“जिस दिन मेधा का तिरष्कार किया गया, धर्म पर प्रहार किया गया, उसी दिन समाज कर राष्ट्र का पतन सुनिश्चित हो गया। महाभारत साक्षी है, जब-जब कुल-वधुओं के अपमान और धर्म के दमन की पटकथा रची गई, तब-तब इतिहास ने कुरुक्षेत्र देखा है।”
आधुनिक राज्य का छद्मवेष और प्रतिभा का दमन भारतीय गणराज्य के वर्तमान कालखंड में ‘लोकतंत्र’ और ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणाएँ अब एक क्रूर प्रहसन में परिवर्तित हो चुकी हैं।
सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग प्रत्यक्षतः तो ‘सबका साथ-सबका विकास’ का मोहक उद्घोष करते हैं, किंतु परोक्षतः उनके नीतिगत निर्णय एक ऐसी भयावह विभीषिका को जन्म दे रहे हैं, जो न केवल सामाजिक समरसता को विनष्ट करेगी, अपितु सनातन संस्कृति के अक्षय वट की जड़ों पर वज्रपात करेगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रख्यापित ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ इसी दीर्घकालिक षड्यंत्र का एक विस्फोटक सोपान है।
यह आलेख इस अकाट्य सत्य को उद्घाटित करता है कि यह मात्र एक प्रशासनिक सुधार नहीं, अपितु सामान्य वर्ग (सवर्ण) के विरुद्ध राज्य-प्रायोजित ‘वैधानिक दमन’ है, जिसका अंतिम लक्ष्य उस वर्णाश्रम धर्म का समूल उच्छेद करना है, जो सनातन धर्म का अविभाज्य मेरुदंड है।
आक्रांताओं से अत्याचारी सरकार – सनातन पर घनघोर प्रहार
प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या का नया सरकारी षड्यंत्र भारत का शैक्षिक परिदृश्य आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ योग्यता और प्रतिभा को संरक्षण देने के बजाय, उन्हें सरकारी तंत्र के माध्यम से कुचलने की तैयारी कर ली गई है।
हाल ही में यूजीसी (UGC) द्वारा जारी नए दिशा-निर्देश ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सामान्य वर्ग (General Caste) के छात्रों के विरुद्ध एक ‘कानूनी युद्ध’ की घोषणा है। यह प्रावधान देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर उसे गृहयुद्ध की विभीषिका की ओर धकेलने वाला प्रतीत होता है।
यूजीसी का काला कानून: सामान्य वर्ग पर ‘कानूनी लिंचिंग’ की तैयारी यूजीसी के इन नए नियमों के तहत अब हर उच्च शिक्षा संस्थान में ‘इक्विटी कमेटी’ और ‘इक्विटी स्क्वाड’ का गठन किया जाएगा।
ये स्क्वाड कैंपस में ‘मोबाइल जासूसों’ की तरह घूमेंगे। सबसे भयावह पहलू यह है कि इसमें ‘भेदभाव’ की परिभाषा को इतना व्यापक और अस्पष्ट रखा गया है कि किसी सामान्य वर्ग के छात्र का मात्र देखना या कुछ ऐसा कहना जिसे सामने वाला ‘जातिगत अपमान’ मान ले (Implicit Discrimination), उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुँचाने के लिए पर्याप्त होगा।
सामान्य वर्ग (सवर्ण) पर वैधानिक उत्पीड़न: एक विश्लेषण
- अपराध की अस्पष्ट परिभाषा (Ambiguity of Crime): इन प्रावधानों में ‘भेदभाव’ (Discrimination) की परिभाषा इतनी संकुचित और व्यक्तिपरक (Subjective) है कि ‘अंतर्निहित भेदभाव’ (Implicit Discrimination) के नाम पर किसी भी सवर्ण छात्र को बिना किसी ठोस प्रमाण के आरोपित किया जा सकता है। यदि किसी सवर्ण छात्र का दृष्टिपात या व्यवहार किसी अन्य वर्ग के छात्र को अप्रिय प्रतीत हो, तो वह ‘जातिगत उत्पीड़न’ की श्रेणी में मान लिया जाएगा।
- मिथ्या अभियोगों का संरक्षण: नियमों में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि कोई छात्र किसी सवर्ण छात्र पर मिथ्या आरोप (False Accusation) लगाता है, तो उस पर किसी भी प्रकार के दंड या आर्थिक दंड का प्रावधान नहीं होगा। यह व्यवस्था न्यायशास्त्र के उस मूल सिद्धांत ‘निर्दोष जब तक दोष सिद्ध न हो’ का गला घोंटती है और सवर्णों के विरुद्ध ‘कानूनी लिंचिंग’ को वैधानिक मान्यता प्रदान करती है।
- एकपक्षीय निर्णायक मंडल: इन समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है, किंतु सवर्ण पुरुषों को निर्णय प्रक्रिया से पूर्णतः बहिष्कृत रखा गया है। यह संरचना स्वतः सिद्ध करती है कि सवर्णों को पूर्वग्रह से ग्रसित होकर पहले ही ‘अपराधी’ मान लिया गया है।
राजनीतिक अवसरवाद और सनातन पर प्रहार यह अत्यंत खेदजनक है कि जो सरकार ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा देती है, वही अब ‘बहुसंख्यकवाद’ के नाम पर सनातन समाज के उस वर्ग को निशाना बना रही है जिसने उसे सत्ता की सीढ़ियों तक पहुँचाया।
उत्तर प्रदेश के कुतर्कों से लेकर कर्नाटक के ‘रोहित वेमुला बिल’ तक, हर जगह सामान्य वर्ग को ‘आक्रांता’ की तरह पेश किया जा रहा है। सवर्ण समाज के युवाओं को अब पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि जेल जाने के डर के साथ कैंपस में कदम रखना होगा।
‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ एक मुहाबरे “मुंह में राम बगल में छूड़ी” का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। इसका उद्देश्य उत्थान, समानता, विकास कुछ भी नहीं केवल और केवल सवर्णों का दमन करना है।

गृहयुद्ध का बीजारोपण: आरक्षण और SC/ST एक्ट की विषाक्त पृष्ठभूमि
भारत में जातीय संघर्ष और संभावित गृहयुद्ध का बीजारोपण तो दशकों पूर्व उस समय ही हो गया था, जब ‘आरक्षण’ को बैसाखी के स्थान पर एक शस्त्र बनाया गया। तदोपरांत, SC/ST एक्ट जैसे दमनकारी कानूनों ने उस अग्नि में घी का कार्य किया। ये प्रावधान न्याय की अवधारणा पर नहीं, अपितु प्रतिशोध की भावना पर आधारित थे, जहाँ बिना किसी प्रारंभिक अन्वेषण के एक पूरे वर्ग को ‘अपराधी’ घोषित कर दिया गया।
वर्तमान ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ उस विषाक्त बीज को अंकुरित कर एक विशाल विषवृक्ष बनाने का अंतिम उपक्रम है। जहाँ पूर्व के कानून समाज के सामान्य व्यवहार को बाधित कर रहे थे, वहीं यह नवीन नियम सवर्ण युवाओं के भविष्य निर्माण के अंतिम केंद्र—’उच्च शिक्षण संस्थानों’ को ही उनके लिए वधशाला में परिवर्तित कर रहा है।
यह मात्र संयोग नहीं है कि जब शासन स्वयं को ‘सनातन रक्षक’ सिद्ध करने का स्वांग रच रहा है, ठीक उसी समय सवर्ण मेधा को मानसिक दासता और वैधानिक प्रताड़ना के पाश में जकड़ने की योजना को मूर्त रूप दिया गया है।
सवर्ण कुल-वधुओं और पुत्रों पर दोहरा आघात
इस षड्यंत्र का अत्यंत संवेदनशील और घृणित पक्ष सवर्णों के पारिवारिक ढांचे पर प्रहार करना है। आलेख के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि इन नीतियों का एक परोक्ष लक्ष्य सवर्णों की बेटियों को येन-केन-प्रकारेण असुरक्षित करना है।
- बेटियों का संकट: जब शिक्षण संस्थानों में ‘इक्विटी स्क्वाड’ और ‘एंबेसडर’ के नाम पर विशेष वर्ग के अराजक तत्वों को असीमित शक्तियाँ दी जाएँगी, तो सवर्ण परिवारों के सम्मुख अपनी कुल-मर्यादा की रक्षा का संकट खड़ा होगा। स्थिति ऐसी भयावह बना दी जाएगी कि सवर्ण समाज या तो अपनी बेटियों को इन संस्थानों में ‘हड़पे’ जाने के लिए छोड़ दे, या फिर उनकी शिक्षा पूर्णतः बंद करने के लिए बाध्य हो जाए।
- पुत्रों का वैधानिक निर्वासन: सवर्ण पुत्रों के लिए तो यह व्यवस्था ‘मरणतुल्य कष्ट’ लेकर आई है। चाहे वे शिक्षा प्राप्त करने जाएँ, या उच्च शिक्षा में अध्यापन (शिक्षा दान) करें, अथवा किसी भी व्यवसाय में संलग्न हों—हर पद पर ‘डिस्क्रिमिनेशन’ का तलवार उनके सिर पर लटकेगी। यदि वे श्रेष्ठता सिद्ध करेंगे, तो उसे ‘विशेषाधिकार’ (Privilege) कहकर दबाया जाएगा; यदि वे मौन रहेंगे, तो उसे ‘अहंकार’ कहकर दंडित किया जाएगा।
वर्णाश्रम व्यवस्था: सनातन धर्म का शाश्वत आधार
यद्यपि यह प्रावधान सतही तौर पर ‘समानता’ की बात करते हैं, किंतु इनका वास्तविक और दीर्घकालिक लक्ष्य ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ का विनाश करना है। भारतीय मनीषा के अनुसार, वर्ण व्यवस्था मात्र श्रम विभाजन नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) का सामाजिक प्रतिबिंब है। सनातन धर्म का मूलाधार वर्णाश्रम व्यवस्था है।
यह व्यवस्था मात्र सामाजिक विभाजन नहीं, अपितु आध्यात्मिक और प्राकृतिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है। श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट किया है— “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः”।
सत्ता के मद में चूर लोग यह भूल रहे हैं कि वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करने का तात्पर्य सीधे सनातन धर्म के अस्तित्व को चुनौती देना है। यद्यपि ईश्वरीय विधान होने के कारण वर्णाश्रम का विनाश असंभव है, तथापि प्रतिभा का दमन करके और सवर्णों को बौद्धिक रूप से पंगु बनाकर ये आधुनिक ‘आक्रांता’ हिंदू समाज के मेरुदंड को तोड़ना चाहते हैं। मंदिरों में शीश नवाना और गीता बांटना केवल एक राजनीतिक प्रपंच है, यदि अंतर्मन सवर्णों के प्रति द्वेष से भरा हो और नीतियाँ वर्णाश्रम व्यवस्था-विनाशक हों।

- सनातन पर प्रहार: भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है— “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः” (अर्थात चार वर्णों की सृष्टि मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार की गई है)। जब राज्य अपनी दमनकारी शक्ति का प्रयोग कर योग्यता (Merit) को जातिगत तुष्टिकरण की वेदी पर बलि चढ़ाता है, तो वह सीधे ईश्वर द्वारा स्थापित व्यवस्था को चुनौती देता है।
- प्रतिभा का आखेट (Hunting of Merit): सवर्ण जातियों ने युगों-युगों से ज्ञान, शौर्य और अर्थव्यवस्था को अपनी तपस्या से सींचा है। यूजीसी का यह काला कानून सवर्ण मेधावियों को कैंपस में भयभीत कर उन्हें शिक्षा से वंचित करने का उपक्रम है। प्रतिभा की इस भ्रूण हत्या का अर्थ है—हिंदू समाज के बौद्धिक नेतृत्व को पंगु बनाना।
- वर्णाश्रम का विनाश संभव नहीं: यद्यपि आधुनिक सत्ता और पाश्चात्य कुत्सित विचारधारा के पोषक वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने का निरर्थक प्रयास कर रहे हैं, तथापि यह संभव नहीं है। वर्ण व्यवस्था प्रकृति का नियम है। किंतु इन कुप्रयासों से सनातन धर्म के मूल ढांचे को जो आघात लग रहा है, वह अपूरणीय है। धर्म का मूल ही वर्णाश्रम है; यदि मूल पर ही प्रहार होगा, तो धर्म के अस्तित्व पर संकट आना अनिवार्य है।
एथनिक क्लींजिंग (जातीय संहार) का आधुनिक स्वरूप
अजीत भारती और नितिन शुक्ला जैसे विचारकों ने इन नियमों को ‘एथनिक क्लींजिंग’ का परिष्कृत रूप कहा है। जिस प्रकार मुगलों और आक्रांताओं ने तलवार के बल पर सनातन को मिटाना चाहा, वर्तमान सत्ता वही कार्य ‘पेन’ (Pen) और ‘पॉलिसी’ (Policy) के माध्यम से कर रही है।
- सवर्णों का निष्कासन: जब सवर्ण छात्र को यह आभास होगा कि कैंपस में उसका अस्तित्व ही एक अपराध है और किसी भी छोटे विवाद पर उसे जेल भेज दिया जाएगा, तो वह देश छोड़ने को विवश होगा। यह ‘ब्रेन ड्रेन’ नहीं, अपितु सवर्णों का अपनी मातृभूमि से ‘वैधानिक निर्वासन’ है।
- दमनकारी तंत्र: ‘इक्विटी स्क्वाड’ के रूप में कैंपस में जासूसों का जाल बिछाया जा रहा है जो ‘गेस्टापो’ (Gestapo) की भांति छात्रों की गतिविधियों पर दृष्टि रखेंगे। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण है।

दुष्परिणाम: आक्रोश और गृहयुद्ध की आशंका
किसी भी जीवंत समाज को जब अंतहीन अपमान और कानूनी प्रताड़ना के गर्त में धकेला जाता है, तो उसका प्रतिघात भयावह होता है।
- सवर्णों में व्याप्त क्षोभ: वर्तमान में सवर्ण SC/ST Act की और सवर्ण युवा आरक्षण की मार झेल रहा है, और अब उसे कैंपस में अपराधी घोषित करने की तैयारी है। यह संचित आक्रोश उस सीमा तक पहुँच चुका है जहाँ विस्फोटक स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
- गृहयुद्ध का बीजांकुरण : सरकार की ये नीतियां समाज को दो स्पष्ट वर्गों में बांट रही हैं— ‘संरक्षित’ और ‘प्रताड़ित’। जब प्रताड़ित वर्ग (सवर्ण) के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचेगा और उसके अस्तित्व पर ही संकट आएगा, तो वह आत्मरक्षार्थ शस्त्र उठाने को विवश होगा। जातीय संघर्ष (गृहयुद्ध) का बीजारोपण तो पूर्व में ही किया जा चुका है अब यह नया प्रावधान बनाने से वह बीज अंकुरित हो गया है और अंततः यह गृहयुद्ध को अवश्यंभावी करने वाला सिद्ध होगा। अभिषेक तिवारी जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति देश को पुन: ९० के दशक की जातीय हिंसा और संभावित गृहयुद्ध की विभीषिका में ढकेल देगी।
क्या हम गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं? इतिहास गवाह है कि जब-जब योग्यता का गला घोटा गया है और समाज के एक बड़े वर्ग को कानूनी तौर पर प्रताड़ित किया गया है, तब-तब क्रांतियाँ और विद्रोह हुए हैं।
यूजीसी का यह नया प्रावधान कैंपस को रणभूमि में बदल देगा। यह सनातन संस्कृति और भारत के भविष्य पर एक ऐसा प्रहार है जिसकी भरपाई शायद कभी न हो सके। यदि समय रहते इन आत्मघाती नियमों को वापस नहीं लिया गया, तो ‘विकसित भारत’ का स्वप्न केवल एक खोखला जुमला बनकर रह जाएगा और देश जातिगत विद्वेष की आग में जल उठेगा।

“यतो धर्मस्ततो जयः”: अहंकार और दैवीय न्याय
“कौरवों के पास अक्षौहिणी सेनाएँ थीं, पांडवों के पास केवल धर्म था। आज के शासक भूल रहे हैं कि इतिहास संख्याबल से नहीं, बल्कि सत्य की रक्षा के संकल्प से लिखा जाता है।”
महाभारत का कालखंड आज पुनः जीवंत हो उठा है। कौरवों के पास ११ अक्षौहिणी सेना का संख्याबल था और वे इसी मद में चूर थे कि वे अल्पसंख्य पांडवों का अस्तित्व मिटा देंगे। वर्तमान शासन तंत्र भी अपने ‘संख्याबल’ और ‘वोट बैंक’ के अहंकार में इस अटल सत्य को विस्मृत कर चुका है कि विजय सदैव धर्म की ही होती है।
“अतिमानो अतिवादश्च तथात्यागो नराधिप। क्रोधश्चात्मप्रशंसा च द्वेषश्चैतेष्वशत्रवः।।”
अर्थ: अत्यधिक अहंकार (संख्याबल का), कटु भाषण, त्याग का अभाव, क्रोध, आत्मप्रशंसा और दूसरों के प्रति द्वेष—ये बिना शत्रु के ही मनुष्य (या शासन) का विनाश कर देते हैं।
पांडव संख्या में न्यून थे, किंतु वे धर्म के रक्षक थे, अतः धर्म ने उनकी रक्षा की। वर्तमान में भी जो लोग सवर्णों को अल्पसंख्यक समझकर उनके दमन की नीतियाँ बना रहे हैं, वे भूल रहे हैं कि “यतो धर्मस्ततो जयः”। सवर्ण समाज ने सदैव ज्ञान, शौर्य और त्याग से राष्ट्र की रक्षा की है। यदि उन्हें अंतहीन प्रताड़ना के गर्त में धकेला गया, तो संचित आक्रोश का विस्फोट ‘शस्त्रधारण’ के रूप में होना अनिवार्य है। जब न्याय के द्वार बंद हो जाते हैं, तब परशुराम और अर्जुन का मार्ग ही शेष बचता है।

समाधान की संक्षिप्त चर्चा
वर्तमान संकट के काल में, जब सवर्ण समाज वैधानिक कुरुक्षेत्र में घिरा हुआ है, तब अनेक ‘राष्ट्रवादी’ और ‘आधुनिकता-ग्रस्त’ विचारक भ्रामक समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। ये समाधान वास्तव में उनके अपने कुतर्कों और पश्चिम-प्रेरित बौद्धिक दासता की उपज हैं। वे कभी प्राचीन शिक्षा पद्धति की ओर लौटने की भावुक अपील करते हैं, कभी नौकरियों के त्याग और ‘स्टार्टअप’ या आत्मनिर्भरता का झुनझुना थमाते हैं, तो कभी केवल सड़क पर उतरकर विरोध और संघर्ष को ही एकमात्र मार्ग बताते हैं।
किंतु सूक्ष्म चिंतन (जो कि आधुनिकता ग्रस्त राष्ट्रवादी भी नहीं कर सकते, क्योंकि उनके विवेक का पहले ही अपहरण किया जा चुका है और वो संघ/आर्यसमाज आदि के मनगढंत कुतर्कों को ही सत्य मानते हैं) करने पर ज्ञात होता है कि ये मार्ग तात्कालिक संतोष तो दे सकते हैं, पर स्थायी विजय नहीं। जब तक रोग की जड़ पर प्रहार नहीं होगा, तब तक उपचार संभव नहीं है।
सवर्णों की वर्तमान संवैधानिक और कानूनी प्रताड़ना का मूल कारण उनकी संख्याबल में न्यूनता नहीं, अपितु उनका ‘धर्म-त्याग’ है। सवर्णों ने भौतिकता की अंधी दौड़ में अपने उस रक्षा-कवच को त्याग दिया है, जिसने सहस्रों वर्षों तक आक्रांताओं के सम्मुख उन्हें अपराजेय रखा था। वास्तविक समाधान इन दो सूत्रों में निहित है:
“धर्मो रक्षति रक्षितः” (संरक्षित धर्म ही रक्षा करता है): सवर्ण आज प्रश्न करते हैं कि वे रक्षित क्यों नहीं हैं? उत्तर स्पष्ट है—क्योंकि वे धर्म की रक्षा नहीं कर रहे हैं। हमने शास्त्रों को विस्मृत कर दिया है। धर्म की रक्षा का तात्पर्य केवल मंदिर जाना या प्रदर्शन करना नहीं है, अपितु शास्त्रों को आत्मसात करना है। वर्तमान में सवर्ण समाज ‘मनमुखी व्याख्या’ के जाल में फंसा हुआ है।

हम अपनी सुविधा के अनुसार धर्म की व्याख्या करते हैं, जो वास्तव में धर्म के नाम पर किया जा रहा अधर्म ही है। जब सवर्ण पुनः अपने शास्त्र-सम्मत धर्म की मर्यादा में प्रतिष्ठित होगा, तभी धर्म उसकी रक्षा के लिए कवच बनकर खड़ा होगा।
“यतो धर्मस्ततो जयः” (जहाँ धर्म है, वहीं विजय है): विजय का मार्ग संख्याबल या राजनैतिक चाटुकारिता से नहीं, बल्कि धर्म-पालन की कठोरता से प्रशस्त होता है। सवर्णों को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी वर्तमान दुर्गति उनके धार्मिक स्खलन का परिणाम है। जिस दिन सवर्ण समाज शास्त्रों का अध्ययन, अध्यापन और तदनुसार आचरण (वर्णाश्रम धर्म का पालन) पुनः प्रारंभ कर देगा, उस दिन कोई भी सांसारिक कानून या ‘UGC रेगुलेशन’ उसे पराजित नहीं कर पाएगा।
समाधान के विषय में विस्तृत चर्चा हम पृथक करेंगे।
निष्कर्ष: चेतना का जागरण
समय का आह्वान यूजीसी के ये नियम ‘विकसित भारत’ के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं। यह सनातन धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था पर आक्रांताओं द्वारा किया गया आधुनिक प्रहार है। यदि इस ‘कानूनी जिहाद’ और ‘अत्याचारी शासन’ के विरुद्ध आज समस्त सनातन समाज (विशेषकर सवर्ण) संगठित होकर प्रतिरोध नहीं करता, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। वर्ण व्यवस्था को मिटाने का प्रत्येक प्रयास अंततः भारत की आत्मा को ही क्षत-विक्षत करेगा।
सरकार को समझना चाहिए कि प्रतिभा को कुचलकर और एक वर्ग को कानूनी अत्याचार का शिकार बनाकर वह ‘विश्वगुरु’ नहीं, बल्कि ‘विनाशगुरु’ बनने की ओर अग्रसर है। सवर्णों का यह आक्रोश यदि ज्वालामुखी बना, तो उसकी लपटों में यह संपूर्ण तंत्र स्वाहा हो जाएगा।
गृहयुद्ध की ओर बढ़ते चरण यूजीसी का यह ‘हायर एजुकेशन रेगुलेशन 2026’ भारत में जातीय संघर्ष और गृहयुद्ध की अंतिम घोषणा है। यदि सवर्ण युवाओं को उनके अपने ही देश में ‘आक्रांता’ और ‘अपराधी’ की भाँति प्रताड़ित किया गया, तो वे आत्मरक्षार्थ शस्त्र उठाने को विवश होंगे।
यह संघर्ष केवल सवर्णों की रक्षा का नहीं, अपितु सनातन धर्म के मूलाधार की रक्षा का धर्मयुद्ध होगा। संख्याबल के अहंकार में चूर दुर्योधनों को स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास स्वयं को दोहराता है और अधर्म की नींव पर खड़े साम्राज्य अंततः नष्ट हो जाते हैं।
FAQ
प्रश्न : यूजीसी रेगुलेशन २०२६ क्या है?
उत्तर: यह यूजीसी द्वारा जारी नए दिशा-निर्देश हैं, जिसके तहत कॉलेजों में ‘इक्विटी स्क्वाड’ बनाए जाएंगे जो जातिगत भेदभाव की निगरानी करेंगे। आलोचकों के अनुसार, इसमें सवर्णों को निशाना बनाने के लिए कड़े और एकतरफा प्रावधान हैं।
प्रश्न : यह कानून सवर्णों के लिए खतरनाक क्यों माना जा रहा है?
उत्तर: क्योंकि इसमें और तो और झूठे आरोप लगाने वालों के लिए दंड के लिये भी कोई प्रावधान नहीं है और भेदभाव की परिभाषा अत्यंत अस्पष्ट है, जिससे सवर्ण छात्रों को आसानी से फंसाया जा सकता है।
प्रश्न : आलेख में गृहयुद्ध की आशंका क्यों व्यक्त की गई है?
उत्तर: जब समाज का एक बड़ा शिक्षित वर्ग (सवर्ण) खुद को अपने ही देश के संस्थानों में प्रताड़ित और वैधानिक रूप से असुरक्षित पाएगा, तो अंततः उनमें पनपा आक्रोश सामाजिक संघर्ष और गृहयुद्ध का कारण बन सकता है।
प्रश्न : वर्णाश्रम व्यवस्था का सनातन धर्म से क्या संबंध है?
उत्तर: सनातन धर्म की संरचना वर्णाश्रम व्यवस्था पर टिकी है। गीता के अनुसार यह ईश्वरीय विधान है। इस व्यवस्था पर प्रहार करने का अर्थ सीधे हिंदू धर्म की मूल पहचान को मिटाना है।
प्रश्न : ‘इक्विटी स्क्वाड’ सवर्णों की बेटियों के लिए खतरा क्यों है?
उत्तर: आलेख के अनुसार, इन स्क्वाड्स को असीमित वैधानिक शक्तियाँ प्राप्त होंगी, जिसका दुरुपयोग अराजक तत्व सवर्ण छात्राओं को मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित या ‘हड़पने’ के लिए कर सकते हैं।
प्रश्न : वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार को ‘सनातन पर प्रहार’ क्यों कहा जा रहा है?
उत्तर: क्योंकि वर्णाश्रम व्यवस्था सनातन धर्म का प्राण-तत्व है। गीता के अनुसार यह ईश्वरीय विधान है। इसे कानूनी रूप से विकृत करना हिंदू धर्म की मूल पहचान और समाज की बौद्धिक श्रेष्ठता को नष्ट करने जैसा है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख पूर्णतः वैचारिक विमर्श और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था की अवमानना करना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और धार्मिक मान्यताओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है। आलेख में प्रयुक्त ‘गृहयुद्ध’ और ‘शस्त्रधारण’ जैसे शब्द सामाजिक असंतोष की गंभीर पराकाष्ठा को दर्शाने के लिए आलंकारिक रूप से प्रयुक्त किए गए हैं। पाठक विवेक से निर्णय लें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









