Pragya Panchangam – प्रज्ञा पञ्चाङ्गम् 2081
Pragya Panchangam – प्रज्ञा पञ्चाङ्गम् | कार्तिक 2081 : मासिक पंचांग (दृक पंचांग) कार्तिक माह, संवत 2081; 18 अक्टूबर से 15 नवम्बर 2024 तक
Pragya Panchangam – प्रज्ञा पञ्चाङ्गम् | कार्तिक 2081 : मासिक पंचांग (दृक पंचांग) कार्तिक माह, संवत 2081; 18 अक्टूबर से 15 नवम्बर 2024 तक
रुद्राष्टाध्यायी के पाठक्रम और महत्व – Rudrashtadhyayi : 8 की संख्या का कर्मकांड में विशेष महत्व है, कमल में 8 दल होते हैं और कमल पुष्प अर्पित करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। उसी प्रकार सभी देवताओं के लिये एक विशेष स्तुति होती है जिसमें 8 मंत्र होते हैं और उसे देवता का अष्टक कहा जाता है जैसे रुद्राष्टक, भवान्यष्टक, कृष्णाष्टक इत्यादि। इसी प्रकार वेद से 8 अध्याय लेकर अष्टक का निर्माण किया गया जिसे रुद्राष्टाध्यायी कहा जाता है।
नित्य प्रातःकाल पढे जाने वाले महत्वपूर्ण माङ्गलिक मन्त्र : प्रातः स्मरण मंत्र का तात्पर्य मात्र स्मरण करना नहीं होता भले ही इसमें स्मरण शब्द ही प्रयुक्त होते हैं, किन्तु इनका सस्वर पाठ करना चाहिये। प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं
सिन्दूरपूर परिशोभित गण्डयुग्मं ।
उद्दण्डविघ्न परिखण्डन चण्ड दण्ड
माखण्डलादिसुरनायक वृन्दवन्द्यं ।।
नित्यकर्म – nitya karm puja : कोई भी जीव जब तक जीवित रहता है बिना कर्म किये नहीं रह सकता। अनेकानेक कर्मों में से कुछ ऐसे कर्म होते हैं जो प्रतिदिन किये जाते है। वो सभी कर्म जो प्रतिदिन किये जाते हैं नित्यकर्म कहलाते हैं।
पितृ कर्म प्रकरण – Pitri Karm : पितृकर्मों से पूर्व प्रेतकर्म होता है और प्रेतत्व की निवृत्ति न होने पर पितृपद प्राप्ति ही संभव नहीं है, अर्थात किसी की मृत्यु होने पर जो श्राद्ध किया जाता है वह प्रेत के निमित्त ही किया जाता है और प्रेतकर्म ही होता है। षोडशश्राद्ध होने के एक वर्ष पश्चात् अर्थात वार्षिक श्राद्ध से पितृकर्म का आरंभ होता है। प्रथमतया प्रेतकर्म को ही देखते हैं :
तर्पण विधिः (मिथिलादेशीय संक्षिप्त तर्पण विधि) – Tarpan vidhi – तर्पण करने की एक विस्तृत विधि भी होती है जिसमें वेदमंत्रों का भी प्रयोग होता है और सभी देवों आदि को पृथक-पृथक जलांजलि दिया जाता है। किन्तु मिथिला में जो विशेष रूप से प्रचलित तर्पण विधि है उसे संक्षिप्त तर्पण विधि भी कहा जाता है। इसमें वेद मंत्रों का प्रयोग नहीं किया जाता है। नीचे मिथिलादेशीय संक्षिप्त तर्पण विधि दी गयी है जो विशेष उपयोगी है।
संध्या विधि – sandhya vidhi mantra : नित्यकर्मों में से प्रथम क्रम संध्या का आता है जिसे संध्या वंदन भी कहा जाता है। यहां संध्या वंदन विधि दी गयी है।
पूजन सामग्री – puja smagri : यहां पर कर्मकांड के विभिन्न पूजा, पाठ, जप, श्राद्ध आदि में लगने वाली सामग्रियों की सूची संबंधी अनुसरण पथ दिये गये हैं जिस पर अनुगमन करके उस कर्म की सामग्रियों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
शिववास विचार – Shivwas Vichar भगवान शिव की पूजा के अनेक प्रकार और विधियां हैं। शिवपूजा में लिंग पूजा ही प्रमुख है। लिंग पूजा में भी अनेकों प्रकार होते हैं जैसे नर्मदेश्वर शिव लिंग, पार्थिव लिंग, पारद लिंग आदि। शिवलिंग की पूजा करने में अभिषेक का भी विशेष महत्व होता है जिसे रुद्राभिषेक कहा जाता…