शंकराचार्य पर टिप्पणी करने से पूर्व चुल्लू भर पानी तो ढूंढ लो 'राष्ट्रवादियों'
“आचार्य धर्म का विधान देते हैं, सरकारें केवल उसका पालन करने हेतु बाध्य हैं।”
सांस्कृतिक संकट और अज्ञानता: वर्तमान समय में सोशल मीडिया के कोलाहल ने व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो दी, किंतु विवेक छीन लिया। विशेषकर प्रयागराज माघ मेले के संदर्भ में स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द जी और सरकार के मध्य के वैचारिक मतभेद पर जिस प्रकार की अभद्र टिप्पणियां की जा रही हैं, वे आत्मघाती हैं। धर्म के ध्वजवाहकों, विशेषकर ‘शंकराचार्य’ जैसे शीर्षस्थ पदों पर आसीन विभूतियों की आलोचना करने वाले ‘स्वघोषित राष्ट्रवादी’ यह भूल जाते हैं कि वे किस सत्ता को चुनौती दे रहे हैं।
मोदी और योगी की अंधभक्ति के कारण राष्ट्रवादियों की भी चर्चा में जब शंकराचार्य के प्रति अभद्र शब्द सुनने को मिलते हैं तो मैं यह सोचने को विवश हो जाता हूँ कि “क्या यही लोग हिन्दूराष्ट्र का निर्माण करेंगे ?” क्योंकि यही लोग तो रात-दिन हिन्दू-हिंदुत्व-राष्ट्रवाद-संस्कृति का राग अलापते रहते हैं।
शंकराचार्य पर टिप्पणी करने से पूर्व चुल्लू भर पानी तो ढूंढ लो ‘राष्ट्रवादियों’
प्रयागराज की पावन धरा पर माघ स्नान के पावन अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी और सरकार के मध्य जो वैचारिक संघर्ष दिखाई दे रहा है, वह वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करता है। स्वयं को ‘राष्ट्रवादी’ कहने वाला एक बड़ा वर्ग, जो भाजपा और संघ की निष्ठा में इतना अंधा हो चुका है कि उसे ‘धर्म के राष्ट्रपति’ कहे जाने वाले जगद्गुरु शंकराचार्य और एक सामान्य संत के मध्य का अंतर ही विस्मृत हो गया है।
समाज में व्याप्त भ्रम का मुख्य कारण ‘संत’ और ‘आचार्य’ के मध्य के मौलिक अंतर का ज्ञान न होना है। राजनीति की अंधभक्ति में लोग शास्त्र की मर्यादा को लांघ रहे हैं। राष्ट्रवाद का अर्थ अपनी संस्कृति के स्तंभों को ढहा देना नहीं है। संघ या दल के प्रति निष्ठा शास्त्र और आचार्य की अवमानना का लाइसेंस नहीं देती। जो व्यक्ति ‘संत’ और ‘आचार्य’ का भेद नहीं समझता, उसे धर्म के शीर्षस्थ पदों पर टिप्पणी करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
आचार्य और संत का भेद
हमें समझना होगा कि शंकराचार्य संत नहीं, अपितु ‘धर्म के राष्ट्रपति’ हैं। उनकी शब्दावली को आधार बनाकर उन पर प्रहार करना अज्ञानता की पराकाष्ठा है। प्रयागराज की पावन त्रिवेणी पर माघ स्नान के समय जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी के साथ सरकार का जो व्यवहार रहा, वह केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, अपितु सनातन धर्म की आत्मा पर प्रहार है।
भारतीय वांग्मय में ‘शब्द’ को ब्रह्म माना गया है और उन शब्दों की मर्यादा को अक्षुण्ण रखने का दायित्व ‘आचार्य’ पर होता है। वर्तमान में प्रयागराज की पावन धरा पर माघ स्नान के समय जो दृश्य उपस्थित हुआ है, जहाँ स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी और सरकार के बीच वैचारिक द्वंद्व है, वह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं है।
विडंबना यह है कि राष्ट्रवादी यूट्यूबर और टीवी डिबेटों में बैठकर वे लोग शंकराचार्य की पात्रता पर प्रश्न उठा रहे हैं जिन्हें ‘अ’ से ‘आचार्य’ और ‘स’ से ‘शास्त्र’ का बोध तक नहीं है। यह वर्ग अंधभक्ति में इतना लीन है कि उसे अपने अनधिकार का भी ज्ञान नहीं रहा। यदि दशकों से सरकारों ने शंकराचार्य की सत्ता और उनके विशेषाधिकारों को स्वीकार किया है, तो आज एकाएक उन पर प्रश्नचिह्न लगाना सरकार की धर्म-विरोधी मानसिकता को ही पुष्ट करता है।
सत्ता और शास्त्र का असंतुलन
यह विवाद है—‘सत्ता’ और ‘शास्त्र’ के मध्य का। दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाला एक बड़ा वर्ग, जो शास्त्र की वर्णमाला से भी अनभिज्ञ है, वह जगद्गुरु शंकराचार्य जैसे शीर्षस्थ पदों पर आसीन महापुरुषों के विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणियां कर रहा है। यह अज्ञानता केवल व्यक्ति विशेष का अपमान नहीं, अपितु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चतुष्पीठों की गरिमा पर आघात है।
राष्ट्रवाद का अर्थ केवल राजनीतिक दल का समर्थन नहीं होता, अपितु उन सांस्कृतिक स्तंभों की रक्षा करना होता है जिन पर यह राष्ट्र टिका है। जब एक राष्ट्रवादी किसी शंकराचार्य की शब्दावली या उनके कठोर वचनों को आधार बनाकर उन पर प्रहार करता है, तो वह अपनी अज्ञानता का ही प्रदर्शन करता है। यह वर्ग शंकराचार्य में ‘संत’ को ढूंढ रहा है, जबकि शंकराचार्य ‘आचार्य’ हैं। संत और आचार्य के इस भेद को समझे बिना की गई कोई भी टीका-टिप्पणी न केवल निंदनीय है, बल्कि शास्त्रोक्त मर्यादा का हनन भी है।
आचार्य की शास्त्रीय परिभाषा
“जो आचार्य का सम्मान नहीं कर सकता, वह सनातनी होने का पाखंड न करे।”
आचार्य शब्द की व्युत्पत्ति ही उसके कार्य को स्पष्ट करती है:
आचिनोति च शास्त्रार्थान् आचारे स्थापयत्यपि।स्वयमाचरते यस्मात् तस्मादाचार्य उच्यते ॥(वायु पुराण) अर्थात: जो शास्त्रों के अर्थों का चयन करता है, उन्हें समाज के आचरण में स्थापित करता है और स्वयं भी उसी के अनुसार आचरण करता है, वही ‘आचार्य’ है।
आचार्य का प्रथम गुण है ‘शास्त्रों का बोध’। आचार्य वह है जो धर्म की व्याख्या करने हेतु अधिकृत है। आचार्य का कार्य शासन और अनुशासन है। वे ‘धर्म-दण्ड’ के प्रतीक हैं। संत का कार्य कृपा और प्रार्थना है।
यस्य वाक्यं प्रमाणं स्यात् श्रुतिस्मृतिपुराणतः।स आचार्य इति प्रोक्तो धर्ममर्यादा रक्षकः ॥ जिसका वाक्य श्रुति, स्मृति और पुराणों के आधार पर प्रमाण हो, वही आचार्य है।
लालने बहवो दोषास्ताडने बहवो गुणाः।तस्माच्छिष्यं च पुत्रं च ताडयेन्न तु लालयेत् ॥ शिष्य और पुत्र को ताड़ना (कठोरता) देनी चाहिए, क्योंकि अत्यधिक लाड़-प्यार से दोष उत्पन्न होते हैं। आचार्य जब शासन पर या समाज पर कठोर टिप्पणी करते हैं, तो वह उनका धर्म-बोध है। आदि शंकराचार्य ने कहा है:
मर्यादा स्थापिता येन स आचार्यः परो मतः। जिसने मर्यादा की स्थापना की, वही श्रेष्ठ आचार्य है।
आचार्य की शास्त्रीय परिभाषा
आचार्यः कस्मात्? आचारं ग्राहयति, आचिनोति अर्थान्, आचिनोति बुद्धिमिति वा। (आचार्य वह है जो आचार ग्रहण कराए, अर्थों का संचय करे और बुद्धि का विस्तार करे।)
“आचार्य की कठोरता अनुशासन है, इसे अमर्यादित कहना अज्ञानता की पराकाष्ठा है।”
संत की परिभाषा
संत वह है जो ‘सत्’ में स्थित है। संत के लिए शास्त्र का पांडित्य अनिवार्य नहीं है। संत के लिए केवल ‘हृदय की शुद्धि’ पर्याप्त है। अतः संत से धर्मशास्त्र की व्याख्या की अपेक्षा करना और आचार्य से केवल कोमलता की अपेक्षा करना—दोनों ही मूर्खता है।
शान्ततुल्यमनाः सुहृदः साधवः साक्षिणोऽमलाः।यैस्त्यक्तं लोकपालानां पदं च स्वपदं ययुः ॥ संत वह है जिसका मन शांत है, जो सबका सुहृद है। यदि कोई निरक्षर व्यक्ति भी निरंतर भगवन्नाम जपते हुए सात्विक जीवन व्यतीत करता है, तो वह संत है। किंतु वह ‘आचार्य’ नहीं हो सकता क्योंकि उसके पास व्यवस्था देने का शास्त्रोक्त आधार नहीं है।
तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्।अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥ (सहनशील, दयालु, सबके मित्र और शांत व्यक्ति ही साधु/संत हैं।)
सन्तः स्वतः प्रकाशन्ते गुणा एव न वाग्मिता। (संत अपने गुणों से प्रकाशित होते हैं, वाग्मिता या पांडित्य से नहीं।)
संत हृदय नवनीत समाना। संत का हृदय कोमल होता है, वे शासन नहीं करते, वे केवल करुणा करते हैं।
यदि किसी संत को अपनी साधना में संदेह हो, तो वह आचार्य के पास जाता है। आचार्य ज्ञान का अंतिम स्रोत हैं।
एक आचार्य को भी जब भक्ति की आवश्यकता होती है तो वह संत की शरणागति करते हैं अर्थात सत्संगति करते हैं। आचार्य धर्म का ज्ञान देते समय सर्वोच्च हैं किन्तु सत्संगति से विमुख रहें ऐसा नहीं है अथवा संत न बने ऐसा भी तात्पर्य नहीं है। दोनों में श्रेष्ठ कौन यह तुलना ही अनुचित है। आचार्य योग्यता है और संतत्व गुण। एक आचार्य जब संत बन जाते हैं तब उनकी महिमा और बढ़ जाती है किन्तु यदि वो संत न बने तो किसी अन्य संत से उनकी महिमा कम नहीं होती है।
संत हृदय नवनीत समाना।
“संत समाज के हृदय हैं, तो आचार्य समाज के मस्तिष्क; बिना मस्तिष्क के हृदय दिशाहीन है।”
संत और आचार्य का तात्विक भेद
इतिहास साक्षी है कि आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त को निर्मित किया और धनानंद का विनाश। आचार्य विध्वंसक भी हो सकता है यदि धर्म की हानि हो रही हो। संत सामान्यतः त्यागी और विरक्त होते हैं, वे व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप नहीं करते। जब संत विरोध करता है, तो वह उपवास या मौन धारण करता है। जब आचार्य विरोध करता है, तो वह ‘शास्त्रार्थ’ और ‘उद्घोष’ करता है।
समाज में यह धारणा बन गई है कि गेरुआ वस्त्र धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति संत है और हर संत आचार्य। यह पूर्णतः त्रुटिपूर्ण है। संत और आचार्य के भेदों को निम्नलिखित शास्त्रीय एवं व्यावहारिक प्रमाणों से समझा जा सकता है:
संत और आचार्य के १० प्रमाणिक अंतर
उत्पत्ति और लक्षण (व्युत्पत्ति): ‘सन्तः’ वे हैं जो सत्य में प्रतिष्ठित हैं (सत्-अस्ति), जबकि ‘आचार्य’ वे हैं जो शास्त्रों के अर्थ का चयन कर आचरण में लाते हैं और शिष्यों को सुसंस्कृत करते हैं।
शास्त्र ज्ञान की अनिवार्यता: संत निरक्षर भी हो सकते हैं (जैसे कबीर या रैदास), उनकी अनुभूति ही उनका प्रमाण है। किंतु आचार्य के लिए षड्दर्शन, उपनिषद और वेदों का प्रकाण्ड ज्ञान अनिवार्य है।
सदाचार बनाम शास्त्र ज्ञान: संत सदाचार का व्यावहारिक उदाहरण हो सकते हैं, किंतु धर्म की सूक्ष्म मीमांसा और व्यवस्था केवल आचार्य ही दे सकते हैं।
भाषा और अभिव्यक्ति: संत की भाषा मृदु और कोमल हो सकती है, परंतु आचार्य की भाषा शास्त्र सम्मत, कठोर और अनुशासनात्मक होती है। वे गुरु रूप में डांटने के भी अधिकारी हैं।
ज्ञान का स्रोत: संत स्वयं की अनुभूति से बोलते हैं, जबकि आचार्य ‘शब्द प्रमाण’ (वेदादि शास्त्र) के अधीन होकर बोलते हैं।
पदक्रम (Hierarchy): आचार्य का पद व्यवस्थापक का है। यदि किसी संत को धर्म-संकट हो, तो वह भी आचार्य की शरण में जाता है। आचार्य ज्ञान के अक्षय स्रोत हैं।
परंपरागत उत्तराधिकार: शंकराचार्य पद एक विशिष्ट परंपरा और पीठ से बंधा है, जो आदि शंकराचार्य की मेधा का प्रतिनिधित्व करता है। संत परंपरा व्यक्तिगत साधना, सदाचार, व्यवहार प्रधान होती है।
अधिकार क्षेत्र: संत समाज को प्रेरणा देते हैं, जबकि आचार्य धर्म की मर्यादा और मर्यादा-भंग पर दंड या व्यवस्था देने के अधिकारी होते हैं।
साधना और सिद्धि: संत की सिद्धि उनकी निजता है, आचार्य की सिद्धि उनके द्वारा रक्षित शास्त्र और शिष्य परंपरा है।
गुरुत्व: आचार्य साक्षात और स्वाभाविक गुरु होते हैं। उनके वचन हमारे लिए सम्मानजनक हों यह आवश्यक नहीं, उनके वचन हमारे लिए ‘आज्ञा’ होते हैं। संत पूज्य और सम्मानीय तो होते हैं किन्तु स्वाभाविक गुरु नहीं होते।
“यदि संत और आचार्य का अंतर नहीं जानते, तो धर्म के विषयों पर मौन रहना ही श्रेयस्कर है।”
सत्ता और आचार्य का संघर्ष
इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जहाँ आचार्यों ने सत्ताओं को चुनौती दी है।
वशिष्ठ और विश्वामित्र: राजा दशरथ को जब वशिष्ठ जी ने निर्देश दिए, तो वह शासन का आदेश था।
आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र: यहाँ शास्त्र की प्रधानता सिद्ध हुई।
समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी: शिवाजी जैसा प्रतापी राजा भी समर्थ गुरु (आचार्य) के चरणों में बैठता था, क्योंकि वे जानते थे कि राष्ट्र ‘अस्त्र’ से नहीं, ‘शास्त्र’ की प्रेरणा से चलता है।
राष्ट्रवादियों की अज्ञानता और अंधभक्ति
“ज्ञान का स्रोत आचार्य हैं, टीवी डिबेटों के स्वघोषित विश्लेषक/जगद्गुरु/धर्मगुरु/संत नहीं।”
आज के ‘डिजिटल राष्ट्रवादी’ हिंदू धर्म के मूल ढांचे को नष्ट कर रहे हैं। वे भाजपा या संघ के प्रति अपनी निष्ठा को धर्म से ऊपर मान बैठे हैं।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।(गीता) अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशयात्मा का विनाश निश्चित है। यदि आप अपने ही धर्मगुरुओं का अपमान करेंगे, तो आप किस ‘हिंदू राष्ट्र’ की कल्पना कर रहे हैं? हिंदू राष्ट्र का अर्थ केवल राजनीतिक प्रभुत्व नहीं, अपितु ‘आचार्य प्रधान व्यवस्था’ है।
रामभद्राचार्य जी जैसे महानुभावों का सम्मान है, किंतु जब वे आदि शंकराचार्य की स्थापित परंपरा के विरुद्ध टिप्पणी करते हैं, तो वह ‘शास्त्र-विरुद्ध’ हो जाता है। संत और आचार्य का भेद न जानना ही इस आग में घी डालने जैसा है। यदि हम स्वघोषित शब्द पर जायें तो रामभद्राचार्य जैसे व्यक्ति ही स्वघोषित जगद्गुरु हैं और शंकराचार्य के ऊपर टीका-टिप्पणि करने का अधिकार नहीं रखते हैं।
शास्त्रों के व्याख्या जो उन्होंने किया है वो भ्रामक है और इस कारण उनका आचार्य होना भी संदिग्ध हो जाता है। संत की मर्यादा का उल्लंघन तो वहीं पर कर जाते हैं जब शंकराचार्य पर अनधिकृत रूप से टीका-टिप्पणि करने लगते हैं। देश का एक बड़ा वर्ग, जो टीवी डिबेटों में बैठकर या यूट्यूब पर बैठकर शंकराचार्यों पर टूट पड़ता है, वह वास्तव में ‘अनाधिकार चेष्टा’ का दोषी है।
अनधिकार का ज्ञान: शास्त्रार्थ का अधिकार केवल उसे है जिसने गुरु-कुल में रहकर अध्ययन किया हो। जो व्यक्ति ‘संध्या-वन्दन’ तक नहीं जानता, वह शंकराचार्य की शब्दावली को आधार बनाकर उन पर प्रहार कर रहा है—यह अज्ञानता की पराकाष्ठा है।
शब्दावली पर विवाद: राष्ट्रवादी चिल्लाते हैं कि “संत की भाषा ऐसी नहीं होती।” मूर्खों! शंकराचार्य संत हैं ही नहीं, वे आचार्य हैं। आचार्य ‘गुरु’ होता है और गुरु बालक समान शिष्यों को दंड देने और कठोर वचन कहने का अधिकारी है।
भाजपा-संघ की अंधभक्ति: राजनीतिक निष्ठा ने इस वर्ग को इतना अंधा कर दिया है कि वे अपनी ही संस्कृति के शीर्ष पुरुष को ‘राजनीतिक विरोधी’ की भांति देख रहे हैं। राष्ट्रवादी वर्ग शंकराचार्य में ‘संत’ ढूंढ रहा है। वे चाहते हैं कि शंकराचार्य सरकार की हर बात पर ‘मृदु’ होकर सहमति दें। यह संभव नहीं है, क्योंकि आचार्य ‘सत्य’ के प्रति उत्तरदायी है, ‘सत्ता’ के प्रति नहीं।
राष्ट्रवादियों को चेतावनी
यदि आप स्वयं को हिंदू और राष्ट्रवादी कहते हैं, तो यह जान लें कि आचार्यों का अपमान करके आप उस वृक्ष की जड़ें ही काट रहे हैं जिसकी छाया में आप बैठे हैं। राजनीति क्षणभंगुर है, सरकारें आएंगी और जाएंगी, किंतु शंकराचार्य की पीठ और धर्म की मर्यादा शाश्वत है।
यदि हम विश्वसनीयता की बात करें तो राष्ट्रवादियों को इतना भी नहीं ज्ञात कि नेताओं की विश्वसनीयता ऋणात्मक १००% होती है और आचार्यों की विश्वसनीयता धनात्मक १००% जो राजनीतिक प्रेरणा से बाधित तो हो सकती है किन्तु यदि शास्त्रनिष्ठा का त्याग न करें तो भी सबसे ऊपर ही रहती है।
राष्ट्रवादियों और संघियों के विषय में मेरा एक अनुभव भी है। ये लोग स्वयं को धर्मरक्षक तो सिद्ध करते हैं किन्तु इन्हें यह नहीं ज्ञात होता कि इनको मुझसे (एक ब्राह्मण से) ज्ञान लेने की आवश्यकता है अथवा देने की। ये लोग हमें ही ज्ञान देने लगते हैं जबकि शास्त्रों का रत्तीभर ज्ञान होता ही नहीं है। और करें क्यों न जब इनके शीर्षस्थ व्यक्ति भी पंडितो, पुजारियों, आचार्यों को निर्देशित करने का प्रयास करते हैं कि इन लोगों को ऐसा करना चाहिये तो छोटे-मोटे स्वयंसेवक भी क्यों न करें।
संघ ने जिस वर्ग को तैयार किया है वह भी भ्रमित है और संघ का पाठ पढ़कर धर्म के रक्षकों की ही निंदा करने लगता है क्योंकि स्वयं को धर्मरक्षक समझ लेता है। यह एक भ्रम है कि संघ धर्म का रक्षक है, धर्म का संरक्षक शास्त्रों ने ब्राह्मण को बनाया है न कि किसी संघ को और अब आप समझ सकते हैं कि स्वयंसेवक कितना भ्रमित होता है जब वह धर्म रक्षक ब्राह्मणों, आचार्यों के स्थान पर स्वयं को धर्मरक्षक समझने लगता है।
निष्कर्ष
सरकार का प्रयागराज में व्यवहार सिद्ध करता है कि वह धर्म की वास्तविक मर्यादा से विमुख हो चुकी है। राष्ट्रवादियों को समझना चाहिए कि भाजपा या संघ के प्रति निष्ठा ‘शास्त्र’ से ऊपर नहीं हो सकती। यदि आप संत और आचार्य का भेद नहीं जानते, तो आपका मौन रहना ही धर्म की रक्षा है। आचार्य गुरु हैं, और गुरु के चरणों में ही राष्ट्र की सुरक्षा और कल्याण निहित है।
राष्ट्रवादियों को सावधान होकर सम्यक चिंतन करना चाहिए। संत और आचार्य के मध्य के भेद को समझें। शंकराचार्य संत नहीं हैं, वे हमारे गुरु और शास्त्र-मर्यादा के रक्षक हैं। उनकी शब्दावली को आधार बनाकर उन पर प्रहार करना बंद करें। जिसके पास इतना भी ज्ञान नहीं है कि आचार्य की अर्हता क्या है, उसे टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। सरकार को भी अपनी धर्म-विरोधी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए, अन्यथा इतिहास साक्षी है कि जिसने भी आचार्यों का अपमान किया है, उसकी सत्ता का सूर्य अस्त होने में समय नहीं लगा।
“शास्त्रविहीन राष्ट्रवाद अंधा है और आचार्यविहीन धर्म अपंग है।”
FAQ
प्रश्न : क्या शंकराचार्य एक संत हैं?
उत्तर : नहीं, वे ‘आचार्य’ हैं। आचार्य का पद संत से ऊपर व्यवस्थागत और शास्त्रगत होता है।
प्रश्न : संत और आचार्य में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर : संत के लिए निरक्षर होना संभव है, आचार्य के लिए शास्त्रज्ञान अनिवार्य है।
प्रश्न : आचार्य की भाषा कठोर क्यों होती है?
उत्तर : क्योंकि वे गुरु हैं, और गुरु का कर्तव्य शिष्य (समाज) को अनुशासित करना है, न कि केवल प्रसन्न करना।
प्रश्न : क्या बिना शास्त्र पढ़े कोई आचार्य बन सकता है?
उत्तर : कदापि नहीं। आचार्य बनने हेतु शास्त्रों का गहन अध्ययन अनिवार्य है।
प्रश्न : क्या सभी संत आचार्य होते हैं?
उत्तर : नहीं, संत और आचार्य होना दो अलग अर्हताएं हैं। दोनों का एक साथ होना श्रेष्ठतम है।
प्रश्न : शंकराचार्य का विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर : मुख्यतः राजनीतिक अज्ञानता और शास्त्र-मर्यादा की समझ न होने के कारण।
प्रश्न : क्या शंकराचार्य को राजनीति में पड़ना चाहिए?
उत्तर : वे राजनीति में नहीं, धर्म की मर्यादा रक्षा में पड़ते हैं, जो उनका दायित्व है।
प्रश्न : संत और आचार्य में श्रेष्ठ कौन है?
उत्तर : दोनों अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं, किंतु धर्म की व्याख्या का अधिकार केवल आचार्य को है।
प्रश्न : टीवी डिबेट्स में शंकराचार्य पर चर्चा क्यों अनुचित है?
उत्तर : क्योंकि वहाँ बैठने वाले लोग शास्त्र-ज्ञान से रहित और अनधिकृत होते हैं।
प्रश्न : क्या राष्ट्रवादी होने के लिए आचार्य का अपमान आवश्यक है?
उत्तर : नहीं, सच्चा राष्ट्रवादी वही है जो अपने सांस्कृतिक मूल्यों और आचार्यों का सम्मान करे।
अस्वीकरण (Disclaimer)
“यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत और स्वतंत्र वैचारिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त किए गए विचार सनातन धर्म की शास्त्रीय परंपरा, आचार्यों की मर्यादा और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के मध्य के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करने के उद्देश्य से लिखे गए हैं। आलेख का उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, व्यक्ति या समूह की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, अपितु शास्त्रों में वर्णित ‘संत’ और ‘आचार्य’ के तात्विक भेद के प्रति जन-जागरूकता उत्पन्न करना है। पाठक विवेचना और निष्कर्ष हेतु स्वयं के विवेक और शास्त्रीय बोध का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं।”
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।