है?
उत्तर : UGC २०२६ और SC/ST एक्ट में संशोधन इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
प्रश्न: शंकराचार्य का अपमान क्यों?
उत्तर: ताकि शास्त्र सत्ता को चुनौती न दे सकें।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वक्तव्यों, सरकारी निर्णयों और समकालीन घटनाओं के शास्त्रीय एवं राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की मानहानि करना नहीं, अपितु ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर हो रहे वैचारिक छल के प्रति समाज को सचेत करना है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









