मेधा-प्रतिभा ईश्वरीय वरदान है या अभिशाप ?

मेधा-प्रतिभा ईश्वरीय वरदान है या अभिशाप ? मेधा-प्रतिभा ईश्वरीय वरदान है या अभिशाप ?

हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026: सवर्ण मेधा और कुल-मर्यादा के वैधानिक संहार की पूर्ण पटकथा

प्रस्तावना: लोकतंत्र का छद्मवेष और प्रतिभा का दमन भारतीय गणराज्य के वर्तमान कालखंड में ‘लोकतंत्र’ और ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की अवधारणाएँ अब एक क्रूर प्रहसन और विद्रूप मजाक में परिवर्तित हो चुकी हैं। सत्ता के शीर्ष पर आसीन राजनेता प्रत्यक्षतः ‘सबका साथ-सबका विकास’ का मोहक और लुभावना उद्घोष करते हैं, किंतु परोक्षतः उनके नीतिगत निर्णय एक ऐसी भयावह विभीषिका को जन्म दे रहे हैं, जो न केवल सामाजिक समरसता को विनष्ट करेगी, अपितु सनातन संस्कृति के अक्षय वट की जड़ों पर वज्रपात करेगी।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रख्यापित ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ इसी दीर्घकालिक षड्यंत्र का एक विस्फोटक सोपान है।

Table of Contents

“शिक्षा का मंदिर या सवर्णों की वधशाला? UGC का नया नियम सवर्ण कुल-वधुओं और पुत्रों के विनाश की आधिकारिक घोषणा है। ‘दो टूक’ विश्लेषण।”

यह आलेख इस अकाट्य और कड़वे सत्य को उद्घाटित करता है कि यह मात्र एक प्रशासनिक सुधार या शैक्षणिक नियम नहीं है, अपितु सामान्य वर्ग (सवर्ण) के विरुद्ध राज्य-प्रायोजित ‘वैधानिक दमन’ और ‘कानूनी युद्ध’ की घोषणा है। इसका अंतिम और वास्तविक लक्ष्य उस वर्णाश्रम धर्म का समूल उच्छेद करना है, जो सनातन धर्म का अविभाज्य मेरुदंड है।

सवर्ण समाज को अब उन सांसदों की ओर याचना भरी दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन्हें यह बोध कराना चाहिए कि उनका अस्तित्व सवर्णों के मतों पर टिका है। यदि वे सवर्णों की मेधा और मर्यादा की रक्षा नहीं कर सकते, तो उन्हें सत्ता के गलियारों से बाहर फेंकना ही एकमात्र धर्मयुद्ध है।

यह आलेख उद्घोष करता है कि अब समय ‘विनय’ का नहीं, ‘रक्षात्मक प्रतिरोध’ का है। सवर्ण समाज को अब अपने उन सांसदों का मुँह नहीं देखना चाहिए जो सत्ता की मलाई चाटने में मग्न हैं, बल्कि उन्हें बाध्य करना चाहिए कि वे इस अत्याचारी सरकार को धराशायी कर दें।

लोकतंत्र मूर्खों का शासन

“शिक्षा का मंदिर या सवर्णों की वधशाला? UGC का नया नियम सवर्ण कुल-वधुओं और पुत्रों के विनाश की आधिकारिक घोषणा है।” शास्त्रों में मेधा को ‘देवी सरस्वती’ का साक्षात् वरदान माना गया है। प्राचीन भारत में विद्वानों और मेधावियों का सम्मान राष्ट्र की उन्नति का आधार था। किंतु वर्तमान कालखंड में, मेधा सवर्ण छात्रों के लिए एक ‘अभिशाप’ बन गई है।

अथवा वो सत्य है जो लोकतंत्र की परिभाषा बताई गयी है : “लोकतंत्र मूर्खों का शासन है” अर्थात यदि लोकतंत्र मूर्खों का शासन है तो यहां मेधा और प्रतिभा का दमन होगा ही होगा। अभिशाप मेधा या प्रतिभा नहीं अभिशाप स्वयं लोकतंत्र है।

आज सवर्ण छात्र के लिए अधिक अंक लाना सफलता की गारंटी नहीं, अपितु प्रताड़ना का निमंत्रण है। उसे निरंतर यह बोध कराया जाता है कि उसकी श्रेष्ठता उसकी मेहनत नहीं, बल्कि ‘विशेषाधिकार’ है। महाभारत के ‘शान्ति पर्व’ में कहा गया है कि जिस राज्य में योग्यता का अपमान और अयोग्यता का सत्कार होता है, उस राज्य का पतन और वहां ‘अराजकता’ का उदय सुनिश्चित है। यह रेगुलेशन उसी अधर्म की नींव पर खड़ा है।

“हायर एजुकेशन रेगुलेशन 2026”: उत्पीड़न की वैधानिक समीक्षा

यूजीसी द्वारा जारी यह नवीन नियमावली शरीर में सिहरन उत्पन्न करने वाली है। इसके प्रावधानों को यदि सूक्ष्मता से देखा जाए, तो यह राज्य द्वारा भेदभाव रोकने के नाम पर सवर्णों के विरुद्ध संस्थागत भेदभाव का मार्ग प्रशस्त करता है।

हमने इतिहास की पुस्तकों में विदेशी आक्रांताओं द्वारा किए गए शारीरिक उत्पीड़न की गाथाएँ पढ़ी हैं, किन्तु आज हम अपनी आँखों से सवर्णों का ‘वैधानिक उत्पीड़न’ देख रहे हैं। यूजीसी का यह नवीन प्रावधान शरीर में सिहरन उत्पन्न करने वाला है। इसकी परिभाषाएँ इतनी कुत्सित और पक्षपातपूर्ण हैं कि वे मानवीय गरिमा के मूल सिद्धांतों का ही चीरहरण करती हैं।

अ. भेदभाव की एकपक्षीय और घातक परिभाषा इस रेगुलेशन की सबसे बड़ी विसंगति इसकी परिभाषा में ही निहित है। इसमें ‘जाति आधारित भेदभाव’ को इस प्रकार परिभाषित किया गया है: “अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर किया गया व्यवहार।”

इस परिभाषा का दूसरा भयावह पक्ष यह है कि सवर्णों (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ, वैश्य आदि) के विरुद्ध यदि कोई अभद्र व्यवहार, गाली-गलौज या सामाजिक बहिष्कार किया जाता है, तो वह ‘भेदभाव’ की श्रेणी में ही नहीं आएगा। सर्वाधिक गालियां और वो भी सार्वजनिक रूप से आज ब्राह्मणों और सवर्णों को दी जाती हैं, किन्तु संवैधानिक रूप से अब उनके साथ भेदभाव करना ‘वैधानिक’ मान लिया गया है।

राजनीतिक अवसरवाद और सनातन पर प्रहार

ब. ‘अन्तर्निहित’ (Implicit) भेदभाव: प्रताड़ना का अदृश्य ब्रह्मास्त्र प्रावधान कहता है: “भेदभाव का अर्थ ऐसा कोई व्यवहार है चाहे वह स्पष्ट हो या अन्तर्निहित (Implicit) हो।” यह शब्द ‘अन्तर्निहित’ सवर्णों के विनाश का सबसे बड़ा अस्त्र है। इसमें किसी भौतिक प्रमाण, वीडियो या ऑडियो की आवश्यकता नहीं है।

यदि किसी असवर्ण को यह ‘प्रतीत’ हुआ कि किसी सवर्ण छात्र या प्राध्यापक ने उसे ‘गलत दृष्टि’ से देखा है या उसके मौन में अपमान छिपा है, तो उसे ‘अन्तर्निहित भेदभाव’ मान लिया जाएगा। यह न्यायशास्त्र के उस मूल सिद्धांत की हत्या है जो साक्ष्य की मांग करता है। यहाँ केवल ‘अनुभूति’ ही दंड का आधार बनेगी।

स. मिथ्या अभियोगों को राज्याश्रय और दंडमुक्ति इस रेगुलेशन में ‘प्रतिशोध’ (Retaliation) रोकने की बात तो कही गई है, किन्तु वास्तविक उपयोग में यह मिथ्या आरोप लगाने की पूर्ण छूट देता है। इसमें कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि यदि कोई छात्र किसी सवर्ण पर झूठा आरोप लगाता है, तो उस पर क्या दंड होगा। दंडमुक्ति का यह आश्वासन फर्जी मुकदमों की एक ऐसी बाढ़ लाएगा, जिसमें सवर्ण युवाओं का करियर और आत्मसम्मान समूल नष्ट हो जाएगा।

द. मानवीय गरिमा का पाखंड: रेगुलेशन कहता है कि “हितधारकों पर ऐसी शर्तें लगाना जो मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हों, प्रतिबंधित है।” विडंबना देखिए, जो विधान स्वयं ही पक्षपातपूर्ण है और सवर्णों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखता है, वह ‘मानवीय गरिमा’ की बात केवल सवर्णों को फँसाने के लिए कर रहा है।

“आरक्षण सवर्णों की प्रगति में बाधा था, UGC २०२६ उनके अस्तित्व पर सीधा प्रहार है।”

आधुनिक ‘जजिया’ और वैधानिक दासता

वर्तमान शासन द्वारा सवर्णों पर थोपे जा रहे ये नियम वास्तव में मध्यकालीन ‘जजिया’ कर का आधुनिक और वैधानिक संस्करण हैं। जिस प्रकार मुगल आक्रांताओं ने सवर्णों (विशेषकर हिंदुओं के बौद्धिक वर्ग) के अस्तित्व पर कर लगाया था, आज का राज्य उनकी मेधा पर ‘आरक्षण’ और ‘UGC रेगुलेशन २०२६’ जैसा कर लगा रहा है।

  • तुलना: मुगलों ने शारीरिक बल से धर्म परिवर्तन कराना चाहा, वर्तमान सत्ता वैधानिक बल से ‘चेतना परिवर्तन’ और ‘सांस्कृतिक विस्मृति’ (Cultural Amnesia) का मार्ग चुन रही है।
  • अंग्रेजों का ‘रौलेट एक्ट’ बनाम UGC २०२६: जिस प्रकार रौलेट एक्ट में “बिना वकील, बिना दलील” के गिरफ्तारी होती थी, UGC २०२६ का ‘अन्तर्निहित भेदभाव’ खंड भी उसी निरंकुशता को पुनर्स्थापित कर रहा है।
आधुनिक 'जजिया' और वैधानिक दासता

मेधा का वैधानिक वध: “न रहेगी बाँस, न बजेगी बाँसुरी”

सवर्णों की मेधा (Merit) सदैव से आक्रांताओं और आधुनिक जातिवादी राजनीतिज्ञों की आँखों की किरकिरी रही है। यह नया विधान उसी मेधा को कुचलने का यंत्र है। यह रेगुलेशन केवल शिक्षा के लिए नहीं, बल्कि सवर्णों की सामाजिक और पारिवारिक जड़ों को खोदने के लिए लाया गया है। इसके दुष्परिणामों की कल्पना मात्र से भविष्य अंधकारमय दिखता है:

अ. शैक्षणिक बाधा और विफलता का षड्यंत्र किसी मेधावी सवर्ण छात्र की शिक्षा को बाधित करने के लिए मात्र एक शिकायत पर्याप्त होगी। ‘इक्विटी स्क्वाड’ के माध्यम से उसे जाँच के नाम पर २-३ महीने मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित किया जाएगा कि वह या तो परीक्षा में असफल हो जाए या उसके अंक गिर जाएँ। यही वास्तविक लक्ष्य है।

जब सवर्ण छात्र के पास अंक ही नहीं होंगे, तो आरक्षण के बाद बची-खुची सीटों पर भी उसका दावा समाप्त हो जाएगा। यह एक ऐसी रणनीति है जहाँ प्रतिभा को सीधे नहीं मारा जाता, बल्कि उसे इतना परेशान किया जाता है कि वह स्वयं ही समाप्त हो जाए।

ब. भूमि, भवन और बेटी पर संकट: यह कानून एक ऐसे ‘हथियार’ के रूप में काम करेगा जहाँ कोई भी असवर्ण किसी सवर्ण की भूमि या गृह को हड़पने के लिए उसे इस एक्ट में फँसाने की धमकी दे सकेगा। यहाँ तक कि सवर्ण की बेटी से विवाह करने की अनुचित और कुत्सित इच्छा रखने वाले अराजक तत्व भी इसे ‘हथियार’ की तरह प्रयोग करेंगे। यदि सवर्ण परिवार ने विरोध किया, तो पूरा परिवार ‘मानवीय गरिमा के प्रतिकूल व्यवहार’ के आरोप में जेल जाएगा।

वर्णाश्रम व्यवस्था: सनातन धर्म का शाश्वत आधार

. मानवीय गरिमा के नाम पर पाखंड रेगुलेशन में “मानवीय गरिमा के प्रतिकूल शर्तें” लगाने की बात कही गई है। विडंबना देखिए, जो विधान स्वयं ही पक्षपातपूर्ण है, सवर्णों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखता है और उनके विरुद्ध मिथ्या आरोप लगाने वालों को अभयदान देता है, वह ‘मानवीय गरिमा’ की रक्षा का स्वांग रच रहा है। वास्तव में, यह सवर्णों को मानसिक रूप से दास बनाने और उन्हें निरंतर ‘अपराधबोध’ (Guilt) में रखने की एक मनोवैज्ञानिक चाल है।

सवर्ण कुल-वधुओं और पुत्रों पर दोहरा आघात

यह षड्यंत्र केवल शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं है, इसके सामाजिक और पारिवारिक परिणाम अत्यंत घृणित हैं।

अ. सवर्ण बेटियों पर संकट इस कानून का उपयोग ‘हथियार’ की भाँति किया जाएगा। यदि किसी असवर्ण को किसी सवर्ण की बेटी से विवाह करने की अनुचित इच्छा है, तो वह इस रेगुलेशन को ढाल बनाएगा। यदि सवर्ण पिता या भाई विरोध करते हैं, तो उन पर ‘जातिगत भेदभाव’ और ‘मानवीय गरिमा के हनन’ का मुकदमा ठोक दिया जाएगा। सवर्ण समाज या तो अपनी बेटियों को इन अराजक तत्वों के हाथों ‘हड़पे’ जाने के लिए मूकदर्शक बनकर देखेगा, या फिर सुरक्षा के कारण उन्हें पढ़ाना ही बंद कर देगा। दोनों ही स्थितियों में सवर्णों का पतन सुनिश्चित है।

ब. सवर्ण पुत्रों का वैधानिक निर्वासन सवर्ण पुत्रों के लिए यह व्यवस्था ‘मरणतुल्य कष्ट’ है। चाहे वे शिक्षा प्राप्त करने जाएँ, या शिक्षा दान (अध्यापन) करें, अथवा किसी भी व्यवसाय में हों—हर स्थान पर उन्हें ब्लैकमेल किया जाएगा। किसी का घर लेना हो या भूमि हड़पनी हो, बस एक शिकायत कि “इसने मुझे जातिसूचक दृष्टि से देखा” और सवर्ण का सर्वस्व नष्ट। यह राज्य द्वारा निर्मित वह ‘चक्रव्यूह’ है जहाँ से निकलना सवर्णों के लिए असंभव बना दिया गया है।

सवर्ण कुल-वधुओं और पुत्रों पर दोहरा आघात

मनोवैज्ञानिक युद्ध: ‘सवर्ण अपराधबोध’ (Savarna Guilt) और मानसिक दासता का षड्यंत्र

आधुनिक राज्य केवल वैधानिक रूप से दमन नहीं करता, अपितु वह ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ (Psychological Warfare) के माध्यम से व्यक्ति की चेतना को ही पंगु बना देता है। सवर्ण युवाओं के विरुद्ध वर्तमान में जो सबसे घातक अस्त्र प्रयोग किया जा रहा है, वह है—‘सवर्ण अपराधबोध’ (Savarna Guilt)। यह एक ऐसी कुत्सित प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मेधावी युवाओं के मन में यह कूट-कूट कर भर दिया जाता है कि उनका अस्तित्व, उनकी मेधा और उनके पूर्वजों का गौरव वास्तव में ‘शोषक की विरासत’ है।

अ. ऐतिहासिक विरूपण और हीनता की भावना शैक्षिक पाठ्यक्रमों से लेकर मीडिया नैरेटिव तक, एक सुनियोजित ढंग से सवर्णों को ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में चित्रित किया जाता है। जब एक सवर्ण युवा उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश करता है, तो उसे ‘इक्विटी स्क्वाड’ और ‘एंबेसडर’ जैसे शब्दों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि वह जन्मजात ‘संदिग्ध’ है।

यह मनोवैज्ञानिक प्रहार उसकी अस्मिता (Identity) को खंडित कर देता है। उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि यदि वह शैक्षणिक रूप से श्रेष्ठ है, तो वह उसकी प्रतिभा नहीं बल्कि ‘सवर्ण विशेषाधिकार’ (Privilege) है। परिणामतः, वह अपनी प्रतिभा पर गर्व करने के स्थान पर लज्जित होने लगता है। यह ‘गिल्ट कॉम्प्लेक्स’ उसे मानसिक रूप से इतना निर्बल बना देता है कि वह अपने विरुद्ध होने वाले वैधानिक अत्याचारों का विरोध करने का साहस ही खो बैठता है।

मनोवैज्ञानिक युद्ध: 'सवर्ण अपराधबोध' (Savarna Guilt) और मानसिक दासता का षड्यंत्र

ब. ‘विक्टिम हुड’ बनाम ‘विलेन हुड’ का समाजशास्त्र समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो शासन ने एक ऐसा ‘बाइनरी’ निर्मित किया है जहाँ एक पक्ष सदैव ‘पीड़ित’ (Victim) है और सवर्ण सदैव ‘पीड़क’ (Oppressor)। यूजीसी के नए नियम इस विमर्श को वैधानिक शक्ति प्रदान करते हैं।

जब ‘अन्तर्निहित भेदभाव’ (Implicit Discrimination) जैसे शब्दों का प्रयोग होता है, तो वह सीधे युवा के अवचेतन पर प्रहार करता है। वह हर समय इस भय में जीता है कि उसका कौन सा शब्द या व्यवहार उसे ‘अपराधी’ सिद्ध कर देगा। यह निरंतर रहने वाला ‘सर्विलांस’ (Surveillance) उसे एक ऐसी मानसिक जेल में डाल देता है जहाँ वह स्वयं ही अपनी वाणी और विचारों पर ‘सेंसरशिप’ लगाने लगता है। यह स्थिति उसे एक ‘जोंबी’ (Zombie) में परिवर्तित कर देती है, जो शारीरिक रूप से जीवित है किन्तु उसकी स्वतंत्र चेतना और स्वाभिमान मर चुका है।

स. योग्यता का संहार और औसत दर्जे की स्वीकार्यता इस मनोवैज्ञानिक युद्ध का अंतिम लक्ष्य सवर्ण मेधा का पूर्ण आत्मसमर्पण है। जब योग्यता को जातिगत पैमानों से नीचा दिखाया जाता है, तो युवा के भीतर का ‘पुरुषार्थ’ समाप्त हो जाता है। वह यह मान लेता है कि चाहे वह कितनी भी तपस्या कर ले, राज्य की दृष्टि में वह ‘अछूत’ ही रहेगा। यह ‘लर्न्ड हेल्पलेसनेस’ (Learned Helplessness) की स्थिति है, जहाँ व्यक्ति यह मान लेता है कि वह परिस्थिति को बदल नहीं सकता।

द. सांस्कृतिक जड़ों से विच्छेद इस अपराधबोध का सबसे भयावह परिणाम यह है कि सवर्ण युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों, धर्म और वर्णाश्रम मर्यादा से विमुख होने लगता है। उसे सिखाया जाता है कि उसकी परंपराएं ‘भेदभाव’ की जननी हैं। वह स्वयं को ‘आधुनिक’ सिद्ध करने के लिए अपने ही धर्म का तिरस्कार करने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ वह वैधानिक के साथ-साथ ‘आध्यात्मिक गुलाम’ भी बन जाता है। जिस युवा को अपने पूर्वजों पर गर्व नहीं, जो अपने शास्त्रों को ‘शोषक ग्रंथ’ मानने लगे, उसे नियंत्रित करना राज्य के लिए अत्यंत सुगम हो जाता है।

हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 के संभावित १० दुरुपयोग

यूजीसी के नए ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ के प्रावधानों, विशेषकर ‘इक्विटी स्क्वाड’ और ‘अंतर्निहित भेदभाव’ (Implicit Discrimination) की जिस प्रकार की व्याख्या की गई है, उससे सामान्य वर्ग (सवर्ण) के विरुद्ध निम्नलिखित १० संभावित दुरुपयोग हो सकते हैं:

  1. ‘अंतर्निहित भेदभाव’ (Implicit Bias) के नाम पर फर्जी मामले : रेगुलेशन में ‘अंतर्निहित’ शब्द का प्रयोग सबसे बड़ा खतरा है। इसके तहत किसी सवर्ण छात्र या प्राध्यापक के केवल देखने के तरीके, उनके बैठने के ढंग या उनके मौन को भी ‘जातिगत अपमान’ मानकर उन पर केस दर्ज कराया जा सकता है। इसके लिए किसी ठोस भौतिक साक्ष्य (वीडियो/ऑडियो) की आवश्यकता नहीं होगी, केवल शिकायतकर्ता की ‘अनुभूति’ ही पर्याप्त होगी।
  2. मेधावी छात्रों की शिक्षा में जानबूझकर बाधा डालना : किसी सवर्ण छात्र के करियर को नष्ट करने के लिए परीक्षा से ठीक पहले उन पर भेदभाव का आरोप लगाया जा सकता है। जांच के नाम पर उन्हें २-३ महीने सस्पेंड रखा जा सकता है या मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित किया जा सकता है कि वे या तो परीक्षा में बैठ न सकें या उनकी एकाग्रता भंग हो जाए।
  3. ‘इक्विटी स्क्वाड’ का ‘कैंपस गेस्टापो’ (जासूस) के रूप में प्रयोग : इन स्क्वाड्स को कैंपस में मोबाइल निगरानी की शक्ति दी गई है। इनका उपयोग व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने, सवर्ण छात्रों की निजी बातों को रिकॉर्ड करने और उन्हें संदर्भ से बाहर (Out of Context) पेश करके फँसाने के लिए किया जा सकता है।
  4. सवर्ण बेटियों को ‘हड़पने’ या ब्लैकमेल करने का हथियार : यदि कोई अराजक तत्व किसी सवर्ण छात्रा के साथ अनुचित व्यवहार करना चाहता है या विवाह का दबाव बनाना चाहता है, तो वह इस रेगुलेशन को ढाल बना सकता है। विरोध करने पर वह छात्रा के पिता या भाई पर इस कानून के तहत केस दर्ज कराकर पूरे परिवार को सामाजिक और कानूनी रूप से पंगु बना सकता है।
  5. संपत्ति और भूमि विवादों में उपयोग : यद्यपि यह कानून शिक्षण संस्थानों के लिए है, किंतु इसका प्रभाव सामाजिक जीवन पर भी पड़ेगा। यदि किसी सवर्ण और असवर्ण के बीच भूमि या मकान को लेकर विवाद है, तो असवर्ण पक्ष सवर्ण के छात्र पुत्र पर कॉलेज में केस करवाकर समझौते के लिए विवश कर सकता है।
  6. सवर्ण प्राध्यापकों का वैधानिक निष्कासन : सवर्ण शिक्षकों को शोध (Research), पदोन्नति (Promotion) या प्रशासन से दूर रखने के लिए छात्रों के माध्यम से उन पर भेदभाव का आरोप लगवाया जा सकता है। एक बार जांच शुरू होने पर उनकी गरिमा और नौकरी दोनों खतरे में पड़ जाएगी।
  7. अंक प्रणाली (Grading System) में दबाव बनाना : असवर्ण छात्र कम अंक आने की स्थिति में प्राध्यापक पर ‘जातिगत पक्षपात’ का आरोप लगा सकते हैं। इससे शिक्षक भयभीत होकर मेधा के बजाय जातिगत आधार पर अंक देने के लिए विवश होंगे, जिससे शिक्षा का स्तर गिरेगा।
  8. सवर्ण संगठनों और सामाजिक मेलजोल का दमन : यदि सवर्ण छात्र आपस में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम या धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, तो उसे ‘बहिष्करण’ (Exclusion) या ‘पक्षपात’ बताकर प्रतिबंधित कराया जा सकता है। यह सवर्णों को उनकी अपनी पहचान और समूह बनाने के मौलिक अधिकार से वंचित कर देगा।
  9. झूठे आरोपों पर दंड का अभाव (Impunity for Liars) : इस रेगुलेशन में झूठे आरोप लगाने वालों के लिए किसी दंड का प्रावधान न होना ही सबसे बड़ा दुरुपयोग है। यह किसी भी व्यक्ति को बिना किसी डर के सवर्णों पर ‘कानूनी वार’ करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।
  10. ‘सवर्ण अपराधबोध’ (Guilt) के माध्यम से मानसिक दासता : निरंतर निगरानी और फर्जी केसों के भय से सवर्ण छात्र हमेशा मानसिक दबाव में रहेंगे। वे अपना स्वाभिमान खो देंगे और हर समय ‘डिफेंसिव’ मोड में रहेंगे। यह सवर्ण समाज की स्वतंत्र सोच और नेतृत्व क्षमता को वैधानिक रूप से समाप्त करने का सूक्ष्म तरीका है।

सवर्ण सांसदों का उत्तरदायित्व: पदत्याग या पराजय?

भाजपा के २४० सांसदों में १०० से अधिक सवर्ण या सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि हैं। क्या उन्हें यह दिखाई नहीं दे रहा कि उनकी अपनी सरकार उन्हीं के मतदाताओं की बलि ले रही है? अभी हाल ही में एक कद्दावर सवर्ण सांसद स्वयं भी इस तंत्र के उत्पीड़न का शिकार बने हैं। यदि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति का यह हाल है, तो सामान्य सवर्ण युवा की क्या गति होगी?

क्या हम गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं?

सांसदों के पास विकल्प:

  • पदत्याग का ब्रह्मस्त्र: यदि ये १०० सवर्ण सांसद मात्र अपने पदों से त्यागपत्र दे दें, तो यह अत्याचारी सरकार उसी क्षण धराशायी हो जाएगी। सत्ता की लोलुपता को त्यागकर यदि ये सांसद एकजुट हो जाएँ, तो न केवल रेगुलेशन 2026, अपितु SC/ST Act और आरक्षण जैसे उत्पीड़क विधानों को भी सदा के लिए समाप्त किया जा सकता है।
  • वैधानिक मार्ग से विनाश: जातीय राजनीति को मिटाने का यही अंतिम समय है। सवर्ण सांसदों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपनी कुल-रक्षा के लिए सक्रिय होना चाहिए।
  • संसदीय गतिरोध (En Masse Protest): बजट सत्र या शीतकालीन सत्र के दौरान ये सांसद सदन के भीतर ‘सवर्ण हितों’ के लिए सामूहिक रूप से वेल में आकर तब तक कार्य न चलने दें, जब तक कि इस रेगुलेशन, SC/ST Act और आरक्षण को समाप्त करने का लिखित आश्वासन न मिल जाए।
  • निजी विधेयक (Private Member Bill): ये सांसद सामूहिक रूप से ‘जातीय राजनीति समाप्ति विधेयक’ ला सकते हैं, जिससे सरकार पर नैतिक दबाव बनेगा।
  • पार्टी के भीतर ‘ब्लॉक’ बनाना: दल के भीतर एक ‘सवर्ण ब्लॉक’ बनाकर सरकार को यह स्पष्ट कर देना कि यदि हमारी मेधा और मर्यादा की रक्षा नहीं हुई, तो हम वोटिंग के समय ‘व्हिप’ का उल्लंघन कर सरकार गिरा देंगे।

मतदाताओं का आह्वान: सांसदों को उत्तरदायित्व का स्मरण कराओ

ये सांसद आपके प्रति उत्तरदायी हैं। मतदाताओं को अपने-अपने सांसदों को उनके उत्तरदायित्व का स्मरण कराना होगा। उन्हें स्पष्ट कहें कि यदि वे हमारी मेधा और मर्यादा की रक्षा नहीं कर सकते, हमारे अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकते तो उन्हें सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। मतदाता अपने सांसदों को ‘निर्वहन’ के लिए प्रेरित करें, तो शेष कार्य सांसद स्वयं कर लेंगे क्योंकि उन्हें पुनः आपके ही द्वार आना है।

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निष्कर्ष

अस्तित्व की रक्षा का धर्मयुद्ध सवर्णों का अस्तित्व आज संकट में है। हमें अब उस प्रताड़ना का अंत करना ही होगा जिसे वैधानिक जामा पहनाया जा रहा है। सवर्ण सांसदों! मुँह मत देखो, अपनी रीढ़ सीधी करो और सरकार गिराने का साहस करो। यदि आज तुम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ तुम्हें ‘कुल-घाती’ के रूप में स्मरण करेंगी। इस प्रताड़ना को रोकने का यही अंतिम अवसर है—या तो कानून बदलेगा, या सरकार गिरेगी!

धर्मो रक्षति रक्षितः
FAQ

प्रश्न : यूजीसी रेगुलेशन २०२६ सवर्णों के लिए घातक क्यों है?

आक्रांताओं से अत्याचारी सरकार - सनातन पर घनघोर प्रहार

उत्तर: क्योंकि यह भेदभाव की परिभाषा में सवर्णों को स्थान नहीं देता, जिससे उनके विरुद्ध होने वाले अपमान को वैधानिक माना जा सकता है, जबकि सवर्ण के सामान्य व्यवहार को ‘अन्तर्निहित भेदभाव’ कहकर दंडित किया जा सकता है।

प्रश्न : सवर्ण सांसदों की भूमिका क्या होनी चाहिए?

राजनीतिक अवसरवाद और सनातन पर प्रहार

उत्तर: उन्हें एकजुट होकर सरकार से समर्थन वापस लेने की चेतावनी देनी चाहिए ताकि इन काले कानूनों और आरक्षण की व्यवस्था को समूल नष्ट किया जा सके। वे सामूहिक इस्तीफा देकर सरकार गिरा सकते हैं या संसद में सवर्ण हितों के लिए सामूहिक गतिरोध उत्पन्न कर सकते हैं।

प्रश्न : क्या इस कानून में दुरुपयोग रोकने का कोई विधान है?

क्या हम गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं?

उत्तर: नहीं, इसमें मिथ्या आरोप लगाने वालों के विरुद्ध दंड का कोई प्रावधान न होना ही इसके दुरुपयोग का सबसे बड़ा प्रमाण है।

प्रश्न : ‘अन्तर्निहित भेदभाव’ का क्या अर्थ है?

वर्णाश्रम व्यवस्था: सनातन धर्म का शाश्वत आधार

उत्तर: इसका अर्थ है कि सवर्ण के किसी भी सामान्य व्यवहार या दृष्टि को बिना किसी प्रमाण के ‘जातिगत अपमान’ मानकर उसे दंडित किया जा सकता है।

प्रश्न : ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ का यहाँ क्या सन्दर्भ है?

आक्रांताओं से अत्याचारी सरकार - सनातन पर घनघोर प्रहार

उत्तर: सवर्णों का उत्पीड़न उनके धर्म-त्याग का परिणाम है। शास्त्र-सम्मत जीवन पद्धति और शास्त्रों को आत्मसात करना ही उनकी वास्तविक सुरक्षा का मार्ग है।

प्रश्न : यह सवर्ण मेधा को कैसे प्रभावित करेगा?

उत्तर: मेधावी सवर्ण छात्रों पर फर्जी केस दर्ज कर उनकी जाँच के नाम पर २-३ महीने बर्बाद किए जा सकते हैं, जिससे वे शैक्षणिक रूप से पिछड़ जाएँ या संस्थानों से बाहर हो जाएँ।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह आलेख पूर्णतः स्वतंत्र वैचारिक विश्लेषण और वर्तमान नीतिगत प्रस्तावों की समीक्षा पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुँचाना या समाज में विद्वेष फैलाना नहीं, बल्कि सवर्ण समाज के मौलिक अधिकारों और उनकी अस्तित्वगत चिंताओं को स्वर देना है। आलेख में प्रयुक्त ‘सरकार गिराने’ या ‘संघर्ष’ जैसे शब्द राजनैतिक दबाव और संवैधानिक विरोध के लोकतांत्रिक माध्यमों को दर्शाने के लिए प्रयुक्त किए गए हैं। पाठक स्वविवेक का प्रयोग करें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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